अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 727, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३९
वा गोप्रलूनेस्तृणैर्वेष्टितशरीरः स्थण्डिलशाय्यनित्यां वसतिं वसेत् ग्रामान्ते देवगृहे शून्यागारे वृक्षमूले वा मनसा ज्ञानमधीयमानः ॥ ८ ॥ अरण्यनित्यो न ग्राम्यपशूनां संदर्शने विहरेत् ॥ ९ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १० ॥
अरण्यनित्यस्यजितेन्द्रियस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्त्तकस्य ।
अध्यात्मचिन्तागतमानसस्य ध्रुवाह्यनावृत्तिरुपेक्षकस्याइति ११
अव्यक्तलिङ्गो व्यक्ताचारः, अनुन्मत्त उन्मत्तवेषः॥१२॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ १३॥
नशब्दशास्त्राभिरतस्यमोक्षो नचापि लोकग्रहणेरतस्य ।
नभोजनाच्छादनतत्परस्य नचापिरम्यावसथप्रियस्य ॥१४
नचोत्पातनिमित्ताभ्यां ननक्षत्राङ्गविद्यया ।
शीर की ढांपे। गौओं के खाने से बची घास शरीर में लपेटे । स्थण्डिल भूमि भागपर सोवे । किसी एक स्थान में अधिक दिनों तक न बसे, गांव के समीप में, देवस्थान (शिवालय आदि) में, किसी सूने घर में, अथवा वृक्षों के नीचे इनमें से किसी अनुकूल निर्विघ्न स्थान में मन से तत्त्वज्ञान का स्मरण वा पाठ करता हुआ बसे ॥ ८ ॥ नित्य ही एकान्त वन आदि में रहे । गांव के पशुओं के देखने में मनको भ्रमण न करे ॥ ९ ॥ इस पर श्लोक का प्रमाण कहते हैं ॥ १० ॥ सब इन्द्रियों को उनर के विषय भुगाने द्वारा प्रसन्न करने से निवृत्त हुए जितेन्द्रिय हो के नित्य एकान्त में बसनेवाले, अध्यात्म चिन्ता में जिस का मन लगा हो ऐसे उपेक्षावृत्तिवाले संन्यासी को मोक्ष से पुनरावृत्ति नहीं होती है ॥ ११ ॥ महात्मा पन के चिन्ह प्रकट न करे पर शुद्ध आचार प्रकट रक्खे, ऊपरी वेष से उन्मत्त जान पड़े, अर्थात् उन्मत्तों कासा वेष रक्खे और भीतरी विचारों में उन्मत्त न रहे ॥ १२ ॥ इस पर श्लोकों का प्रमाण कहते हैं ॥ १३ ॥ व्याकरण के पढ़ने पढ़ाने, वाद विवाद में, तथा संसारी मनुष्यों को प्रसन्न रखने में, अच्छे२ भोजन वस्त्रों की प्राप्ति में, अच्छे घर में निवास करने में, तत्पर संन्यासी का मोक्ष नहीं हो सकता है ॥ १४ ॥ उत्पात (होने वाली भयंकर घटना) बताने, काम सिद्ध होने के निमित्त बताने, ज्योतिष