भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाऽर्थसहिता ॥ ४१

अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपङ्क्तिदूषणैः ।
अदूष्यंतंयमःप्राह पङ्क्तिपावनएवसः ॥ १७ ॥
श्राद्धेनोद्वासनीयानि उच्छिष्टान्यादिनक्षयात्
श्रोतन्तेहिसुधाधारास्ताःपियन्त्यकृतोदकाः ॥ १८ ॥
उच्छिष्टंनप्रमृज्यात्तु यावन्नास्तमितोरविः ।
क्षीरधारास्ततोयान्ति,अक्षय्याः पङ्क्तिभागिनः ॥१९॥
प्राक्संस्कारप्रमीतानां स्ववंश्यानामितिश्रुतिः ।
भागधेयंमनुःप्राह उच्छिष्टोच्छेषणेउभे ॥ २०॥
उच्छेषणंभूमिगतं विकिरंल्लेपसोदकम् ।
अन्नंप्रेतेषुविसृजेदप्रजानामनायुषाम् ॥ २१ ॥
उभयोःशाखयोर्मुक्तं पितृभ्योऽन्नंनिवेदितम् ।
तदन्तरंप्रतीक्षन्ते ह्यसुरादुष्टचेतसः ॥ २२ ॥
तस्मादशून्यहस्तेन कुर्यादन्नमुपागतम् ।


॥१६॥ यदि वेदवेत्ता ब्राह्मण अङ्गहीन होना आदि पङ्क्ति में दूषित शरीर वाला भी हो तो भी महर्षि यमने उसको निर्दोष पङ्क्तिपावन ही कहा है ॥१७॥ श्राद्ध में भोजन कराये ब्राह्मणों की जूठन को सूर्यास्त होने समय तक न उठावे। क्योंकि अमृत की धारा झरती हैं उनको वे पितर पीते हैं जिन ने जल दान नहीं किया ॥ १८ ॥ जब तक सूर्य अस्त नहीं तब तक उच्छिष्ट को उठाके स्थान की शुद्धि न करे क्योंकि उस से अक्षय दूध की धारा पङ्क्तिभागी पितरों को प्राप्त होती हैं ॥ १९ ॥ पिण्ड बनाये अन्नका शेष लेप और ब्राह्मणों के भोजन का उच्छिष्ट ये दोनों उपनयन संस्कार होने से पहिले मरे अपने वंशवालों के भाग मनुजी ने कहे हैं ॥२०॥ पात्र में लिया वा भूमि पर गिरा उच्छेषणभाग को निर्वंश होकर कम आयु में मरों के अन्नको जल सहित प्रेतों के निमित्त छोड़े ॥ २१ ॥ दोनों ओर की अंगुलियों से छोड़े पितरों को निवेदन किये अन्न के पात्र में पहुंचने से पहिले दुष्ट विचार वाले असुर लोग बीच में मारखाने की प्रतीक्षा करते हैं ॥ २२ ॥ तिस से कुश हाथ में ले कर कुशों के सहारे से अन्न का निवेदन करे। अथवा भोजन का स्पर्श करके दोनों प्रकार के शेष