अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ वसिष्ठस्मृतिः ॥
शङ्कास्थाने समुत्पन्ने भोज्याभोज्यान्नसंज्ञके ।
आहारशुद्धिं वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ १० ॥
अक्षारलवणां रूक्षां पिबेद्ब्राह्मीं सुवर्चलाम् ।
त्रिरात्रं शङ्खपुष्पीं च ब्राह्मणः पयसा सह ॥ ११ ॥
पालाशबिल्वपत्राणि कुशान्पद्मानुदुम्बरान् ।
क्वाथयित्वा पिबेदापस्त्रिरात्रेणैव शुध्यति ॥ १२ ॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च श्वपाकमपि शोधयेत् ॥ १३ ॥
गोमूत्रं गोमयं चैव क्षीरं दधि घृतं तथा ।
पञ्चरात्रं तदाहारः पञ्चगव्येन शुध्यति ॥ १४ ॥
यथान्विधिनोपयुञ्जानः प्रत्यक्षेणैव शुध्यति ।
विशुद्धभावे शुद्धाः स्युरशुद्धे तु सरागिणः ॥ १५ ॥
हविष्यान्प्रातराशांस्त्रीन्सायमाशांस्तथैव च ।
अयाचितं तथैव स्यादादुपवासत्रयं भवेत् ॥ १६ ॥
अथ चेच्चरते कर्तुं दिवसं मारुताशनः ।
अन्न के खा लेने की शंका उत्पन्न हो कर ग्लानि हो जाने पर आहार शुद्धि का विचार कहते हैं सो तुम सुनो ॥१०॥ खार तथा लवण को छोड़ कर रूखी ब्राह्मी सुवर्चला ओषधि को और शंखाहूजी ओषधि को दूध के साथ तीन दिन पीकर व्रत करे ॥११॥ अथवा ढांक, बिल्व (बेल) कमल और गूलरी के पत्तों का काढ़ा कर२ तीन दिन तक पीता हुआ व्रत करे तो शुद्ध हो जाता है ॥१२॥ गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत और कुशों का जल इन सबको एक दिन पीवे और एक दिन उपवास करे यह दो दिन का कृच्छ्र सान्तपन व्रत श्वपाक को भी शुद्ध कर सकता है। अर्थात् अत्यन्त शोधक है ॥ १३ ॥ और अभक्ष्य भक्षण की विशेष अपवित्रता की शंका हो तो गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गो दधि, गो घृत, इन पांच पदार्थों को पांच दिन एक२ को एक २ दिन खाके व्रत करे सो इस पञ्चगव्य से सम्यक् शुद्धि होती है ॥ १४ ॥ विधि के साथ केवल जो खाकर व्रत करे तो प्रत्यक्ष शुद्धि होती है। व्रत करनेवाले का मन शुद्ध हो मन में कुटिलता न हो तो शुद्धि होगी और अपवित्र भाव होगा तो राग सहित की शुद्धि न होगी ॥१५॥ तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल हविष्य अन्न, खार लवण रहित खावे, तीन दिन बिन मांगे जो मिले खावे और तीन दिन उपवास करे ॥ १६ ॥ अब यदि अति शीघ्र ही प्रायश्चित्त