अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहित ॥ ३३
॥ ११ ॥ त्रिःकृत्वोऽभ्युपेयादपोऽभ्युपेयादपः । इति ॥ १२॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
गृहस्थो विनीतक्रोधहर्षो गुरुणाऽनुज्ञातः स्नात्वाऽस-
मानार्षामस्पृष्टमैथुनां यवीयसीं सदृशीं भार्यां विन्देत ॥१॥
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुभ्यः ॥ २ ॥ वैवाह्य-
मग्निमिन्धीत ॥ ३ ॥ सायमागतमतिथिं नावरुन्ध्यात् ॥४॥
नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥ ५ ॥
यस्यनाश्नातिवासार्थी ब्राह्मणोगृहमागतः ।
सुकृतंतस्ययत्किंचित्सर्वमादायगच्छति ॥ ६ ॥
एकरात्रंतु निवसन्मतिथिर्ब्राह्मणःस्मृतः ।
अनित्यंहि स्थितोयस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ७ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रंसांगतिकांस्तथा ।
में बैठा रहा करे ॥ ११ ॥ सायं प्रातःकाल और मध्यान्ह में तीनोंकाल जला-
शय के निकट जा कर शौचाचमनादिपूर्वक सन्ध्योपासनादि किया करे ॥१२॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
यदि वह गृहस्थाश्रम में रहे तो गुरु की आज्ञा से समावर्त्तन स्नान क- रके अधिक क्रोध हर्षका त्याग करताहुआ रागद्वेष रहित होके जिसका किसी पुरुष से संग न हुआ हो जो अपने गोत्र की न हो ऐसी युवति अपने तुल्य कुल सम्पत्तिआदि वाली स्त्री से विवाह करे ॥१॥ मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी की अथवा पितृ कुल की सातवीं पीढ़ी की कन्या से भी विवाह हो सकता है ॥ २ ॥ फिर गृह्याग्नि को विवाह की वेदी से ला कर विधिपूर्वक स्थापित करे ॥ ३ ॥ सायंकाल में आये अभ्यागत का अनादर न करे ॥ ४ ॥ बिना भो- जन किया अतिथि गृहस्थ के घर पर भूखा न पड़ा रहे ॥ ५ ॥ जिस के घर में ठहरने को आया ब्राह्मण भोजन मिले बिना भूखा रहता है । उस गृहस्थ के जन्मभर में किये सब पुण्य को लेजाता है ॥ ६ ॥ एक दिन निवास करने से अनित्य स्थिति होने के कारण ब्राह्मण अतिथि कहाता है ॥ ७ ॥ अपने ही गांव में रहने वाला तथा पहिले से मेली मिलापी ब्राह्मण अतिथि नहीं क-