भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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वाग्भट की प्रतिज्ञा—वैयाकरण सम्प्रदाय में यह प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है कि ‘एकमात्रात्माद्यवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैय्यकरणः।’ ऐसा लगता है कि अपने ग्रन्थ रचनाकाल में वाग्भट उक्त सूक्ति से प्रभावित थे। अतएव उन्होंने भी ‘न मात्रात्रामत्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्’ (अ.सं.सू. ११२०) एक ऐसी प्रतिज्ञा की, जिससे ग्रन्थ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। उक्त सूक्ति का आशय इस प्रकार है—इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में शब्द अथवा वाक्य की बात तो कौन कहे, एक मात्रा भी शास्त्रों के विपरीत नहीं है। इसके अतिरिक्त भी इन्होंने अपने ग्रन्थ की प्रामाणिकता को सिद्ध करने के उद्देश्य से प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में लिखा है—‘इति ह स्मार्हुरात्रेयादयो महर्षयः।’

आयुर्वेद के प्रति दृढ़ निष्ठा—वाग्भट कुलक्रमगत अधीतविद्य वैद्य एवं अनेक विषयों के उद्भट विद्वान् थे, अतएव वे आयुर्वेद के प्रति स्वयं भी अत्यन्त निष्ठावान् थे। यही कारण था कि उन्होंने सम्पूर्ण समाज को यह सन्देश दिया है—‘आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः’ (अ.सं.सू. ११३ तथा अ.हृ.सू. ११२) अर्थात् धर्म, अर्थ, सुख (काम) नामक तीन पुरुषार्थों की प्राप्ति सुखायु से होती है। अतः इनकी इच्छा रखने वाले पुरुषों को आयुर्वेद के विश्वजननी उपदेशों का पालन अत्यन्त आदर के साथ सदैव करते रहना चाहिए।

धन्वन्तरि अवतार की कल्पना—‘सरलसमुच्चय’ ग्रन्थ की भूमिका में श्रीकृष्णराव शर्मा लिखते हैं—शल्यचिकित्सा के आदिदेव भगवान् धन्वन्तरि का ‘वाग्भट’ नाम से पुनः कलियुग में अवतार हुआ, इस बात को सिद्ध करने के लिए और उनकी पीयूषपाणित्व शक्ति को दिखाने के लिए ही अष्टाङ्गसंग्रहकर्ता वृद्धवाग्भट ने अपने प्राणहरण के बिना हृदय (अष्टांगहृदय) को सजीव अलग कर दिया, अर्थात् उन्होंने अपने इस उत्तिक्रैच्यय से ‘वाग्भट’ शल्यचिकित्सा विशेषज्ञ थे, यह विद्वानों को दिखाया। उक्त विषय को इस प्रकार समर्थ—‘अष्टांगसंग्रह’ सर्वावयव पूर्ण आयुर्वेद का शरीरस्वरूप है और ‘अष्टांगहृदय’ उसके महत्त्वपूर्ण विषयों का सारभूत ‘हृदय’ है। शल्यकर्म विशेषज्ञ वाग्भट ने ‘शरीर’ तथा ‘हृदय’ दोनों को अलग करके भी दोनों को जीवित रखा है, यह इनका वैशिष्ट्य है। वास्तव में यह वाग्भट का आलंकारिक परिचय है।

ग्रन्थरचना-कौशल—सरस्वती के वरदपुत्र वाग्भट द्वारा विरचित ‘अष्टांगहृदय’ की समृद्ध काव्य-सम्पदा से यह सुविदित है कि ये आयुर्वेदीय समस्त अंगों के ज्ञाता होने के साथ-ही-साथ सुकवि भी थे तथा साहित्यशास्त्र पारावारपारीण भी थे। जो इनके छन्द, रस, गुण, अलंकार आदि से परिपूर्ण प्रस्तुत काव्य-सम्पत्ति से प्रमाणित होता है। एतदर्थ आचार्य दण्डी कृत महाकाव्य-लक्षण का अवलोकन करें—

‘सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तेरपेतं लोकरञ्जकम्।

काव्यं कल्पान्तरस्यापि जायते सदलङ्कृतिं ॥ (काव्यादर्श ११९)

छन्दःसन्दोह प्रयोग कौशल—आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ‘मुनुवृत्तिलक’ में उन कवियों को दरिद्र कहा है, जिन्होंने अपने काव्य की रचना एक ही छन्द द्वारा पूर्ण की है, क्योंकि छन्दःप्रयोग में स्वच्छन्द कवि समवृत्त, अर्धसमवृत्त तथा मात्रावृत्त के प्रयोगों में पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। इसी प्रकार के कवियों में वाग्भट भी अन्यतम हैं। इन्होंने पाठकों के मनोविनोद के लिए वृत्तिमधुर विभिन्न छन्दों का स्थान-स्थान में प्रयोग किया है। कहीं-कहीं तो श्लेष अलंकार का सहारा लेकर स्वागता, पुष्पिताग्रा, पृथ्वी, शार्दूलविक्रीडित, द्रुतविलम्बित आदि छन्दों को मुद्रालंकार से अलंकृत किया है। यह कवि एवं कविराज वाग्भट का शास्त्र एवं काव्य-कौशल है।

मुद्रालंकार परिचय—‘सूक्ष्मार्थसूचनं मुद्रा प्रकृतार्थपरैः पदैः।

नितम्बगुर्वी तरणी द्रुममुमविपुला च सा’ ॥ (कुवल्लयानन्द)

अर्थात् जिस छन्द में उस छन्द का नाम सार्थक रूप से श्लेषप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त किया गया हो, उसे ‘मुद्रा’ अलंकार कहते हैं। यहाँ अनुष्टुप् छन्द के भेदों में परिगणित ‘युम्मविपुला’ छन्द का द्वयर्थक