भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 726

३६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणां दत्त्वा प्रतिष्ठेत ॥ १ ॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ २ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वाचरतियोमुनिः ।
तस्यापिसर्वभूतेभ्यो नभयंजातुविद्यते ॥ ३ ॥
अभयंसर्वभूतेभ्यो दत्त्वायस्तुनिवर्तते ।
हन्तिजातानजातांश्च द्रव्याणिप्रतिगृह्यच ॥ ४ ॥
संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेकंनसन्न्यसेत् ।
वेदसंन्यसनाच्छूद्रस्तस्माद्वेदंनसन्न्यसेत् ॥ ५ ॥
एकाक्षरंपरंब्रह्म प्राणायामः परन्तपः ।
उपवासात्परंभैक्षं दयादानाद्विशिष्यते ॥ ६ ॥
मुण्डोऽममोऽपरिग्रहः सप्तागारण्यसंकल्पितानि चरेद्भैक्षं विधूमे सन्नमुसले ॥ ७ ॥ एकशाटीपरिवृतोऽजिनेन


अब इस दशम अध्याय में संन्यास धर्म कहते हैं । संन्यासी होता हुआ ब्राह्मण सब प्राणियों को निर्भयरूप दक्षिणा देकर एक स्थान वा संसार के पदार्थों से प्रस्थान करे ॥ १ ॥ यहां श्लोक प्रमाण कहते हैं ॥ २ ॥ सब प्राणियों को अभयदान देकर जो मुनि संन्यासी विचरता है उसको भी सब प्राणियों से कदापि कहीं भय नहीं है ॥ ३ ॥ सब प्राणियों को अभय दान देकर जो निवृत्ति मार्ग में चलता है। वह द्रव्यादि को ग्रहण करके भी होचुके वा होनेवाले सब दोषों को नष्ट कर देता है ॥ ४ ॥ विरक्त संन्यासी पुरुष संसार के सब कामों को त्याग देवे परन्तु एक वेद कात्याग न करे क्योंकि वेद का त्याग करने से शूद्र होजाता है तिससे वेद को न त्यागे ॥ ५ ॥ एक अक्षर ओंकार परमोत्तम वेद है, प्राणायाम उत्तम तप है । भिक्षा मांगकर परिमित सूक्ष्म भोजन करना उपवास करने से अच्छा और दान धर्म से दया बड़ी है ॥ ६ ॥ संन्यासी शिर के तथा दाढ़ी मूंछों के सब बाल मुंड़ाया करे, ममता को त्यागे, संसारी सुख के पदार्थों का संचय वा रक्षा न करे, गृहस्थों के घरों में धानादि कूटने पीसने खाने पकाने के समाप्त होजाने पर पहिले से जिनका संकल्प न किया हो ऐसे सात घरों से संन्यासी पकाये अन्न की भिक्षा मांगलावे और एकान्त में जाकर खावे ॥ ७ ॥ कौपीन (लंगोट.) के ऊपर एक धोती संन्यासी पहने उसी में से आधी ओढ़ लिया करे, अथवा मृग चर्म से श-