भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसहिता ॥ ३५

नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्न- वर्जी । ऋतौ च गच्छन्विधिवच्च जुह्वन्न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्म- लोकान्, ब्रह्मलोकादिति ॥ १७ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

वानप्रस्थो जटिलश्चीराजिनवासा ग्रामं च न प्रविशेत् ॥ १॥ न फालकृष्टमधिनिष्ठेत् ॥२॥ अकृष्टं मूलफलं संचिन्वी- त, ऊर्ध्वरेताः क्षमाशयः ॥ ३ ॥ मूलफलभैक्षेणाऽऽश्रमागत- मतिथिमभ्यर्चयेत् ॥ ४ ॥ दद्यादेव न प्रतिगृह्णीयात् ॥ ५ ॥ त्रिषवणमुदकमुपस्पृशेत् ॥६॥ श्रावणकेनाग्निमाधायाऽऽहि- ताग्निः स्याद्वृक्षमूलिकः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वं षड्भ्यो मासेभ्योऽन- ग्निरनिकेतः ॥ ८ ॥ दद्याद्देवपितृमनुष्येभ्यः स गच्छेत्स्वर्ग- मानन्त्यमानन्त्यम् ॥ ९ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

यज्ञोपवीत, एक जलपात्र गृहस्थ नित्य साथ रक्खे नीच वा पतितों के अन्न का त्याग रक्खे, नित्य वेदाध्ययन करे, ऋतुकाल में पत्नी से संग करे और शास्त्रोक्त विधि से नित्य होम करे ऐसा गृहस्थ ब्राह्मण ब्रह्मलोक को जन्मान्तर में प्राप्त होता है फिर वहां से च्युत नहीं होता ॥ १७ ॥

यह वासिष्ठ धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

वानप्रस्थ पुरुष जटाधारी, फटे चिथरा वस्त्र वा मृग चर्म को ओढ़े, गांव में न घुसे ॥ १ ॥ हल से जोती हुई भूमि पर न बैठे लेटे ॥ २ ॥ बिन जोती भूमि से उत्पन्न हुए मूल तथा फलों को भोजन के लिये लाया करे । ऊर्ध्वरेता (जिसका वीर्य नीचे को कदापि न गिरे) रहे पृथिवी पर सोया लेटा करे ॥ ३ ॥ कन्द मूल फल रूप भिक्षा से अपने आश्रम पर आये अतिथि का सत्कार करे ॥ ४ ॥ दिया ही करे किसी से कुछ न लेवे ॥ ५॥ सायं प्रातःकाल और मध्याह्न में तीनोंकाल स्नान सन्ध्यादि कृत्य किया करे ॥ ६ ॥ श्रावणक द्वारा अग्निस्थापन करके आहिताग्नि हो जावे । वृक्षों की जड़ों पर वृक्षों के नीचे निवास किया करे ॥ ७ ॥ फिर छः महिनों के बीतने पर अग्नि और एक स्थान का निवास त्याग देवे ॥८॥ देवयज्ञ, पितृयज्ञ, और अतिथियज्ञ द्वारा देव पितर और मनुष्यों को दिया करे तो वह अनन्त मोक्ष के आनन्द को प्राप्त होता है ॥ ९॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवम अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥