भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन्देवतातिथीन् । सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्नतुतृप्येत्स्वयंततः । इति ॥ ६ ॥ न मृगयोरिषुचारिणः परिवर्ज्यमन्नम् ॥ १०॥ विज्ञायते ह्यगस्त्यो वर्षसाहस्रिके सत्रे मृगयां चकार, तस्याऽऽसंस्तु रस- मयाः पुरोडाशा मृगपक्षिणां प्रशस्तानाम् ॥११॥ अपि ह्यत्र प्राजापत्याञ् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ १२ ॥ उद्यतामाहृतांभिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् । भोज्यां प्रजापतिर्मेने अपिदुष्कृतकारिणः ॥ १३ ॥ श्रद्दधानैर्नभोक्तव्यं चोरस्यापिविशेषतः । नत्वेवबहुयाज्यस्य यश्चोपनयतेबहून् ॥ १४॥ नतस्यपितरोऽश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्चच । नचहव्यंवहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ १५ ॥ चिकित्सकस्यमृगयोः शल्यहस्तस्यपापिनः ।


पूजन के लिये सब किसी से अन्न को ग्रहण करले परन्तु उसको स्वयं न खावे तो दोष नहीं लगता है ॥९॥ धनुष बाण लेकर विचरने वाले व्याध का अन्न वर्जित नहीं ॥ १० ॥ क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि अगस्त्य ऋषि ने हजार वर्ष के सत्र यज्ञ में प्रशस्त मृगों और पक्षियों की शिकार की, उस के रस रूप पुरोडाश बनाये गये । ( यह किन्हीं का मत है । अगस्त्य महर्षि ने तपो बल के प्रभाव से दोष को नष्ट किया इस से साधारण व्याध के अन्न में कुछ दोष रहेगा । इस कारण दशवां सूत्र एक देशी मत जानो )॥ ११ ॥ इस भक्ष्या भक्ष्य विषय में प्रजापति के कहे श्लोक कहते हैं कि॥ १२॥ दाता ने पहिले से न कहा हो कि अमुक वस्तु तुम को मैं दूंगा और अकस्मात् बिना मांगे लाकर सामने धर दे तो ऐसी भिक्षा दुष्कर्मी पुरुष की भी भोजन वा ग्रहण करने योग्य है ॥ १३ ॥ धर्म में श्रद्धा रखने वाले ब्राह्मणों को चोरों का, एक साथ बहुतों को यज्ञ कराने तथा एक साथ बहुतों का उपनयन कराने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिये ॥ १४ ॥ जो पुरुष उस अकस्मात् आयी पूर्वोक्त भिक्षा का तिरस्कार करता है उस के श्राद्ध को पितर लोग १५ पन्द्रह वर्ष तक स्वीकार नहीं करते और उस के हविष्यांश को अग्नि देवताओं में नहीं पहुंचाता ॥ १५ ॥ वैद्य, व्याधा, भाला व शूल हाथ लिये पापी