भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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९२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

अथ खल्वयं पुरुषो मिथ्या व्याकरोत्ययाज्यं वा याजयति,अप्रतिग्राह्यं वा प्रतिगृह्णाति, अनन्नं वाऽश्नाति, अनाचरणीयमेवाऽऽचरति,तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति मीमांसन्ते,न कुर्यादित्याहुर्नहि कर्म क्षीयतइति, कुर्यादित्येव तस्मात्-श्रुतिनिदर्शनात्तरति सर्वं पाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजतइति ॥ १ ॥ वाचाऽभिशस्तो गोसवेनाग्निष्टुता यजेत ॥२॥ तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानमुपनिषदो वेदादयो वेदान्ताः सर्वच्छन्दः संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजनिरौहिणे सा-मनो कूष्माण्डानि पावमान्यः सावित्री चेति पावनानि ॥ ३ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ४ ॥

वैश्वानरीव्रतपतीं पवित्रेष्टिंतथैवच ।
सकृदृतौप्रयुञ्जानः पुनातिदशपूरुषम्, इति ॥ ५ ॥


इसके बाद यह विचार करते हैं कि यह मनुष्य मिथ्या बोलता, अनधिकारी नीचों को यज्ञ कराता, अनुचित निषिद्ध दान को लेता,अभक्ष्य पदार्थों को खाता और प्रायः निन्दित शास्त्र विरुद्ध आचरण करता है । उन सब अंशों में प्रायश्चित्त करे ? वा न करे ऐसी मीमांसा करते हैं । पूर्वपक्षी कहते हैं कि प्रायश्चित्त न करे क्योंकि बिना भोगे किया कर्म क्षीण नहीं होता । उत्तर पक्षवाले कहते हैं कि प्रायश्चित्त अवश्य करे क्योंकि श्रुति में लिखा है कि "जो पुरुष अश्वमेध यज्ञ करता है उसके सब पाप छूट जाते हैं । और ब्रह्म हत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है,, ॥१॥ वाणी से निन्दित अर्थात् अति कठोर आदि आचरण करने से निन्दित पुरुष गोसव अग्निष्टुत् यज्ञ करे ॥२॥ उन यज्ञों के प्रत्याम्नाय वा प्रतिनिधि-जप, तप, होम , उपवास , दान, उपनिषद्-वेदादि-वेदान्त, सब छन्द, संहिता, मधुऋचा, अघमर्षण, अथर्वशिरः, रुद्राध्याय, वा रुद्रसूक्त, पुरुष सूक्त, राजन्-रौहिण दोनों साम, कूष्माण्ड सूक्त, पवमान सूक्त, और सावित्री मन्त्र ये सब पावन हैं । इन का जप पाठ शुद्ध होके एकान्त में श्रद्धा से करे ॥ ३ ॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ४ ॥ वैश्वानरी, व्रतपती, और पवित्रा इष्टि को प्रत्येक ऋतु में एक बार करे तो दश पीढ़ी को पवित्र करता है ॥ ५ ॥