अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ वसिष्ठस्मृतिः ॥
नस्कन्दतेनव्यथते नैनमध्यापतेञ्चयत् । वरिष्ठमग्निहोत्रात्तु ब्राह्मणस्यमुखेहुतम् ॥ ८ ॥ ध्यानाग्निः सत्योपचयनं क्षान्त्यापुष्टिग्न्रवं त्रिः पुरोडा- शमहिंसा च सन्तोषो यूपःकृच्छ्रं भूतेभ्योऽभयदाक्षिण्यं स्म- तिं कृत्वा क्रतुं मानसं याति क्षयं बुधः ॥६॥ जीर्यन्ति जीर्यतःकेशा दन्ताजीर्यन्तिजीर्यतः । जीवनाशाधनाशाच जोर्यतोऽपिनजीर्यति ॥१०॥ यादुस्त्यजादुर्मतिभिर्यान्नजोर्यतिजीर्यतः । योऽसौप्राणान्तिको व्याधिस्तांतृष्णांत्यजतः सुखमिति॥११॥ नमोस्तुमित्रावरुणयोरुर्वश्यात्मजाय शतयातवे वसिष्ठाय वसिष्ठायेति ॥१२॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ समाप्ताचेयं वसिष्ठस्मृतिः ॥
ता, और न किसी प्रकार के अनिष्ट का कारण होता है (अर्थात् अग्निहोत्र में ऐसी अनेक दिक्कतें होती हैं इस कारण) अग्नि होत्र से बहुत अच्छा यह है कि जो ब्राह्मण के मुख में होम किया गया है ॥ ८ ॥ ध्यान रूप अग्नि, सत्य का संचय, क्षमा से पुष्टि अन्न वा पुरोडाश, अहिंसा-दया, सन्तोष यूप-स्तम्भ, प्राणियों के लिये अभयदान रूप कृच्छ्रव्रत, ऐसा स्मरण करके विद्वान् पुरुष संसार के साथ संबन्ध का त्याग करता हुआ मानस यज्ञ को प्राप्त होता है ॥६॥ वृद्धावस्था में बालश्वेत हो जाते, दांत गिर जाते हैं, परन्तु जीवन की और धन की तृष्णा जीर्ण (बुड्डी) नहीं होती ॥१०॥ जो शरीर के जीर्ण होते हुए भी जीर्ण नहीं होती जो निकृष्ट बुद्धि वालों से कदापि त्यागी नहीं जा सकती तथा जो मरण पर्यन्त साथ में लगी पूरी व्याधि है उस तृष्णा को त्याग ने पर ही सुख हो सकता है ॥११॥ मित्रावरुण देवतों द्वारा उर्वशीदिव्याङ्गना से उत्पन्न हुए शतयातु नामक महर्षि वसिष्ठ को बारंबार नमस्कार प्राप्त हो ॥१२॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के ब्राह्मणसर्वस्व सम्पादक पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ और यह वसिष्ठस्मृति भी समाप्त हुई॥ ओम्-शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ॥