अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)
Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini
महर्षि पाणिनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( क ) प्राक्कथन वर्तमान युग में ‘व्याकरण’ नामक वेदाङ्ग के अन्तर्गत पाणिनीय व्याकरण की ही सर्वोत्कृष्टता, सर्वसुगमता, सर्वसुलभता तथा यथोचित लघुता सर्वसाधारण में मान्य तथा प्रचलित है। ‘अष्टाध्यायीसूत्रपाठः’ पाणिनीय व्याकरण का ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा आदिमूल ग्रन्थ है। छात्र-जीवन के काल से ही हमारे हृदय में सदैव यह अभिलाषा उठती रही है कि सूत्रों में किस अक्षर पर शब्द को तोड़कर अर्थात् किस अक्षर पर यति ( अल्पविराम अथवा हल्की सी श्वाँस ) करके, उनका शुद्धतम उच्चारण करके, उन्हें शुद्धतम रूप में कण्ठस्थ किया जाये, इसका बोध कराने के लिये ग्रन्थ में ही कुछ अतिविशिष्ट प्रकार की सुविधा उपलब्ध हो। वर्तमान समय में इस समस्या का समाधान अध्यापक छात्रों की पुस्तकों में प्रायः पैन्सिल आदि से खड़ी रेखा ‘-।’ आदि सदृश चिह्न लगाकर करते हैं परन्तु पूर्णतया वे स्वयं भी इस प्रकार के समाधान से सन्तुष्ट नहीं होते हैं क्योंकि कभी-कभी संयुक्त अक्षरों में वे खड़ी रेखा आदि चिह्न यति को पूर्णतया स्पष्ट करने में सहायक नहीं हो पाते हैं, तब मौखिक रूप से ही छात्रों को वहाँ उपदेश कर दिया जाता है कि अमुक संयुक्त अक्षर में इसके अमुक हिस्से को इधर जोड़कर उच्चारण करना है तथा इसके अमुक हिस्से को उधर जोड़कर उच्चारण करना है, साथ ही पैन्सिल के काले-काले निशानों से पुस्तक का गन्दा हो जाना, फट जाना आदि अन्य अनेक व्यावहारिक समस्यायें भी छात्रों तथा अध्यापकों को अनुभूत होती हैं। इसके अतिरिक्त अधिकतर छात्र एवम् अध्यापक अपने मन से ही कुछ भी नियम निर्धारित करके सूत्रों का अशुद्ध उच्चारण करके कण्ठस्थ करते तथा करवाते हैं। कुल मिलाकर अन्दर ही अन्दर अव्यक्त रूप में अध्यापक तथा छात्र दोनों ही इस प्रकार के समाधानों से