भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ३९

यदि ब्राह्मणस्य ब्राह्मणीक्षत्रियावैश्यासु पुत्राः स्युस्त्र्यं- शं ब्राह्मण्याः पुत्रो हरेत, द्व्यंशं राजन्यायाः पुत्रः सम- मितरे विभजेरन् ॥४४॥ येन चैषां स्वयमुत्पादितं स्याद् द्व्यंश मेव हरेत् ॥ ४५ ॥ अनंशास्त्वाश्रामान्तरगताः ॥ ४६ ॥ क्लीवो- न्मत्तपतिताश्च ॥ ४७ ॥ भरणं क्लीवोन्मत्तानाम् ॥४८॥ प्रेत- पत्नी षण्मासान् व्रतचारिण्यक्षारलवणं भुञ्जानाऽधःशयीतो- र्ध्वं षड्भ्यो मासेभ्यः स्नात्वा श्राद्धं च पत्ये दत्त्वा विद्याकर्म गुरुयोनिसंबन्धान् सन्निपात्य पिता भ्राता वा नियोगं कार- येत्तपसे ॥४९॥ न सोन्मत्तामवशां व्याधितां वा नियुञ्ज्यात् ॥५०॥ ज्यायसीमपि षोडशवर्षाणि, नचेदामयावी स्यात्॥५१॥

यदि ब्राह्मण की ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या ये तीनों वर्ण की विवाहित स्त्रियां हों और उन सब में पुत्र उत्पन्न हुए हों तो तीन भाग ब्राह्मणी के पुत्र को, दो भाग क्षत्रिया के पुत्र को मिलें और बाकी बचे पुत्र बराबर भाग बांट लेवें ॥ ४४ ॥ इन पुत्रों में से जिस ने जितना धनादि स्वयं पैदा किया हो उस में से भी वह दो ही भाग लेवे ॥ ४५ ॥ गृहाश्रम से भिन्न आश्रम में गये भाई लोग पिता के धन में दायभागी नहीं हैं ॥ ४६ ॥ नपुंसक, उन्मत्त ( पागल ) और पतित भाई भी दायभागी नहीं हैं ॥ ४७ ॥ नपुंसक और उन्मत्तों को भी भोजन वस्त्र मिलना चाहिये ॥ ४८ ॥ मरे हुए पुरुष की पत्नी छः महिने तक खार और लवण को छोड़ कर हविष्य भोजन करती हुई व्रत करके पृथ्वी पर सोवे छः महिने के उपरान्त स्नान कर पति का श्राद्ध करके, पति को विद्या पढ़ाने और कर्म कराने वाले गुरु लोगों और पति के भाई आदि की सभा करके सबकी राय होतो स्त्री के लिये सन्तान की विशेष अपेक्षा होने पर स्त्री का पिता वा भाई तप के लिये नियोग करा देवे ( कि उत्पन्न हुआ सन्तान मृत पिता का स्थानापन्न होकर श्राद्धादि कर्म रूप तप करेगा ) ॥४९॥ यदि वह मृत पुरुष की पत्नी उन्मत्त ( पागल ) स्वेच्छा चारिणी अथवा रोगिणी होतो वह पितादि नियोग न करावे ॥ ५० ॥ यदि उन्मत्तादि न हो किन्तु श्रेष्ठ हो तो भी सोलह वर्ष की आयु से पहिले नियोग न करावे । और जिस से नियोग कराना चाहे वह भी रोगी न हो ॥ ५१ ॥ नियुक्त पु-