अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 759, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ६९
या पितृगृहेऽसंस्कृता कामादुत्पादयेत्, मातामहस्य पुत्रो भ-
वतीत्याहुः ॥ २३ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २४ ॥
अप्रत्तादुहितायस्य पुत्रंविन्देततुल्यतः ।
पुत्रीमातामहस्तेन दद्यात्पिण्डंहरेद्धनम् , इति ॥ २५ ॥
गृहे च गूढोत्पन्नः षष्ठः ॥ २६ ॥ इत्येते दायादा बान्ध-
वास्त्रातारो महतो भयादित्याहुः ॥ २७ ॥ अथादायादबन्धू-
नां सहोढएव प्रथमो या गर्भिणी संस्क्रियते तस्यां जातः
सहोढः पुत्रो भवति ॥ २८ ॥ दत्तको द्वितीयो यं मातापितरौ
दद्याताम् ॥२९॥ क्रीतस्तृतीयस्तच्छुनःशेपेन व्याख्यातम् ॥३०॥
हरिश्चन्द्रो हवै राजा सोऽजीगर्तस्य सौयावसेः पुत्रं चिक्राय
॥ ३१ ॥ स्वयं क्रीतवान् स्वयमुपागतश्चतुर्थः, तच्छुनःशेपेन
व्याख्यातम् ॥ ३२ ॥ शुनःशेपो हवै यूपे नियुक्तो देवतास्तु-
वश होकर किसी से पुत्र को उत्पन्न करे वह कानीन अपने मातामह—नाना का पुत्र होता ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥२३॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि॥ २४ ॥ बिना विवाही जिस की पुत्री अपने तुल्य पुरुष से पुत्र को प्राप्त होतो नाना उस पुत्र से पुत्र वाला हो जाता है वह कानीन पुत्र अपने नाना का पिण्डदान करे और धन का दायभागी (वारिस) बने ॥ २५ ॥ अपने घर में गुप्त रूप से उत्पन्न हुआ गूढोत्पन्न छठा पुत्र है ॥२६॥ ये छहों पुत्र पिता के धन के दायभागी और बड़े भय से बचाने वाले हैं ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥ २७ ॥ अब अदायाद (जो पिता के धन में हक़दार नहीं उन) पुत्रों में पहिला सहोढ कहाता है। जो स्त्री गर्भवती हो तब जिस के साथ गर्भिणी का विवाह हो उस स्त्री से उत्पन्न हुआ सहोढ पुत्र होता है ॥२८॥ माता पिता ने जिस को दे दिया वह उस का द्वितीय दत्तक पुत्र कहाता है ॥२९॥ धन देकर मोल लिया तीसरा क्रीत पुत्र कहाता है कि जैसे शुनःशेप ऋषि हुए ॥३०॥ हरिश्चन्द्र नामक राजा हुआ था उस ने सूयवस के सन्तान अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को द्रव्य देकर खरीद लिया ॥ ३१ ॥ स्वयं राजा ने खरीदा और शुनःशेप अपनी इच्छा से स्वयं राजा के निकट आगया इस से चौथा क्रीत पुत्र शुनःशेप के साथ व्याख्यात जानो ॥ ३२ ॥ फिर शुनःशेप यज्ञ के यूपस्तम्भ में बांधा गया, वहां उस ने मन्त्रों द्वारा देवता