भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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८६ वसिष्ठस्मृतिः ॥

राजीदुम्बरं शस्त्रं दद्यात्तेनात्मानं प्रमापयेन्मरणात् पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ ४५ ॥ निष्कालको वा घृताक्तो गोम- याग्निना पादप्रभृत्यात्मानमभिदाहयेन्मरणात्पूतो भवतीति विज्ञायते ॥ ४६ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ४७ ॥ पुराकालात्प्रमीतानां पापाद्विविधकर्मणाम् । पुनरापन्नदेहानामङ्गंभवतितच्छृणु ॥ ४८ ॥ स्तेनःकुनखीभवति श्वित्रीभवतिब्रह्महा । सुरापःश्यावदन्तस्तु दुश्चर्मागुरुतल्पगः, इति ॥ ४९ ॥ पतितसंप्रयोगं च ब्राह्मेण वा यौनेन वा यास्तेभ्यः स- काशान्मात्रा उपलब्धास्तासां परित्यागस्तैश्च न संवसेदुदी- चीं दिशं गत्वानश्नन् संहिताध्ययनमधीयानः पूतो भवती- ति विज्ञायते ॥ ५० ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५१ ॥

हूं आप मुझ को दण्ड दीजिये । तब राजा उसके हाथ में गूलर वृक्ष का मोटा लट्ठ देवे उससे अपने को मारडाले मरजाने से पवित्र होता ऐसा श्रुति से जाना जाता है ॥ ४५ ॥ यदि उक्तरीति से न मरे तो शरीर में घी लगा कर कण्डों के अतिप्रज्वलित अग्निमें अपने शरीर को जलाकर भस्म करे । इस प्रकार मर जाने से प्राने को पवित्र हो जाते हैं ऐसा श्रुति से जाना जाता है ॥ ४६ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ४७ ॥ नाना प्रकार के प्रबल दुष्कर्मी सम्बन्धी पापों से क्षीणायु होकर मृत्यु के समय से पहिले ही मरे मनुष्यों का जन्मान्तर में जैसा शरीर होता है सो सुनो ॥ ४८ ॥ ब्राह्मण के सुवर्ण को चुरानेवाले के नख बिगड़े हुए होते, ब्रह्म हत्यारा श्वेत कुष्ठी होता, मद्य पीनेवाले के काले दांत होते और गुरुस्त्रीगामी की त्वचा बिगड़ी होती है ॥ ४९ ॥ ऐसे पतितों के साथ वेदादि शास्त्रों के पठन पाठन रूप से वा विवाहरूपसे जो कोई मेल मिलाप सम्बन्ध करे उसने जो कुछ धनादि पदार्थ का अंश पतितों से लिया हो उसका प्रथम त्याग करे और फिर उनके साथ न बसे। फिर उत्तर दिशा में एकान्त शुद्ध स्थल में जाकर उपवास पूर्वक वेद की संहिता को पारायण रूप से पढ़ता हुआ पवित्र होता है यह श्रुति से जाना जाता है ॥ ५० ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ५१ ॥ शरीर को