भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ८५

राजार्थे ब्राह्मणार्थे वा संग्रामेऽभिमुखमात्मानं घातयेत्त्रिर्- जितो वाऽनपराङ्ङः पूतो भवतीति ॥३६॥ विज्ञायते हि ॥३७॥ निरुक्तं ह्येनः कनीया भवतीति ॥३८॥ तथाऽप्युदाहरन्ति॥३९॥ पतितंपतितेत्युक्त्वा चौरंचौरेतिवापुनः । वचसातुत्यदोषःस्यान् मिथ्याद्विर्दोषतांत्र जेत्, इति ॥४०॥ एवं राजन्यं हत्वाऽष्टौ वर्षाणि चरेत्, षड्वैश्यं, त्रीणि शूद्रं, ब्राह्मणीं चात्रेयीं हत्वा, सवनगतौ च राजन्यवैश्यौ ॥ ४१ ॥ आत्रेयीं वक्ष्यामा-रजस्वलामृतुस्नातामात्रेयीमाहुः ॥ ४२ ॥ अत्र ह्येष्यदपत्यं भवतीति ॥ ४३ ॥ अनात्रेयीं राज- न्याहिंसायां राजन्यां वैश्यहिंसायां वैश्यां शूद्रहिंसायां शूद्रां हत्वा संवत्सरम् ॥ ४४ ॥ ब्राह्मणसुवर्णहरणं प्रकीर्य्य केशान् राजानमभिधावेत् स्तेनोऽस्मि भोः शास्तु मां भवानिति तस्मै

लिये संमुख युद्ध करना अपना घात करा देवे । ऐसा तीन वार युद्ध करने पर भी शत्रुओं से न जीता जाय ( न मरे ) तो भी निरपराध हुआ शुद्ध होजाता है ॥ ३६ ॥ श्रुति में भी कहने से जाना जाता है कि ॥ ३७ ॥ प्रकाशित प्रसिद्ध किया अपराध घटजाता है ॥ ३८ ॥ वैसा भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ३९ ॥ पतित को पतित और चोर को चोर ऐसा कहकर निकृष्ट शब्द के बोलने से वाणीमात्र का दोष लगता है। परन्तु जो चोरादि नहीं उसको चोरादि मिथ्या कहे तो वक्ता को द्विगुणा दोष लगता है ॥ ४० ॥ इसी प्रकार क्षत्रिय को मारके आठ वर्ष, वैश्य को मारके छः वर्ष, यज्ञ प्राप्त-क्षत्रिय, वैश्य, रजस्वला हो के शुद्ध हुई ब्राह्मणी और शूद्र को मारकर तीन वर्षतक कृच्छ्रव्रत प्रायश्चित्त करे ॥ ४१ ॥ रजस्वला होकर ऋतुकाल में स्नान की ब्राह्मणी को आत्रेयी कहते हैं ॥ ४२ ॥ क्योंकि इस ब्राह्मणी में अभीष्ट सन्तान उत्पन्न होता है ॥४३॥ जो तत्काल रजस्वला न हो चुकी हो ऐसी क्षत्रिय कन्या को मारकर क्षत्रिय हिंसा में, वैश्य स्त्री को मारने पर वैश्यहिंसा में और वैसी शूद्रा स्त्री को मार कर शूद्रहत्या मध्ये एक वर्ष तक कृच्छ्र व्रत प्रायश्चित्त करे ॥४४॥ ब्राह्मण का सुवर्ण चुराने पर द्विज मनुष्य केशों को बिखेरे हुए बलपूर्वक दौड़ता हुआ राजा के पास जावे और राजा से कहे कि "स्तेनोऽस्मि भोः शास्तु मां भवान्,, मैं चोर