अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)
Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini
महर्षि पाणिनि द्वारा
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से निस्सन्देह रूप से यह कहा जा सकता है कि संस्कृत जगत् के पाणिनीय पद्धति से पढ़नेवाले छात्रों तथा विद्वानों में से ९० प्रतिशत से अधिक के पास यही संस्करण उपलब्ध होता है। चूँकि अधिकांश व्यक्तियों को इसी संस्करण से सूत्रपाठ कण्ठस्थ है, इसीलिये उनके मस्तिष्कों में इसी संस्करण का क्रम तथा पङ्क्तियों आदि का रेखाचित्र स्थिर हो चुका है, अतः हमने भी अपने इस अतिविशिष्ट सुविधा से युक्त संस्करण को पूर्णतया उसी संस्करण के रेखाचित्र के अनुसार प्रकाशित किया है जिससे उपर्युक्त संस्करण के किसी भी अभ्यस्त व्यक्ति को लेशमात्र भी असहजता तथा कठिनाई का अनुभव न हो। अतः हम उस संस्करण के प्रकाशकों तथा सम्पादक महोदय के अत्यन्त ऋणी तथा आभारी हैं जिसके आधार पर हमने यह सर्वथा नवीन कार्य करने का प्रयास किया है। इस संस्करण का उद्देश्य मात्र सूत्रों को शुद्धतम रूप में कण्ठस्थ करने के सौविध्य से है न कि उपर्युक्त संस्करण से किसी भी प्रकार की प्रतिद्वन्द्विता की भावना लेकर श्रेष्ठता प्रदर्शित करने से। वैसे भी गुरुजनों द्वारा निर्मित धरातल से उनके शिष्यों द्वारा उसी धरातल पर निर्मित भवन की क्या कदाचित् प्रतिद्वन्द्विता की सम्भावना भी की जा सकती है? कदापि नहीं। यद्यपि ‘पाणिनि महाविद्यालय, रामलाल कपूर ट्रस्ट, रेवली (भूतपूर्व-बहालगढ़), जिला-सोनीपत (हरियाणा)’ से प्रकाशित संस्करण की अनेकों आवृत्तियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं तथापि १५वें संस्करण (प्रथम कम्प्यूटरीकृत संस्करण) में पूज्य गुरुवर्य ‘आचार्य विजयपाल विद्यावारिधि जी’ ने पिछले संस्करणों से चली आ रही अनेकों मुद्रित अशुद्धियों का वास्तविक संशोधन किया था। उस संशोधन में हमारे सहित हमारे अनेक सहपाठी मित्रों का भी सहयोग पूज्य आचार्य जी को प्राप्त हुआ था, उस समय भी हृदय में उस संशोधित संस्करण में कुछ अन्य नवीन, वर्तमान युग में प्रासङ्गिक संशोधन (नवीनीकरण) करने की अभिलाषा जागृत