भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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४२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

भोजनंवासमालभ्य तिष्ठेतोच्छेषणेउभे ॥ २३ ॥
द्वौदैवेपितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्रवा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि नप्रसज्येतविस्तरे ॥ २४ ॥
सत्क्रियां देशकालौच शौचं ब्राह्मणसम्पदः ।
पञ्चैतान्विस्तरोहन्ति तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥
अपिवाभोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
श्रुतशीलोपसंपन्नं सर्वलक्षणवर्जितम् ॥ २६ ॥
यद्येकंभोजयेच्छ्राद्धे देवंतत्रकथंभवेत् ।
अन्नंपात्रे समुद्धृत्य सर्वस्यप्रकृतस्यतु ॥ २७ ॥
देवतायतनेकृत्वा ततःश्राद्धंप्रवर्त्तयेत् ।
प्रास्येदग्नौतदन्नंतु दद्याद्वाब्रह्मचारिणे ॥ २८ ॥
यावदुष्णंभवत्यन्नं यावदश्नन्तिवाग्यतः ।
तावद्धिपितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ताहविर्गुणाः ॥२९॥


भागों की यथास्थान रक्षा करे ॥२३॥ विश्वेदेव सम्बन्धी दो और तीन पितृ ब्राह्मणों को वा दोनों में एक २ ब्राह्मण को भोजन करावे । धनाढ्य हो तो भी अधिक विस्तृत पांति को भोजन कराने को तत्पर न हो ॥२४॥ क्योंकि सत्कार, देश, काल, शुद्धि और सुपात्र ब्राह्मणों का मिलना इन पांचों को बहुतों का भोजन कराना नष्ट करता है तिस से श्राद्ध में बड़ी पांति करने की चेष्टा न करे ॥२५॥ अथवा वेद पारंगत, शास्त्राभ्यासी, सौम्य स्वभाव युक्त, सब कुलक्षणों से रहित, धर्म कर्म निष्ठ एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन करावे ॥ २६ ॥ यदि एक ही ब्राह्मण को श्राद्ध में जिमावे तो वही एक विश्वेदेवों और पितरों दोनों के लिये कैसे होगा ? । इसका समाधान यह है कि पकाये हुए सब अन्न में से विश्वेदेवों के निमित्त एक पात्र में अन्न परोस कर ॥ २७ ॥ किसी देवस्थान मन्दिरादि में सुरक्षित रख कर श्राद्ध करे पश्चात् उस विश्वेदेवों के भोजन को अग्नि में होम करदे वा किसी ब्रह्मचारी को देदेवे ॥ २८ ॥ जब तक भोजन गर्म रहता और जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण मौन हो कर भोजन करते हैं तथा जबतक भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन नहीं कहेगये तभी तक ब्राह्मणों के साथ पितर लोग भोजन करते हैं ॥२९॥