भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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सुश्रुतादि के अनुसार आगे और कुछ जोड़ा है जो कि संग्रह के रचनाकाल में छूट गया था। केवल इसी कारण को लेकर अष्टाङ्गसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय के कर्ता भिन्न नहीं हो सकते। अष्टाङ्गसंग्रह की रचना पहले की है। उसके अनन्तर लिखे गये अष्टाङ्गहृदय में वही ग्रन्थकार छूटे हुए विषय को ले सकता है।

महामहोपाध्याय स्वर्गीय गणनाथसेन सरस्वती एवं श्रद्धेय यादवजी आचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तुत ग्रन्थ-द्वय के सर्वत्र भाषा-सादृश्य तथा पिता-पितामह का एक नाम आदि होने से संग्रह एवं हृदय के भिन्न-भिन्न कर्ता मानना यह बड़ी भूल की बात है। सारांश यह है कि अष्टाङ्गसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय का कर्ता वास्तव में एक ही वाग्भट है।

इन्हीं तथ्यों से आश्चर्य अष्टांगसंग्रह के व्याख्याकार तथा वाग्भट के शिष्य श्री इन्दु ने अपने द्वारा किये गये मङ्गलाचरण 'वृत्त्यारव्याविषयसुतस्य वाग्भटस्यास्मदुक्तयः' में तथा व्याख्या 'सोऽयं वाग्भटनामा शास्त्रकारः' में कहीं भी वृद्ध, प्रथम, मध्य अथवा लघु विशेषणों का प्रयोग इनके नाम के पूर्व नहीं किया है। इन्होंने केवल सिंहगुप्तसुतु वाग्भट कहा है। इनकी दृष्टि से भी दोनों (संग्रह तथा हृदय) के कर्ता वाग्भट एक ही थे। उक्त मत के समर्थन में अष्टांगहृदय के रचयिता की निम्न सूक्तियों का अवलोकन तथा मनन करें और इनकी व्याख्या यथास्थान देखें—

तेभ्योऽति विप्रकीर्णभ्यः प्रायः सारतरोच्यवः। क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्क्षेपवित्तरम्॥ (अ.हृ.सू. १।४) अष्टाङ्गवैद्यकमहोदधिमन्यनेन योऽष्टाङ्गसङ्ग्रहमहामुत्तराशिराप्तः। तस्मान्दण्पफलमल्पसमुद्यमानां प्रीत्यर्थमेतदुदितं पृथगेव तन्त्रम्॥ (अ.हृ.उ. ४०।८०)

ग्रन्थकारों की व्यास एवं समास पद्धति—प्राचीनकाल में ऐसे अनेक उदाहरण पाये जाते हैं, जहाँ एक ही ग्रन्थकार ने एक ही विषय की व्यास एवं समास पद्धति से रचनाएँ की हैं; यथा—भट्टोजिदीक्षित के पौत्र तथा नागेशभट्ट के विद्यागुरु श्री हरिदीक्षित ने बृहच्छब्दरत्न तथा लघुशब्दरत्न की रचना की थी। इसी का प्रभाव था कि उनके शिष्य आचार्य नागेशभट्ट ने व्याकरण विषय के अनेक ग्रन्थ लिखे; यथा—बृहच्छब्देन्दुशेखर तथा लघुशब्देन्दुशेखर, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा। जयपुर के राजा सवाई जयसिंह (१६८८-१७२८ ई०) का काल तथा श्रीनागेशभट्ट का काल समान ही था।

नामनिर्धारण परम्परा—प्रायः प्राचीनकाल में पितामह का ही नाम पौत्र का भी रखा जाता था। देखें—नीलकण्ठ दीक्षित विरचित 'गंगावतरणम्' की भूमिका, काव्यमाला गुच्छक ७६ पृष्ठ १२, निर्णय-सागर प्रेस से १९१६ में प्रकाशित—'विदितमेव है सर्वेषामस्माकमस्मद्देशीयाः प्रायशो विभ्रति पितामहानां नाम; यथा—आचार्य दीक्षितः,—आचार्य दीक्षित पौत्रः'। इस प्रकार की यह नाम निर्धारण परम्परा कहीं-कहीं थी और कब से चली आयी है, यह भी एक गवेषणीय विषय है, जिसका प्रभाव 'वाग्भट' नाम पर भी परिलक्षित होता है। देखें—'भिषग्वरो वाग्भट इत्यभून्मे पितामहः'। (अ.सं.उ. ५०।२०३)

अष्टाङ्गहृदय का कलेवर—'कायबालग्रहोर्ध्वज्ज्ञशत्यवैष्ण्वजरावृषान्। अष्टावङ्गानि'। (अ.हृ.सू. १।५) के अनुसार आयुर्वेद के आठ अंग ये हैं—१. कायचिकित्सातन्त्र, २. बाल (कौमारभृत्य) तन्त्र, ३. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या) तन्त्र, ४. ऊर्ध्वगचिकित्सा (शालाक्य) तन्त्र, ५. शत्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), ६. वैष्ण्व विषचिकित्सा (अगदतन्त्र), ७. जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र) तथा ८. वृषचिकित्सा (वाजीकरणतन्त्र)। यद्यपि उक्त सभी अंगों में कायचिकित्सा एक ऐसा अंग है, जो सम्पूर्ण काय से सम्बन्ध रखता है, अतएव इससे सभी अंग प्रभावित हो जाते हैं, फिर भी अन्य अंगों की सत्ता अपने-अपने स्थान पर विशेष महत्त्व रखती ही है, तथापि कायचिकित्सा अंग को सबमें प्रधान माना जाता है। इन्होंने भी सुश्रुत की भांति अपने ग्रन्थ (अष्टाङ्गहृदय) को ६ स्थानों में विभाजित किया है।