भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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७२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

प्राजापत्ये मुहूर्त्ते पाणिग्राहवदुपचरेत् ॥ ५२ ॥ अन्य- त्र संप्रहास्याद् वाक्पारुष्याद् दण्डपारुष्याच्च ॥ ५३॥ ग्रासा- च्छादनस्नानानुलेपनेषु प्राग्गामिनी स्यात् ॥ ५४ ॥ अनि- युक्तायामुत्पन्न उत्पादितुः पुत्रो भवतीत्याहुः ॥ ५५ ॥ स्या- च्चेन्नियोगिनो रिक्थम् ॥ ५६॥ लोभान्नास्ति नियोगः ॥ ५७ ॥ प्रायश्चित्तं वाऽप्युपनियुञ्ज्यादित्येके ॥५८ ॥ कुमार्यृतुमती त्रीणि वर्षाण्युपासीतोर्ध्वं त्रिभ्यो वर्षेभ्यः पतिं विन्देत्तुल्यम् ॥ ५९ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६० ॥ पितुःप्रमादान्नुयदीहकन्या वयःप्रमाणंसमतीत्यदीयते । साहन्तिदातारमुदीक्षमाणा कालातिरिक्तागुरुदक्षिणेव ॥६१॥ प्रयच्छेन्नग्निकांकन्यामृतुकालभयात्पिता ।

रुप चार घड़ी रात रहे विवाहित पति के तुल्य नियुक्ता स्त्री से व्यवहार करे ॥ ५२ ॥ परन्तु स्त्री के साथ उपहास वा किसी प्रकार की बात चीत न करे । न धमकावे और किसी अनुचित को देख कर मृत पति के तुल्य नियुक्त पुरुष को पीटने का भी अधिकार नहीं है ॥ ५३ ॥ भोजन वस्त्र स्नान और अनुलेपन इन कामों में पूर्व मृत पति के ध्यान से चलने वाली हो अर्थात् नियुक्त को पति मान भोजनादि न करे ॥५४॥ नियुक्त न हुई अन्य की स्त्री में उत्पन्न किया पुत्र उत्पादक पुरुष का होगा ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥५५॥ यदि नियुक्ता स्त्री में उत्पन्न पुत्र भी उत्पादक का हो तो वह नियुक्त पिता के धन का भागी होगा ॥ ५६ ॥ काम भोगादि के लालच से नियोग नहीं है ॥ ५७ ॥ लोभ से नियोग करने में कोई आचार्य प्रायश्चित्त करना कहते हैं ॥ ५८॥ यदि पिता वा भाई कन्या का विवाह न करें और वह ऋतुमती (रजस्व- ला ) होने लगे तो तीन वर्ष तक रजस्वला होती हुई पितादि की बाट देखे । तीन वर्ष के उपरान्त अपने तुल्य योग्य वर से स्वयं विवाह कर लेवे ॥ ५९ ॥ इस पर श्लोकों का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६० ॥ गृहस्थाश्रम में पिता के प्रमाद से यदि कन्या ऋतुमती होने पर विवाही जाती है तो वह कन्या विवाह की बाट देखती हुई कन्यादान करने वाले का नाश करती है । जैसे कि देने का समय निकल जाने पर गुरु को दी दक्षिणा शिष्य का नाशक करती है ॥ ६१ ॥ रजस्वला होने का अवसर आने से पहिले ऋतुमती होने के भय