अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 722, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नसुवृत्तंनदुर्वृत्तं वेदकश्चित्सब्राह्मणोब्राह्मण ॥ इति ॥४१॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
चत्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकाः ॥ १ ॥ तेषां वेदमधीत्य वेदौ वा वेदान्वाऽविशीर्णब्रह्मचयर्यो यमिच्छेत्तमावसेत् ॥ २ ॥ ब्रह्मचार्याचार्यं परिचरेत् ॥ ३ ॥ आशरीरविमोक्षात् ॥ ४॥ आचार्ये प्रमीतेऽग्निं परिचरेत् ॥५॥ विज्ञायते हि तत्राग्निरारचार्यइति ॥ ६ ॥ संयतवाक्चतुर्थषष्ठाष्टमकालभोजी भैक्षमाचरेत् ॥ ७ ॥ गुर्वधीनो जटिलः शिखाजटो वा गुरुं गच्छन्तमनुगच्छेत् ॥ ८ ॥ आसीनं च तिष्ठञ्शयानं चासीन उपासीत ॥ ९ ॥ आहूताध्यायी सर्वं लब्धं निवेद्य तदनुज्ञया भुञ्जीत ॥ १० ॥ खट्वाशयनदन्तप्रक्षालनाञ्जनाभ्यञ्जनापानच्छत्रवर्जी तिष्ठेदहनि रात्रावासीत
शान्तस्वरूप पूर्णतत्त्वज्ञानी वैराग्यवान् पूरा वा उत्तम कोटिका ब्राह्मण है ॥४१॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये चार आश्रम कहाते हैं ॥१॥ प्रथम एक दो वा तीनों वेदों को अङ्गों सहित पढ़ जानके ब्रह्मचर्य जिस का स्खलित न हुआ हो ऐसा हो कर जिस आश्रम में रहने की इच्छा हो उसी में ठहरे ॥ २ ॥ यदि ब्रह्मचारी रहे तो आचार्य की सेवा करे इसी में अपने इष्ट की पूर्ण सिद्धि माने ॥ ३ ॥ जीवन भर गुरुसेवा करे ॥ ४ ॥ गुरु का स्वर्गवास हो जाने पर अग्नि की सेवा करे ॥ ५ ॥ क्योंकि श्रुति में लिखा है कि ( तेरा आचार्य अग्नि है ) ॥६॥ वाणी को वश में रक्खे। चौथे छठे वा आठव प्रहर में एकबार भोजन करे ॥ ७ ॥ गुरु के अधीन रहे। सब जटा रखावे वा केवल शिखामात्र रक्खे। चलते हुए गुरु जी के पीछे २ चला करे ॥८॥ गुरु बैठे हों तब खड़ा रहे और लेटे हों तो बैठाहुआ उपासना करे ॥ ९ ॥ पढ़ने को गुरु बुलावें तब जा कर गुरु के समीप में पढ़े। प्राप्तहुए भिक्षादि सब पदार्थों को गुरु की सेवा में निवेदन करके गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१०॥ खटिया पर सोना, दातौन करना, आंखों में अञ्जन, शरीर में तैल लगाना, जूता और छाता इन सब का त्याग रक्खे। विशेष कर दिनमें खड़ा रहे रात्रि