अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 767, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९९
सोऽसंवृतंतमोधोरं सहतेनप्रपद्यते, इति ॥ १३ ॥
व्रणद्वारेकृमिर्यस्य संभवेत्कदाचन ।
प्राजापत्येन शुद्ध्येत हिरण्यं गौर्वासो दक्षिणा, इति ॥१४॥
नाग्निं चित्वा रामामुपेयात् ॥ १५॥ कृष्णवर्णा या रा-
मा रमणायैव न धर्माय न धर्मायेति ॥ १६ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
स्वधर्मो राज्ञः पालनं भूतानां तस्यानुष्ठानात्सिद्धिः ॥१॥
भयकारुण्यहान जरामर्यं वै तत् सत्रमाहुर्विद्वांसस्तस्माद्गा-
र्हस्थ्यानैयमिकेषु पुरोहितं दध्यात् ॥ २॥ विज्ञायते ॥ ३ ॥
ब्रह्मपुरोहितो राष्ट्रमृध्नोतीति ॥ ४ ॥ उभयस्य पालनासाम-
र्थ्याच्च देशधर्मजातिकुलधर्मान् सर्वानिवैताननुप्रविश्य रा-
जा चतुरो वर्णान् स्वधर्मे स्थापयेत् ॥५॥ तेष्वपचरत्सु दण्डं
वह उस शूद्र के सहित विस्तृत घोर अन्धकार रूप नरक को प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ जिस ब्राह्मण के फोड़े में कदाचित् कीड़े पड़ जावें वह प्राजापत्य व्रत करके सुवर्ण, गौ और वस्त्र दक्षिणा में देवे तब शुद्ध होता है ॥ १४ ॥ अग्नि-चयन यज्ञ करके सुन्दरी स्त्री से फिर संग न करे ॥ १५ ॥ काले वर्ण की सुन्दरी स्त्री रमण के लिये ही हो सकती है किन्तु उस को पत्नी बना कर दान यज्ञादि धर्म कृत्य न करे ॥ १६ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१८॥
सब प्राणियों की रक्षा करना राजा का निज धर्म है उसो निज धर्म के ठीक २ धर्मानुकूल करने से राजा की सिद्धि होती है ॥ १ ॥ वृद्ध होके समरण पर्यन्त सेवन करने को राजा का यह राजधर्म रूप सत्र यज्ञ विद्वानों ने कहा है कि जिस में भय तथा दया दोनों का त्याग है । तिस से गृहाश्रम के नित्य नैमित्तिक वेदशास्त्रोक्त काम करने के लिये राजा एक विद्वान् को पुरोहित नियत करे । राजा को अग्निहोत्रादि का अवकाश न होने से राज पुरोहित ही उन कामों को राजा की ओर से किया करे ॥ २ ॥ श्रुति से जाना जाता है कि ॥ ३ ॥ अथर्ववेदी राजपुरोहित के ठीक योग्य होने पर राज्य की उन्नति होती है ॥ ४ ॥ अपना निज धर्म तथा वेदाध्ययन, यज्ञ करना, दान देना, इस दोनों प्रकार के धर्म की रक्षा एक से न हो सकने के कारण पुरोहित सहित करे और देश धर्म जाति धर्म, और कुल धर्म इन सब में प्रवेश (यथोचित ज्ञान) करके चारो वर्णों को अपने २ धर्म पर स्थापित करे ॥ ५ ॥ ये ब्राह्मण आदि वर्ण