अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
अथ तोयवर्गः
जीवनं तर्पणं हृद्यं द्वादि बुद्धिप्रबोधनम्। तत्त्वव्यक्तृरसं मुष्टं शीतं लघ्वमृतोपसमम् ॥ १ ॥ गङ्गास्नू नभसो भ्रष्टं स्पृष्टं त्वर्कन्दुमारुतैः। हिताहितत्वे तदभूयो देशकालापेक्षते ॥ २ ॥
गंगा का जल—आकाश से गिरा हुआ गंगा का जल जीवन (जीवित रखने वाला), तर्पण (तुष्टिकारक), हृदय के लिए हितकर, आनन्ददायक, बुद्धि को बढ़ाने वाला, तनु (पतला-गन्दगी रहित), अव्यक्त रस (मधुर आदि किसी रस-विशेष की जिसमें अभिव्यक्ति न हो), मुष्ट, शीतल, हलका और अमृत के समान हितकर होता है। यह जल आकाश से गिरने के बाद सूर्य, चन्द्र तथा वायु के स्पर्श से देश एवं काल के प्रभाव से हितकर भी हो सकता है और अहितकर भी हो सकता है। अर्थात् जैसे देश-काल का उसमें प्रभाव पड़ेगा तदनुरूप भला या बुरा हो जाता है ॥ १-२ ॥
बक्तव्य—चरक में इसी के अनुरूप एक पद्य इस प्रकार है—‘शीतं शुचिं शिवं मुष्टं विमलं लघु षड्गुणम्। प्रकृत्या दिव्यमुदकम्’। (च.सू. २७।१९८) यहाँ ‘मुष्टं’ तथा ‘विमलं’ ये दो विशेषण समानार्थक आये थे, अतः ‘मुष्टं’ का अर्थ स्वादु किया गया था, किन्तु यहाँ ऐसी स्थिति नहीं है। ‘मुष्ट’ शब्द ‘मृजु शुद्धो’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय के योग से निष्पन्न हुआ है। अतः यहाँ इसका अर्थ ‘शुद्ध’ या ‘स्वच्छ’ होगा।
येनाभिवृष्टममलं शाल्यत्रं राजते स्थितम्। अक्लिन्नमविवर्णं च तत्पेयं गाङ्गम्—
गंगाजल का परिचय—जिस जल के बरसते समय घर के भीतर चाँदी के पात्र में परोसा हुआ शालिचाबलों का भात निर्मल बना रहे, वह क्लेदयुक्त न हो अर्थात् पसीजने न लगे और उसका वर्ण विकारयुक्त न हो जाय, वह गंगा का जल होता है, इसे पीना चाहिए।
—अन्यथा ॥ ३ ॥
सामुद्रं, तन्न पातव्यं मासादाश्वयुजाहिना।
सामुद्र जल—उक्त गंगाजल के विपरीत जो जल होता है, उसे समुद्र का जल कहते हैं। वह पीने के योग्य नहीं होता है। यह जल आश्विन मास में पीने योग्य हो जाता है ॥ ३ ॥
बक्तव्य—चरक के अनुसार आकाश से मेघ की सहायता से बरसने वाले सभी जल एक समान होते हैं। परन्तु जब वे गिरते हैं और गिरकर जिस प्रकार के देश में तथा जिस काल में गिरकर स्थित होते हैं, तदनुसार उन जलों के गुण हो जाते हैं। (च.सू. २७।१९६) प्रधान जल—जो जल इन्द्र (मेघ) द्वारा उत्पन्न हुआ आकाश से गिरता है और स्वच्छ पात्रों में संग्रह कर लिया जाता है, उसे ही विवेकशील विद्वान् ‘ऐन्द्र’ जल कहते हैं। वहाँ जल राजाओं अथवा श्रीमानों के पीने योग्य होता है। यह जल प्रायः आश्विन मास में ग्रहण किया जाता है। (च.सू. २७।२०२)
धन्वन्तरि के अनुसार—जल दो प्रकार का होता है—१. गंगा का जल और २. समुद्र का जल। इनमें गंगा का जल प्रायः आश्विन मास में बरसता है। अतः उक्त दोनों प्रकार के जलों की परीक्षा करनी चाहिए। जिस समय पानी बरस रहा हो, उस समय पकाये हुए चाबलों के न गले हुए अविवर्ण (जिसका स्वाभाविक वर्ण विकृत न हुआ हो) एक पिण्ड को चाँदी की थाली में रख दें। यदि ४-५ घण्टे में भी वह पिण्ड उसी प्रकार अ विकृत रहता है, तो समझे इस समय गंगा का जल बरस रहा है। यदि उस भात के पिण्ड का रंग बदल जाय, उसमें कुछ सड़न के लक्षण दिखायी दें, कुछ गदलापन दिखायी दे तो समझना चाहिए कि इस समय सामुद्र जल बरस रहा है। सामुद्र जल को आश्विन मास में ग्रहण किया जा सकता है। देखें—सु.सू. ४।७।७।
स्पृष्टीकरण—समुद्री जल को ही सामुद्र जल कहते हैं। ‘मानसून’ द्वारा उठे हुए बादलों से जो जल बरसता है, उसे समुद्र का जल कहा जाता है। गंगाजल—जितनी भी तेज बहने वाली नदियाँ हैं, उन सबका नाम गंगा है। क्योंकि गंगा उसे कहते हैं जिसमें निरन्तर प्रवाह (बहाव) हो। देखें—‘गच्छतीति