अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 743, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थमहिमा ॥ ५३
पादग्राह्यास्तेषां भार्या गुरोश्च मातापितरौ यो विद्यादभि- वन्दितुमहंमयंभोइति ब्रूयाद्यश्च न विद्यात् प्रत्यभिवाद- ममन्त्रिते स्वरोऽन्त्यः प्लवते सन्ध्यक्षरमप्रगृह्यमायावाभावं चाऽऽपद्यते यथा भो भाविति ॥ १४ ॥ पतितः पिता त्याज्यो माता तु पुत्रे न पतति ॥ १५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १६ ॥ उपाध्यायाद्दशाऽऽचार्य आचार्याणांशतंपिता । पितुर्दशशतंमाता गौरवेणातिरिच्यते ॥ १७ ॥ भार्याःपुत्राश्चशिष्याश्च संसृष्टाःपापकर्मभिः । परिभाष्यपरित्याज्याः पतितोयोऽन्यथात्यजेत् ॥१८॥ ऋत्विगाचार्यावयाजकानध्यापकौ हेयावन्यत्र हाना-
पग छूने उचित हैं उन की स्त्रियों को भी अभिवादन करे और गुरु के माता पिता को भी अभिवादन करे। जो (वैयाकरण होने से) अभिवादन करना जानता हो वह (अभिवादये देव शर्माऽहंभोः) ऐसा कहे। और जो पुरुष अभिवादन के प्रत्युत्तर (जिस के सम्बोधन में अन्त्य स्वर प्लुत होता और प्रगृह्य संज्ञा न होने पर एकार ओकारादि सन्ध्यक्षर को अय् आव् आदेश होता है जैसे भो इति। भाविति) को नहीं जानता उस मान्य को भी शास्त्र विधि से अभिवादन न करे किन्तु लोक भाषा में बोलकर पाद स्पर्श कर लेवे ॥ १४ ॥ पतित हुए पिता को पुत्र त्याग देवे परन्तु पुत्र के लिये माता पतित नहीं होती अर्थात् पतित हुई माता की भी भोजन वस्त्रादि देके पुत्र रक्षा वा सेवा करता रहे ॥१५॥ यहां श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि॥१६॥ अध्यापक वा उपाध्याय से दश गुणी मान प्रतिष्ठा आचार्य की, आचार्य से सौ गुणा मान्य पिता का और पिता से हजार गुणा मान्य माता का करना चाहिये और इस से भी जितना अधिक गौरव माता का करे सो सब उचित ही जानो ॥ १७ ॥ स्त्री पुत्र और शिष्य लोग यदि विशेष कर पाप कर्मों से युक्त हों तो उन से कहदे (नोटिस दे देवे) कि तुम लोग अब आगे ऐसा मत करो तथा पिछले किये का प्रायश्चित्त करलो ऐसा सुना देने पर भी न मानें तो उन को त्याग देवे। बिना सुनाये त्यागे तो त्यागने वाला भी पतित हो जाता है ॥ १८ ॥ ऋत्विज् यज्ञ न करासके वा किसी कारण से न