अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
पिबेन्मरणात्पूतो भवतीति ॥२५॥ भ्रूणहनं वक्ष्यामो ब्राह्मणं हत्वा भ्रूणहा भवत्यविज्ञातं च गर्भमविज्ञाता हि गर्भाः पुमांसो भवन्ति॥२६॥तस्मात् पुंकृत्याऽऽजुहुतीति, भ्रूणहाग्निमुपसमाधाय जुहुयादेताः ॥ २७ ॥ लोमानि मृत्योर्जुहोमि लोमभिर्मृत्युं वासय, इति प्रथमाम् ॥२८॥ त्वचं मृत्योर्जुहोमि त्वचा मृत्युं वासय,इति द्वितीयाम् ॥२९॥ लोहितं मृत्योर्जुहोमि लोहितेन मृत्युं वासय, इति तृतीयाम् ॥३०॥ मांसं मृत्योर्जुहोमि मांसेन मृत्युं वासय, इति चतुर्थीम् ॥ ३१ ॥ स्नावानि मृत्योर्जुहोमि स्नावभिर्मृत्युं वासय, इति पञ्चमीम् ॥ ३२ ॥ मेदो मृत्योर्जुहोमि मेदसा मृत्युं वासय, इति षष्ठीम् । ३३। अस्थीनि मृत्योर्जुहोमि अस्थिभिर्मृत्युं वासय, इति सप्तमीम् ॥ ३४ ॥ मज्जानं मृत्योर्जुहोमि मज्जभिर्मृत्युं वासय, इत्यष्टमीमिति॥३५॥
पुरुष अग्निवर्ण सुरा पीकर मरजाने पर शुद्ध होता है ॥२५॥ अब भ्रूण हत्यारे का विचार कहते हैं । ब्राह्मण को तथा अविज्ञात (कि पुत्र है वा पुत्री ऐसा चिन्ह न बन पाने से नहीं जाना गया ऐसे) ब्राह्मणी के गर्भ को गिरा के मनुष्य भ्रूण हत्यारा होता है । क्योंकि अविज्ञात गर्भ-पुरुष माने जाते हैं यह धर्मशास्त्रकारों की माननीय राय है ॥ २६ ॥ तिससे "पुरुष सम्बन्धी क्रिया से भ्रूणहत्या के प्रायश्चित्त में होम करते हैं,, ऐसा श्रुति में कहा है । भ्रूणहत्यारा अग्नि को सामने स्थापित करके आधानादि सामान्य विधिपूर्वक निम्नलिखित आहुति करे ॥ २७ ॥ (लोमानि०-वासय-स्वाहा) इस प्रकार ३५ सूत्र तक कही आठो आहुति स्वाहान्त मन्त्र बोल कर घी से करे । अर्थ--मृत्यु के लिये लोमों को होमना हूं । हे अग्ने देव ! लोमों के साथ मृत्यु को वसाओ ! यह मेरी वाणी सत्य हो ॥ २८ ॥ इसी प्रकार त्वचा, रुधिर, मांस, स्नावा (नाड़ी नसें) मेद, अस्थि (हड्डी) और मज्जा इन सब का मृत्यु के लिये होम और इन के साथ मृत्यु का निवास दिखाना होम के मन्त्रों का आशय है । अर्थात होम करनेवाला कहे कि मेरे शरीर के लोमादि भाग (बह्य-साक्षा) मरण समय में मृत्यु के साथी बनें, और मृत्यु का निवास उन्हीं के साथ रहे किन्तु मृत्यु मुझ पर कृपा कर मेरे साथ आगे को सम्बन्ध तोड़ देवे तो मैं अमृत मोक्ष का अधिकारी बनूं ॥ ३०-३५ ॥ राजा की वा ब्राह्मण की रक्षा के