भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भावार्थसंहिता ॥ १०६

येपाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः । सर्वेतेजपयज्ञस्य कलांनाहन्तिषोडशीम् ॥ ११ ॥ जप्येनैवस्तुसंसिध्येद् ब्राह्मणोनात्रसंशयः । कुर्य्यादन्यन्नवाकुर्य्यान्मैत्रोब्राह्मणउच्यते ॥ १२ ॥ जापिनांहोमिनांचैव ध्यायिनांतीर्थवासिनाम् । नपरिवसन्तिपापानि येचस्नाताःशिरोव्रतैः ॥ १३ ॥ यथाऽग्निर्वायुनाधूतो हविषाचैवदीप्यते । एवंजप्यपरोनित्यं ब्राह्मणःसंग्रहीष्यते ॥ १४ ॥ स्वाध्यायाध्यायिनांनित्यं नित्यंचप्रयतात्मनाम् । जपतांजुह्वतांचैव विनिपातो्नविद्यते ॥ १५ ॥ सहस्रपरमांदेवीं शतमध्यांदशावराम् । शुद्धिकामःप्रयुञ्जीत सर्वपापेष्वपिस्थितः ॥ १६ ॥ क्षत्रियोबाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः । धनेनवैश्यशूद्रौतु जपैर्होमैर्द्विजोत्तमः ॥ १७ ॥


पकाये अन्न से होने वाले देवयज्ञ, भूत यज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ, येचार पाकयज्ञ और अग्निहोत्र दर्शपौर्णमासादि विधियज्ञ ये सब ठीक २ किये जप यज्ञ के षोडशांश के तुल्य भी नहीं हैं ॥ ११ ॥ ब्राह्मण केवल ठीक २ किये जप से ही सिद्ध हो जाता है । वह चाहे अन्य कुछ करे वा न करे वह सब का मित्र होता है ॥ १२ ॥ निरन्तर जप, होम, ध्यान करने वाले, तीर्थों में जाकर बस ने वाले और नित्य नियम से प्रातः स्नान सन्ध्या करने वालों के शरीरेन्द्रियों में पाप नहीं ठहरते ॥ १३ ॥ जैसे वायु और हविष्य घृतादि से प्रज्वलित अग्नि का तेज बढ़ता है वैसे जप के द्वारा ब्राह्मण का तेज नित्य २ बढ़ताजाता है ॥१४॥ जो नित्य जितेन्द्रिय रहते, जो नित्य नियम से विधि पूर्वक वेदाध्ययन करते तथा नित्य २ जप होम करते हैं उन के यहां अकालमृत्यु आदि विपत्ति नहीं आती हैं ॥ १५ ॥ सब पापों में स्थित रहता हुआ भी अधिक से अधिक १००० गायत्री का, मध्यकक्षा में १०० का, और निकृष्ट दशा में १० गायत्री का जप अवश्य ही नित्य २ करता रहे ॥ १६ ॥ क्षत्रिय पुरुष अपने बाहुबल से विपत्तियों से बचे, वैश्य तथा शूद्र धनादि के द्वारा दुःखों को हटावें और ब्राह्मण जप होमों के द्वारा सब दुःखों को हटाता रहे ॥ १७ ॥ जैसे रथ के

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