अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 772, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ वसिष्ठस्मृतिः ॥
द्वादशरात्रं चरित्वा निर्विशेत तां चैवोपयच्छेत् ॥ ८ ॥ अथ परिविविदानः कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चरित्वा तस्मै दत्त्वा पुनर्नि- विशेत तामेवोपयच्छेत् ॥९॥ अग्रेदिधिषूपतिः कृच्छ्रं द्वादश रात्रं चरित्वा निर्विशेत तां चैवोपयच्छेत् ॥१०॥ दिधिषूपतिः कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चरित्वा तस्मै दत्त्वा पुनर्निर्विशेत ॥ ११ ॥ वीरहणं परस्ताद्वक्ष्यामः ॥ १२ ॥ ब्रह्मोञ्झः कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरित्वा पुनरुपयुञ्जीत वेदमाचार्यात् ॥ १३ ॥ गुरुतल्पगः सतृषणं शिश्नमुत्कृत्याञ्जलावाधाय दक्षिणामुखो गच्छेत् ॥१४॥ यत्रैव प्रतिहन्यात्तत्र तिष्ठेदाप्रलयम् ॥ १५ ॥ निष्कालको वा घृताभ्यक्तस्तप्तां सूर्मिं परिष्वजेन्मरणात्पूतो भवतीति विज्ञा-
से विवाह कर लेवे ॥८॥ और उस का छोटा भाई परिवेत्ता कृच्छ्र अतिकृच्छ्र दोनों व्रत बारह २ दिन करके अपनी स्त्री को बड़े भाई को समर्पण करके ठ- हर जावे पश्चात् बड़े भाई की आज्ञा होने पर उसी स्त्री को स्वीकार करलेवे ॥ ९ ॥ ज्येष्ठ भगिनी का विवाह होने से पहिले छोटी भगिनी से विवाह करने वाला पुरुष दिधिषूपति कहाता है और ज्येष्ठ भगिनी के साथ पीछे से विवाह करने वाला अग्रेदिधिषूपति कहाता वह बारह दिन तक कृच्छ्र व्रत करके ठहर जावे फिर उसी स्त्री को स्वीकार करे ॥ १० ॥ और छोटी के साथ विवाह करने वाला बारह २ दिन तक कृच्छ्र अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करके उस ज्येष्ठ भगिनी के पति को अपनी स्त्री समर्पित करके ठहर जावे पीछे उसकी आज्ञा से स्वीकार करे॥ ११॥ विधि से स्थापित किये अग्नि को त्यागने वाले के विषय में आगे प्रायश्चित्त कहेंगे ॥१२॥ पढ़ेहुए वेद को भुला देने वाला पुरुष बारह दिन तक कृच्छ्र व्रत करके भूलेहुए वेद को फिर गुरुमुख से पढ़ लेवे ॥१३॥ गुरुपत्नी से संग करने वाला पुरुष अण्डकोषों सहित लिङ्गेन्द्रिय को काटकर दोनों हाथों की अञ्जली में धरके दक्षिण दिशा को बराबर चला जावे ॥१४॥ जब कुछ भी न चला जाय अर्थात् अत्यन्त थक जावे तब वहीं प्राणान्त होने तक खड़ा रहे ॥१५॥ अथवा उक्तरीति से प्राणान्त न हो तो लोहे की प्रतिमा को अत्यन्त तपाकर अपने शरीर में घृत लगाके उस लोह की प्रतिमा से लिपट जावे ऐसे जल कर मरजाने से शुद्ध निष्पाप हो जाता है यह श्रुति से जाना