अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 803, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ११३
विहायसर्वपापानि नाकपृष्ठेमहीयत,इति ।
नाकपृष्ठेमहीयते । इति ॥ २२ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
धर्मंचरतमाऽधर्मं सत्यंवदतनानृतम् ।
दीर्घंपश्यतमाह्रस्वं परंपश्यतमाऽपरम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणोयज्ञो भवत्यग्निर्वै ब्राह्मणइति श्रुतेः ॥ २ ॥
तच्च कथम् ॥३॥ तत्र सतो ब्राह्मणस्य शरीरं वेदिः संक-
ल्पो यज्ञः पशुरात्मा मनो रशना बुद्धिः सदो मुखमाहवनीयं
नाभ्यामुदरोऽग्निर्गार्हपत्यः प्राणोऽध्वर्युर्पानो होता व्यानो
ब्रह्मा समान उद्गाताऽऽत्मेन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि यएवं
विद्वन्निन्द्रियैरिन्द्रियार्थं जुहोतीति ॥ ४ ॥ अपि च काठके
विज्ञायते ॥ ५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६ ॥
पानित्रातिचदातार-मात्मानंचैवकिल्विषात् ।
वेदेन्धनसमृद्धेषु हुतंविप्रमुखाग्निषु ॥ ७ ॥
वश में रक्खें, पवित्रता से रहे, तथा श्रद्धालु हो वह सब पापों को त्याग के स्वर्ग के सिंहासन पर पूजा जाता है ॥ २२ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उनतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२९॥
धर्म करो अधर्म नहीं, सत्य बोलो मिथ्या नहीं, दीर्घ दर्शी बनो संकुचित विचार वाले नहीं, परम अविनाशी सब अनित्य पदार्थों में नित्य परम तत्त्व रूप ईश्वर को देखो संसार को नहीं ॥ १ ॥ ब्राह्मण यज्ञ का ही रूप है । “अग्नि ही ब्राह्मण है” ऐसा श्रुति में लिखा है ॥ २ ॥ सो कैसे ? ॥ ३ ॥ उस में सत्पात्र ब्राह्मण का शरीर-वेदि, संकल्प-यज्ञ, पशु-आत्मा, मन-रस्सी, बुद्धि-सदःशाला, मुख-आहवनीय, नाभिस्थल में उदर का जाठराग्नि-गार्हपत्य, प्राण-अध्वर्यु, अपान-होता, व्यान-ब्रह्मा, समान-उद्गाता, इन्द्रियां यज्ञपात्र, जो ऐसा जानता है वह इन्द्रियों के साथ शब्द स्पर्शादि विषयों का होमकर देता है ॥ ४ ॥ और भी कठशाख्य श्रुति से जाना जाता है ॥ ५ ॥ और भी श्लोकों का प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६ ॥ दान लेने वाले और दाता पुरुष को वह दान पाप से रक्षा करता है कि जो वेदरूप ईंधन से प्रज्वलित ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में होम किया जाता है ॥ ७ ॥ न फैजता, न व्यर्थ हो-