भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ४३

हविर्गुणानवक्तव्याः पितरोयावदतर्पिताः ।
पितृभिस्तर्पितैःपश्चाद् वक्तव्यंशोभनं हविः ॥ ३० ॥
नियुक्तस्तुयदाश्राद्धे दैवेमांसंसमुत्सृजेत् ।
यावन्तिपशुरोमाणि तावन्नरकमृच्छति ॥ ३१ ॥
त्रीणिश्राद्धे पवित्राणि दौहित्रःकुतपस्तिलाः ।
त्रीणिचात्रप्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ ३२ ॥
दिवसस्याष्टमेभागे मन्दीभवतिभास्करः ।
सकालःकुतपोनाम पितॄणांदत्तमक्षयम् ॥ ३३ ॥
श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच मैथुनंयोऽधिगच्छति ।
भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंरेतसोभुजः ॥ ३४ ॥
यस्ततोजायतेगर्भो दत्त्वाभुक्त्वाचपैतृकम् ।
नसविद्यांसमाप्नोति क्षीणायुश्चैवजायते ॥ ३५ ॥


जबतक पितृगण तृप्त नहीं तबतक हविष्य भोज्य पदार्थों के गुण वर्णन न करे। पितरों के तृप्त होजाने पश्चात् कहे कि हविष्यान्न बहुत उत्तम बना है ॥ ३० ॥ जब श्राद्धमें निमन्त्रण स्वीकार करके यजमान के यहां किसी कारण मांस बनाया परोषा जाय और उस को त्याग देवे तो पशु के शरीर में जितने रोम होते उतने वर्षों तक नरक में वसता है ॥ ३१ ॥ श्राद्ध में तीन वस्तु विशेष पवित्र होते हैं एक दौहित्र (पुत्री का पुत्र) द्वितीय कुतप (दिन का आठवां भाग) और तिल। तथा शुद्धि, क्रोधका त्याग और शीघ्रता न करना ये तीनों ठीक २ करे तो प्रशंसा के योग्य श्राद्ध होगा ॥ ३२ ॥ दिन के आठवें भाग में चार घड़ी दिन शेष रहे सूर्य का तेज मन्द हो जाता है उस चार घड़ी काल को कुतप कहते हैं उस काल में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने से अक्षय फल होता है ॥ ३३ ॥ श्राद्ध जिमाने वाला तथा जीमने वाला इन में से जो कोई श्राद्ध की समाप्ति में उसी दिन मैथुन करता है उस के पितर उस एक महीने तक वीर्य को खाने वाले होते हैं ॥ ३४॥ श्राद्ध में भोजन करने कराने वालों के उसी दिन किये मैथुन से जो सन्तान होता है वह विद्या को समाप्त नहीं कर पाता और थोड़ी आयु में नष्ट हो जाता है ॥ ३५ ॥