अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 728, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८ | वसिष्ठस्मृतिः ॥ |
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नानुशासनवादाभ्यां भिक्षांलिप्सेतकहिंचित् ॥ १५ ॥
अलाभेनविषादीस्याल्लाभं चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रःस्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥१६॥
नकुट्यांनोदकेसङ्गो नचैले नत्रिपुष्करे ।
नाऽऽगारेनासनेनाऽन्ने यस्यवैमोक्षवित्तमः । इति ॥१७॥
ब्राह्मणकुले वा यल्लभेत्त तद्भुञ्जीत, सायं प्रातर्मधुमांस-
परिवर्जम् ॥ १८ ॥ यतीन्साधूंश्च गृहस्थान्सायं प्रातश्चतर्पये-
त् ॥ १९ ॥ ग्रामे वा वसेत् ॥ २०॥ अजिह्योऽशरणोऽसङ्कुसु-
को नचेन्द्रियसंयोगं कुर्वीत केनचित् ॥ २१ ॥ उपेक्षकः सर्व-
भूतानां हिंसानुग्रहपरिहारेण ॥ २२ ॥ पैशुन्यमत्सराभिमा-
नाहंकाराश्रद्धाऽनार्जवात्मस्तवपरगर्हादम्भलोभमोहक्रोधाऽसू-
विद्या, वा अङ्ग विद्या, धर्मादि का उपदेश और वाद विवाद करने द्वारा संन्यासी उत्तम भिक्षादि मिलने की इच्छा कदापि न करे ॥ १५ ॥ भिक्षादि न मिलने पर दुःख न माने और भिक्षादि के लाभ का हर्ष भी न करे प्राणों के निर्वाहमात्र के लिये कुछ थोड़ा सा अन्न जैसा मिले खालिया करे । इतना तथा ऐसा ही भोजनादि मिले ऐसा विचार न रक्खे ॥ १६ ॥ ॥ उत्तम कुटी, जलाशय, वस्त्र, स्वर्ग, उत्तम स्थान ( बगीचा आदि ) उत्तम आसन इत्यादि किसी से भी जो आसक्त नहीं वह यति होकर मोक्ष पद को जाननेवाला है ॥१७ ॥ अथवा ब्राह्मण के घर से मधु मांस का अंश छोड़के अन्य जो मिलजाय वही सायंप्रातः दोवार खा लेवे ॥ १८ ॥ साधु यतियों और अकल गृहस्थों को सायं प्रातःकाल अपनी मङ्गलमूर्ति के दर्शन देकर तृप्तकरे ॥ १९ ॥ अथवा ग्राम में वसे ॥ २० ॥ कुटिलतान करे, चित्त वा शरीर की चंचलता त्यागे, किसी का सहारा न लेवे और किसी विषयके साथ इन्द्रियों का संग न करे ॥२१॥ किसी को दुःख देने वा अनुग्रह की चेष्टा न करता हुआ सब प्राणियों से उदासीन भाव रक्खे ॥२२॥चुगली मत्सरता, अभिमान, अहंकार, अश्रद्धा अविश्वास, कठोरता निर्दयता, आत्मश्लाघा ( अपनी प्रशंसा ) परनिन्दा, दम्भ, लोभ, मोह, क्रोध, अन्य के शुभ गुणों में भी दोषारोप करना रूप असूया, इन चुगली आदि का सर्वथा