अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 792, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ | वसिष्ठस्मृतिः ॥
संदध्याच्चाधिकैर्वाऽपि द्विगुणैर्वापरंतुयः ॥ ४ ॥
सव्याहृतिकाःसप्रणवाः प्राणायामास्तुषोडश ।
अपिभ्रूणहनंमासात् पुनन्त्यहरहःकृताः ॥ ५ ॥
जप्त्वाकौत्समपेत्येदद्वासिष्ठंचप्रतीत्यृचम् ।
माहित्रंशुद्धवत्यश्च सुरापोऽपिविशुध्यति ॥ ६ ॥
सकृज्जप्त्वाऽस्यवामीयं शिवसंकल्पमेवच।
सुवर्णमपहृत्यापि क्षणाद्भवतिनिर्मलः ॥ ७ ॥
हविष्पान्तीयमभ्यस्य नतमंहद्वतीतिच ।
सूक्तंचपौरुषंजप्त्वा मुच्यतेगुरुतल्पगः ॥ ८ ॥
अपिवाप्सुनिमज्जांनस्त्रिर्जपेदघमर्षणम् ।
यथाऽश्वमेधावभृथस्तादृशंमनुरब्रवीत् ॥ ६ ॥
आरम्भयज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टादशभिर्गुणैः ।
उपांशुःस्याच्छतगुणः साहस्त्रोमानसःस्मृतः ॥ १० ॥
रस्सी से बांध कर वार २ बैठता है तथा जो अधिक द्विगुण वा और भी अधिक अभ्यास करता ॥४॥ अर्थात व्याहृति और प्रणव के सहित यदि सोलह प्राणायाम नियम से विधि पूर्वक नित्य करे तो एक मास में ब्रह्महत्या का महापातक भी छुटा कर शुद्ध निर्दोष कर देते हैं ॥ ५ ॥ ( अपनः शोशुचदघं० ऋ०मं० १ । सू० ९७ ) यह कौत्स सूक्त ( प्रतित्स्तोमेभिरुषसं० ऋ०५।५।२७) यह वासिष्ठ सूक्त (महित्रोणामवोऽस्तु०ऋ०८।८।४१) यह माहित्र सूक्त (एतोन्विन्द्रं०ऋ०६।६।३१) ये शुद्धवती तीन ऋचा इन का जप करने से मद्यपान के दोष से मुक्त हो जाता है॥६॥ ( अस्यवामस्य० ऋ० मं० १ । सू० १६४ ) सूक्त तथा ( यज्जाग्रतो दूर० यजु०अ०३५।१-६) छः मन्त्र शिवसंकल्प सूक्त के एक बार जप करने से सुवर्ण की चोरी के दोष से शीघ्र ही मुक्त होता है ॥७॥ ( हविष्पाम्त० ऋ० ८।४।१०) सूक्त (नतमंहोनदुरितं०ऋ०८।७।१३) सूक्त (इति वा०ऋ०८।६।२६) सूक्त और (सहस्त्रशीर्षा० ऋ० ८ । ४ । १९) पुरुष सूक्त इन सब का जप करने से गुरु पत्नी गमन के दोष से भी मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ अथवा जल में डुबकी लगा के तीन वार अघमर्षण सूक्त का जप करे । जैसे अश्वमेध यज्ञ का अवभृथ स्नान सर्व पाप नाशक है वैसा ही मनु जी ने अघमर्षण को कहा है ॥ ९ ॥ अग्नि में आरम्भ होने वाले यज्ञों से जप यज्ञ दश गुणा श्रेष्ठ है । धीरे २ उच्चारण किया उपांशु जप सौ गुणा और मानस जप सहस्त्र गुणा उत्तम है ॥१० ॥