भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 724

३४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

कालेप्राप्तेअकालेवा नास्यानश्नन्गृहेवसेत् ॥ ८ ॥
श्रद्धाशीलोऽस्पृहयालुरलमग्न्याधेयाय नानाहिताग्निः स्यात् ॥९॥ अलं च सोमपानाय नासोमयाजी स्यात् ॥ १० ॥
युक्तः स्वाध्याये प्रजनने यज्ञे च ॥ ११ ॥ गृहेष्वभ्यागतं प्रत्युत्थानासनशयनवाक्सूनूताऽनसूयाभिर्मानयेत् ॥१२॥ यथाशक्ति चान्नेन सर्वभूतानि ॥ १३ ॥
गृहस्थ एवयजते गृहस्थस्तप्यतेतपः ।
चतुर्णाम्याश्रमाणांतु गृहस्थस्तुविशिष्यते ॥ १४ ॥
यथानदीनदाःसर्वे समुद्रेयान्तिसंस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणःसर्वे गृहस्थेयान्तिसंस्थितिम् ॥ १५ ॥
यथामातरमाश्रित्य सर्वेजीवन्तिजन्तवः ।
एवंगृहस्थमाश्रित्य सर्वेजीवन्तिभिक्षवः ॥ १६ ॥


होता है । अतिथि पुरुष समय कुसमय कभी आने पर बिना भोजन किये गृहस्थ्य के घर पर भूखा न वसे ॥ ८ ॥ निर्लोभ श्रद्धालु गृहस्थ अग्निस्थापन करने योग्य होता है । गृहस्थ पुरुष अनाहिताग्नि न रहे । किन्तु यथासम्भव अग्नि को अवश्य स्थापन करे ॥९॥ और वेषा गृहस्थ सोमयाग करने योग्य भी होता है इस से सोमयाग ( अग्निष्टोमादि ) भी करे ॥१०॥ वेदाध्ययन में यज्ञ करने में और सन्तानों के उत्पन्न करने में तत्पर रहे ॥ ११ ॥ अपने घर पर आये अभ्यागत को देखके उठना, आसन देना, लेटने को शय्या देना, कोमल वाणी बोलना और स्तुति प्रशंसा करना इत्यादि प्रकार से उसका मान्य करे ॥१२॥ यथाशक्ति अन्न देकर अन्य प्राणियों का भी आदर करे ॥१३॥ गृहस्थ ही यज्ञकरता, और गृहस्थ तप करता है इस कारण चारो आश्रमों में विशेष कर गृहस्थ उत्तम है ॥ १४ ॥ जैसे सब नद और नदियां इधर उधर चलती हुई समुद्र में जा कर ठहरती हैं वैसे ही जहां तहां घूमते हुए सब साधु संन्यासी ब्रह्मचारी गृहस्थ के यहां आ कर ठहर जाते हैं ॥१५॥ जैसे सब जीव अपनी अपनी माता का आश्रय लेकर जीवित रहते हैं । ऐसे ही सब भिक्षुक लोग गृहस्थ का आश्रय लेकर भोजनादि से जीविका निर्वाह करते हैं ॥१६॥