अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)
Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini
महर्षि पाणिनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(ग) हमारे परममित्र, परमसयोगी, संस्कृत तथा संस्कृति के प्रति अगाधनिष्ठ, दुर्लभ, जन-जनोपयोगी तथा रचनात्मक संस्कृतसाहित्य के प्रकाशन में अतिशयरुचिधारी, प्रभुकृपा तथा अपने सुकर्मों के सुफल-स्वरूप अकूत धन-सम्पदा के स्वामी, परमोदारहृदय, परमदानी 'श्री जयसेठ हीरालाल चम्पालाल खिवंसरा जी (नासिक-महाराष्ट्र)' तथा 'श्री परमहंस स्वामी शिवानन्द सरस्वती संस्कृत एवं संस्कृति शोध, शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थान, तहसील-सिन्नर, जिला-नासिक (महाराष्ट्र), पिन कोड-४२२१०३.' के सर्वविध परमपावन सहयोग से बाल्यकाल से हृदय में स्थित तथा जाज्वल्यमान उस अभिलाषा की पूर्ति को मूर्त रूप प्रदान करते हुये, अनेक संस्कृतप्रेमी छात्रों तथा विद्वज्जगत् के समक्ष यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा दो रंगों में सूत्रों के प्रकाशन द्वारा अतिविशिष्ट सुविधा 'यतिबोध' से युक्त 'अष्टाध्यायीसूत्रपाठः (यतिबोधसहितः)' ग्रन्थ सुन्दरतम, शुद्धतम, सुपाठ्यतम रूप में प्रकाशित करके, प्रस्तुत करते हुये आज हमें जिस अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है, निश्चय ही वैसी ही अनुभूति आप सब को भी हो रही होगी। वर्तमान समय में 'अष्टाध्यायीसूत्रपाठः' के प्रमुख रूप से दो प्रकार के संस्करण उपलब्ध होते हैं। प्रथम हमारे तीर्थस्थान 'पाणिनि महाविद्यालय, रामलाल कपूर ट्रस्ट, रेवली (भूतपूर्व- बहालगढ़), जिला-सोनीपत (हरियाणा)' से प्रकाशित है एवं हमारे परमपूज्य, प्रातःस्मरणीय गुरुवर्य 'आचार्य विजयपाल विद्यावारिधि जी' के गुरुजी 'स्व. श्री पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी' द्वारा सम्पादित है तथा द्वितीय 'गुरुकुल झज्जर' से प्रकाशित तथा सम्पादित है। इन दोनों ही संस्करणों में निस्सन्देह शुद्धतम संस्करण प्रथमवाला ही है। इस संस्करण में प्रत्येक सूत्र को उसकी सर्वविध समीक्षा करके प्रकाशित किया गया है तथा उसकी क्रम, पङ्क्तियों आदि की व्यवस्था अत्यन्त आकर्षक तथा वैज्ञानिक है। इसी कारण