भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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१०४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

यथाऽश्वारथहीनाःस्युरथोवाऽश्वैर्विनाथवा । एवंतपस्त्वविद्यस्य विद्यावाऽप्यतपस्विनः ॥ १८ ॥ यथाऽन्नंमधुसंयुक्तं मधुवाऽन्नेनसंस्युतम् । एवंतपश्चविद्याच संयुक्तंभेषजंमहत् ॥ १९ ॥ विद्यातपोभ्यांसंयुक्तं ब्राह्मणंजपनैत्यकम् । सदाऽपिपापकर्माणमेनोनप्रतियुज्यते,एनोनप्रतियुज्यते,इति २० इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षड्‌विंशोऽध्यायः ॥२६॥ यद्यकार्यशतंसाग्रं कृतंवेदञ्चधार्यते । सर्वंतत्तस्यवेदाग्निर्दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ १ ॥ यथावातबलोवन्हिर्दहत्यार्द्रानपिद्रुमान् । तथादहतिवेदाग्निः कर्मजंदोषमात्मनः ॥ २ ॥ हत्वाऽपिसइमांल्लोकान् भुञ्जानोऽपियतस्ततः ।


बिना घोड़े वा घोड़ों के बिना रथ व्यर्थ रहता है वैसे ही बिना विद्या के धर्मानुष्ठान वा बिना धर्मानुष्ठान रूप तप के विद्वान् होना मात्र निरर्थक है ॥ १८॥ जैसे मिष्ट मिला हुआ अन्न वा अन्न मिला हुआ शर्करादि मीठा स्वादिष्ट होता वैसे ही तप नाम धर्मानुष्ठान और विद्या दोनों हों तो सब पापों की परम औषध है ॥ १९॥ विद्या और धर्म कर्मानुष्ठान रूप तप से युक्त नित्य जप करने वाले, सदा पाप कर्म करते हुये भी ब्राह्मण को पाप दोष नहीं लगता है (चाहे यों कहलो कि पाप पुण्य दोनों बराबर हो जाने से वह पापी नहीं होता अर्थात संसार में रहते हुए मनुष्य से बहुत बचने पर भी कुछ अपराध अवश्य होते हैं इस से जप होमादि सब हालत में करना अच्छा है । परन्तु पापों से बचता हुआ धर्म करे तो सब से अच्छा है) ॥ २० ॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छब्बीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२६॥ यदि ब्राह्मणादि नये २ अकर्त्तव्य सैकड़ों अपराध भी करता हो पर वेद को नियम से पढ़ता पढ़ाता हो तो उसके उन सब पापों को वेद का ज्ञान रूप अग्नि ईंधन के तुल्य भस्म कर देता है ॥ १ ॥ जैसे वायु से प्रबल हुआ प्रज्वलित अग्नि वन के गीले वृक्षों को भी जला देता है । वैसे ही वेद रूप अग्नि भी कर्मों से हुए अन्तःकरण के दोषों को भस्म कर देता है ॥ २ ॥ इस मनुष्य आदि प्राणियों का हनन कर के भी तथा उचित अनुचित का अन्न खाता हुआ भी ऋग्वेद को