भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषाधर्मसंहिता ॥ १०५

ऋग्वेदंधारयन्विप्रो नैनःप्राप्नोतिकिञ्चन ॥ ३ ॥
नवेदबलमाश्रित्य पापकर्मरतिर्भवेत् ।
अज्ञानाच्चप्रमादाच्च दह्यतेकर्मनेतरत् ॥ ४ ॥
तपस्तप्यतियोऽरण्ये मुनिर्मूलफलाशनः ।
ऋचमेकांचयोऽधीते तञ्चतानिचतत्समम् ॥ ५ ॥
इतिहासपुराणाभ्यां वेदंसमुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥ ६ ॥
वेदाभ्यासोऽन्वहंशक्त्या महायज्ञक्रियाक्रमः ।
नाशयन्त्याशुपापानि महापातकजान्यपि ॥ ७ ॥
वेदोदितंस्वकंकर्म नित्यंकुर्यादतन्द्रितः ।
तद्धिकुर्वन्यथाशक्त्या प्राप्नोतिपरमांगतिम् ॥ ८॥
याजनाध्यापनाद्यौनात्तथैवासत्प्रतिग्रहात् ।
विप्रेषुनभवेद्दोषो ज्वलनार्कसमोहिसः ॥ ९ ॥


कण्ठस्थ पाठ करता हुआ ब्राह्मण किञ्चित् भी पाप को प्राप्त नहीं होता ॥३॥ परन्तु ब्राह्मण वेदाध्ययन के बल का आश्रय लेकर समझ पूर्वक पाप कर्म कदापि न करे कि मेरे पाप वेदाध्ययन के बल से नष्टहो जांयगे । ऐसा भरोसा न रक्खे । क्योंकि अज्ञान वा भूल से किया अपराध वेदाध्ययन से नष्ट होता है अन्य नहीं ॥ ४ ॥ जो पुरुष मूल फल खाता हुआ मौन हो कर वन में तप करता है और जो गांव वा घर में रहता हुआ एक गायत्री मात्र का जप करता है वे दोनों बराबर हैं ॥ ५ ॥ इतिहास पुराणों को देखने द्वारा वेदार्थ ज्ञान को बढ़ावे । क्योंकि अल्पशास्त्रांश देखने जानने वाले से वेद डरता है कि मुझ पर यह मनुष्य प्रहार करेगा ॥ ६ ॥ प्रति दिन नियम से यथा शक्ति वेदाभ्यास करना और क्रम से पञ्चमहायज्ञ करना इतने ही कर्म महापातक सम्बन्धी पापों को भी शीघ्र नाश करते हैं ॥ ७ ॥

वेद में कहे अपने कर्म को ब्राह्मण आलस्य छोड़ के नित्यर करे यथाशक्ति केवल वेदोक्त कर्म को करता हुआ ही परमगति को अन्त में प्राप्त होजाता है ॥ ८ ॥ यज्ञ कराने, वेदादि पढ़ाने, क्षत्रियकन्यादि के साथ विवाह करने और अयोग्य का दान लेने से तपस्वी तेजस्वी विद्वान् ब्राह्मणों को दोष विशेष नहीं लगता क्योंकि ब्राह्मण अग्नि तथा सूर्य्य के समान है ॥ ९ ॥ भोज्य अभोज्य