भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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ब्रह्मवैज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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नङ्गा'। अतएव वेगवती नदियों का जल शुद्ध होता है। देखें—'नदी वेगेन शुध्यति'। (चा.नी. ६।३) अतः जल की परीक्षा करके उसका संग्रह तथा प्रयोग करें। कभी आश्विन में भी सामुद्र जल बरस सकता है। यदि शरद् ऋतु का जल वर्षा ऋतु के जल से अवश्य स्वच्छ होता है, तथापि परीक्षा कर लेनी चाहिए।

निष्कर्ष— गंगा का जल पीने योग्य (हितकर) होता है और समुद्र का जल पीने योग्य नहीं होता, बने ही वह नमकीन न हो। अतः आश्विन मास से ज्येष्ठ मास तक जो वर्षा का जल होता है, वह पानीय (पीने योग्य) होता है, शेष महिनों में बरसने वाला जल सामान्यतः अपेय होता है।

ऐन्द्रमन्वु सुपात्रस्थमविपन्नं सदा पिबेत्॥४॥

तदभावे च भूमिष्ठाल्तरिक्षानुकारि यत्। शुचिपृथ्वस्तित्त्वे देशेऽर्कपवनाहतम्॥५॥

पानीय जल— ऐन्द्रम् अम्बु (बादलों से बरसा हुआ जल) जो साफ-सुथरे पात्र में रखा हो और जो किसी प्रकार से विकार युक्त न हुआ हो, उसे सदा पीना चाहिए। इसके अभाव में उस प्रकार के जल को पीना चाहिए, जो आकाश से बरसे हुए जल की भाँति स्वच्छ हो तथा पृथिवी के स्वच्छ, पवित्र तथा काने अथवा सफेद स्थान (पात्र) में रखा गया हो, जिसमें सूर्य की किरणों एवं शुद्ध हवा का स्पर्श होता हो; इस दृष्टि से तालाब तथा झील के जल पीने के योग्य होते हैं॥४-५॥

न पिबेत्सङ्गृहीतवृषाणैर्विलाल्स्तुतम्। सूर्यन्तुपवनावृष्टमभिबृष्टं घनं गुरुं॥६॥

फेनिलं जन्तुमस्तप्तं दन्तग्राह्यतिशैत्यतः। अनार्तव च यद्विषमार्तप्तं प्रथमं च यत्॥७॥

लूतादितन्तुविषमूत्रविषसंश्लेषदूषितम् ।

न पीने योग्य जल— कीचड़, सिवार, तिनके तथा पत्तों के फेल जाने के कारण जो जल मलिन हो गया हो, उसे नहीं पीना चाहिए। जिस जल पर सूर्य-चन्द्रमा की किरणों का तथा शुद्ध वायु का स्पर्श न होता हो, जो अभी-अभी बरसा हो अर्थात् जो पहली वर्षा का जल हो, जो जल घन (गदला) होने के कारण गुरु (पचने में भारी) हो, जिसके ऊपर झाग उठी हो, जो क्रिययुक्त हो, स्पर्श में उष्ण हो तथा जो अत्यन्त शीतल होने के कारण दौर्तों में लगकर पीड़ा उत्पन्न करता हो, उस जल को नहीं पीना चाहिए।

वर्षाऋतु के जल को आर्तवजल कहते हैं। इस काल के अतिरिक्त जब भी तत्काल जल बरसे, उसे 'अनार्तव' जल कहते हैं और जो वर्षाकाल में भी आकाश से पहली बार बरसा हुआ जल है, उसे भी न पीयें। लूता आदि प्राणियों की जो लार से, मल-मूत्र तथा विष के सम्पर्क से दूषित जल हो, उसे भी नहीं पीना चाहिए॥६-७॥

वक्तव्य— इस सम्बन्ध में सुश्रुत के विचार द्रष्टव्य हैं—'तत्र...सर्वं चेति'। (सु.सू. ४।१८) इसका भाष्य है—वर्षा ऋतु में आन्तरिक्ष (आकाश से प्राप्त), औदुभिद (घ्रोत से निकलने वाले) जल को पीना चाहिए। भ्राद्रपद में जल को गरम करके ठण्डा कर लें, तब पीयें। क्योंकि ये दोनों प्रकार के जल महागुण वाले होते हैं। शरद् ऋतु में सभी प्रकार के जलों का सेवन किया जा सकता है, क्योंकि इन दिनों अगस्त्य का उदय हो जाता है। (ज्ञानमण्डल से प्रकाशित 'बृहत् हिन्दी कोश' में लिखा है—अगस्त्योदय ऋद्र-शुक्लपक्ष में होता है। इसे एक नक्षत्र कहते हैं, किन्तु इसकी गणना २७ नक्षत्रों में नहीं है। अगस्त्य नक्षत्र एक ऋषि का है, इन्होंने विन्याचल को बढ़ने से रोक दिया था। इनका दूसरा नाम 'कुम्भज' है।) अतः इनके उदय हो जाने पर सभी प्रकार के जल स्वच्छ हो जाते हैं। हेमन्त ऋतु में सरोवर तथा तालाबों का जल पीने योग्य हो जाता है। वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में कुआँ तथा झरने का जल पीना चाहिए। शरद् ऋतु में सरोवर, तालाब एवं कुआँ का जल नहीं पीना चाहिए। शेष जल पेय होते हैं, निषेध केवल 'अभिबृष्ट' जल का है। ऐसे जल में स्नान भी नहीं करना चाहिए।

महर्षि कश्यप ने कहा है—'बलाहकाद्याः समदाः कीटा लूताश्च खेचराः। तद्विधोत्सर्गसंगद्वाह्यं तत् तदा जलम्'॥ अर्थात् अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाले अनेक प्रकार की लूताएँ तथा कीड़े आदि ऐसे होते

५ अ० हू०