भारतकोश
अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)

अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)

Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini

महर्षि पाणिनि द्वारा

DevanagariSanskritpublished102 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 102 में से

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पृष्ठ 90

( ख ) व्यावहारिक रूप से सन्तुष्ट नहीं होते हैं तथा समस्या यथावत् बनी रहती है। साथ ही प्रकृत समस्या का समाधान उन छात्रों को, जिनकी संख्या अत्यल्प है, प्राप्त हो भी जाये जिनके पास योग्य अध्यापक तथा विद्यालय समुपलब्ध हों परन्तु जिन छात्रों के पास, जिनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक है, योग्य अध्यापक तथा विद्यालय समुपलब्ध नहीं हैं तथा जिनके अभिभावकगण अथवा वे स्वयं स्वतन्त्र रूप से ही ग्रन्थ को कण्ठस्थ करने का सत्साहस करते हैं, उनको प्रकृत समस्या का समाधान अप्राप्त ही रहता है तथा वे अत्युत्साह में अशुद्ध उच्चारण करके अशुद्ध रूप में ही सूत्र को कण्ठस्थ कर लेते हैं जिसका दुष्परिणाम उन्हें बाद में प्रथमावृत्ति, काशिका, महाभाष्य आदि ग्रन्थों का अध्ययन करते समय भोगना पड़ता है जब सूत्र का वास्तविक उच्चारण क्या होता है, यह बोध उन्हें होता है परन्तु तब सूत्र किसी भिन्न अशुद्ध रूप में ही उन्हें कण्ठस्थ होता है जिसे भूलकर शुद्ध रूप कण्ठस्थ करना तब अतिशय कठिन अथवा प्रायः असम्भव ही प्रतीत होता है जबकि व्याकरण के छात्रों अथवा अध्यापकों का सर्वोत्कृष्ट अलङ्कार हमारी दृष्टि में सूत्र का शुद्धतम रूप में उच्चारण करना ही है, बाद में सूत्रार्थादि का बोध आदि। अतः उपर्युक्त अभिलाषा की पूर्ति तभी सम्भव हो सकती थी जब सूत्रों के अक्षरों में जितने-२ अक्षरों का एकसाथ उच्चारण करना अर्थात् जिस-२ अक्षर पर यति करना साधु तथा अभीष्ट हो उतने-२ अक्षरों को समूहरूप में क्रमशः पृथक्-२ दो रंगों में प्रकाशित किया जाये जिससे छात्रों को सूत्रों को देखते ही तत्काल यह बोध हो सके कि उन्हें किस अक्षर पर शब्द को तोड़कर अर्थात् यति करके, उनका शुद्धतम उच्चारण करके, उन्हें शुद्धतम रूप में कण्ठस्थ करना है। इस प्रकार उन्हें अध्यापकविशेष की आवश्यकता के बिना ही, मात्र ग्रन्थ की सहायता से ही सूत्रों को शुद्धतम रूप में कण्ठस्थ करने की एक अतिविशिष्ट सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।

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