अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 769, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९९
निरुदकस्तरोमोष्योऽकरः श्रोत्रियो राजपुमाननाथप्रव्रजित-वालवृद्धतरुणप्रदातारः प्राग्गामिकोः कुमार्यो मृतपत्न्यश्च॥१५॥ बाहुभ्यामुत्तरञ्छतगुणं दद्यात् ॥ १६ ॥ नदीकक्षवनदाहशैलोपभोगा निष्कराः स्युस्तदुपजीविनो वा दद्युः ॥१७ ॥ प्रति मासमुद्वाहकरं त्यागमयेद्राजनि च प्रेते दद्यात्प्रासङ्गिकम् ॥ १८ ॥ एतेन मातृवृत्तिर्व्याख्याता ॥ १९ ॥ राजमहिष्याः पितृव्यमातुलान् राजा बिभृयात्तद्बन्धूंश्चान्यांश्च ॥ २० ॥ राजपत्न्या ग्रासाच्छादनं लभेरन् ॥ २१ ॥ अनिच्छन्त्यो वा प्रव्रजेरन् ॥ २२ ॥ क्लीबोन्मत्तान् राजा बिभृयात्तद्गामित्वादृक्थस्य ॥ २३॥ शुल्के चापि मानवं श्लोकमुदाहरन्ति ॥२४॥ नभिन्नकार्षापणमस्तिशुल्के नशिल्पवृत्तौनशिशौनदूते ।
हीन खेत, वर्षा से डूबनेवाले खेत, और जिनके अन्न को चोर लेजाते हों ऐसे खेतोंपर कर न लेवे। वेद पाठी, तथा राजकर्मचारियों से भी कर न लेवै। अनाथ, साधु संन्यासी, बालक, वृद्ध, और ब्रह्मचारियों को भोजनादि देनेवाले, कुमारी स्त्री और जिन के पति मरगये हों ऐसी विधवाओं से भी कर नहीं लेना चाहिये ॥ १५ ॥ भुजाओं के द्वारा नदी के पार जानेवाला सौगुणा दण्ड देवे ॥ १६ ॥ नदी का कछार, जलनेवाले बन के खेत और पर्वत के खेतों पर कर न बांधे वा कछार आदि से जिनकी जीविका हो उन लोगों से प्रति मास उचित कर लिया करे ॥ १७ ॥ विवाहों पर भी यथोचित कर लिया करे। और राजा का स्वर्गवास होने पर वा किसी उत्सव पर प्रजा को भोजनादि प्रसङ्गानुसार दिया करे ॥ १८ ॥ इससे राजा में माता कासा वर्त्ता सिद्ध होता है कि सन्तान लोग धनादि लार के माता को देवें और माता फिर उन्हीं को खिलावे ॥ १९॥ राज महिषी (मुख्य रानी) के चाचा, मामा, भाई, तथा अन्य कृपापात्रों का राजा भरण पोषण करे ॥ २० ॥ राजा की अन्य स्त्रियों को भोजन वस्त्रादि मिला करे ॥ २१ ॥ यदि राजपत्नी भोजन वस्त्र न चाहें तो भलेही विरक्त होकर तप करें ॥ २२ ॥ नपुंसक (हिजड़ों) और पागलों की राजा रक्षा करे क्योंकि उनके धनादि का मालिक राजा ही है ॥ २३ ॥ महसूल लेने में भी मनुजी के श्लोक का प्रमाण देते हैं ॥ २४ ॥ महसूल में फूटा रुपया नहीं लेवे। कारीगरी, बालक, दूत, भिक्षावृत्ति, चोरी वा लूट से बचे,