भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 773

. भाषार्थसहिता ॥ ८३

यते ॥१६॥ आचार्य्यपुत्रशिष्यभार्य्यासु चैवम्॥ १७ ॥ योनिषु च गुर्वी सखीं गुरुसखीमपपात्रां पतितां च गत्वा कृच्छ्राब्द- पादं चरेत् ॥ १८ ॥ एतदेव च चाण्डालपतितान्नभोजनेषु,त- तः पुनरुपनयनं, वपनादीनां तु निवृत्तिः ॥ १९ ॥ मानवंचा- त्र श्लोकमुदाहरन्ति ॥ २० ॥ वपनंमेखलादण्डो भैक्षचर्याव्रतानिच । निवर्त्तन्तेद्विजातीनां पुनःसंस्कारकर्मणि, इति ॥ २१ ॥ मत्या मद्यपाने त्वसुरायाऽज्ञाने कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ घृतं प्राश्य पुनःसंस्कारश्च ॥२२॥ मूत्रशकृच्छुक्राभ्यवहारेषु चैवम्॥२३॥ मद्यभाण्डेस्थिताआपो यदि कश्चिद्विजःपिबेत् । पद्मोदुम्बरबिल्वपलाशानामुदकं पीत्वा त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति ॥ २४ ॥ अभ्यासेतु सुराया अग्निवर्णां तां द्विजः


गया है ॥१६॥ आचार्य की, पुत्र की, और शिष्य की पत्नी से गमन करने पर भी यही प्रायश्चित्त है ॥१७॥ मित्र की पत्नी, गुरु के मित्र की पत्नी, अन्त्यज नीच की, और पतित स्त्री से संग करके तीन मास तक कृच्छ्र व्रत करे ॥१८॥ चाण्डाल और पतितों के अन्न के भोजनों में भी यही प्रायश्चित्त है उस प्रायश्चित्त के बाद मुण्डन कराये बिना ही फिर से उपनयन संस्कार करावे ॥ १९ ॥ इस विषय में मनु जी के श्लोक का प्रमाण भी कहते हैं कि ॥ २० ॥ शिर मुंड़ाना, मेखला, दण्ड, भिक्षा मांगना, और रस त्यागादि नियम, ये सब काम द्विजों का पुनः संस्कार होने के समय निवृत्त हो जाते हैं अर्थात फिर से उपनयन करने में मुण्डनादि की आवश्यकता नहीं है ॥ २१ ॥ पदार्थों को सड़ाकर बनाया मादक (नशाकारी) वस्तु अनेक प्रकार का मद्य कहाता है । गुड़, आटा और महुआ से बनी सुरा कहाती है । उसमें सुरा वा असुरा को नजानकर मद्य के पीने पर कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र दोनों व्रत कर तथा घी का प्राशन करके फिर से उपनयन संस्कार करके शुद्ध होता है ॥ २२ ॥ विष्ठा, मूत्र और वीर्य के खालेने पर भी यही उक्त प्रायश्चित्त जानो ॥ २३ ॥ मद्य के पात्र में रक्खे हुए जल को यदि कोई द्विज पीले तो कमल, गूलर, बेल (बिल्व) और ढांक के पत्तों को उबाल के निकाले जलमात्र को पीकर तीन दिन रात व्रत करने से शुद्ध हो जाता है ॥ २४ ॥ बहुत दिनों तक नित्य के अभ्यास से सुरा पीवे तो द्विज

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