भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 103

ब्रह्मव्यवज्ञानाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

६७

नदियाँ—नर्मदा, ताप्ती, पयोष्णी, गोदावरी, कावेरी आदि। जिन नदियों का जल उत्तम कहा गया है, उनकी उत्तमता का मापदण्ड है—उनकी प्रवाहशीलता; अन्यथा प्रवाह के शिथिल होने पर उत्तमता में भी क्षिण्डिता आ जाती है, फलतः वे भी अपथ्यकारक हो जाती हैं।

विद्याकूपतडागादीन् जाङ्गलानूपशैलतः।

कूप आदि का जल—कुआँ, तालाब, झील आदि के जलों के गुण-दोष का निर्णय जांगल देश, अनुपदेश तथा पर्वतीय देश के अनुसार होता है।

वक्तव्य—जांगल देश के कूपों, तालाब आदि का जल स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए उत्तम होता है, अनुपदेश में स्थित इनका जल हानिकारक तथा पर्वतीय प्रदेश का जल ऊपरी भागों में हितकर एवं पर्वत के निचले भाग का जल प्रायः अहितकर होता है।

सुश्रुत के अनुसार अशुद्ध जल को शुद्ध करने की विधि—‘तत्र’...‘मणिश्चेति’। (सु.सू. ४।१७) अर्थात् मलिन जल को शुद्ध करने वाले सात पदार्थ हैं—१. कतक (निर्मली), २. गोमेदक, ३. विसग्रन्थि (कमल की जड़), ४. शैवाल (काई) की जड़, ५. वस्त्र, ६. मोती, ७. मणि (फिटकरी) आदि।

‘पञ्च’...‘चेति’। (सु.सू. ४।१८) अर्थात् पाँच वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिनके ऊपर पानी के पात्र को रख देने से भूमि का प्रभाव जल पर नहीं पड़ता—१. फलक (सेमल आदि लकड़ी का तस्त्ता), २. श्चण्डक (निकटि या तिपायी), ३. मुञ्जवल्ल्य (मूँज आदि का बना गोल आकार का असन), ४. उदकमञ्जिका जिस पर जमीन से ऊँचे जलपात्र रखा जाय तथा ५. शिष्य (छीका)।

‘सप्त’...‘चेति’। (सु.सू. ४।१९) अर्थात् पानी को शीतल करने के सात उपाय हैं—१. हवा में (सुले स्थान में) पानी को रखना, २. पानी से भरे पात्र को बाहर से गीले वस्त्र से लपेट कर उसे तर रक्खना, ३. यन्त्र, लकड़ी आदि को घुमाते रहना, ४. पंखा चलाना, ५. वस्त्र द्वारा छानना, ६. पानी भरे पात्र को बालू के आसन पर रखना तथा ७. जलपात्र को छीके पर लटकाना।

नाम्बु पेयमशक्त्या वा स्वल्पमल्पाग्रिगुल्मिभिः ॥ १३ ॥

पाण्डुररातिसाराशौग्रहणीशोषशोथिभिः। कृते शरत्रिदायाभ्यां पिबेत्त्वस्योऽपि चालपशः ॥

जलपान-विधि—शक्ति से अधिक जल किसी को नहीं पीना चाहिए। मन्दग्रि, गुरुम, पाण्डुरोग, उदरोग, अतिसार, अशौरोग, ग्रहणीरोग, शोष (राजयक्ष्मा) तथा शोथरोग से युक्त पुरुषों को थोड़ा जल पीना चाहिए ॥ १३-१४ ॥

समस्थूलकृशा भुक्तमध्यान्तप्रथमान्बुपाः।

जलपान का प्रभाव—भोजन करते समय बीच-बीच में पानी पीने वालों का शरीर ‘सम’ रहता है, भोजन के अन्त में जल पीने वालों का शरीर स्थूल (मोटा) होता है और भोजन के आरम्भ में जल पीने वालों का शरीर कृश (दुर्बल) हो जाता है।

वक्तव्य—बेचारे वे जब पहले पानी से ही पेट भर लेंगे, तो भोजन कहाँ कर पायेंगे? वे कृश क्यों होंगे तो और क्या होंगे?

शीतं मदात्ययग्लानिमूर्च्छाच्छर्दिश्रमभ्रमान् ॥ १५ ॥

तृष्णोण्णदाहपित्ताग्निविषाण्यम्बु नियच्छति।

शीतल जलपान के लाभ—शीतल जल का सेवन करने से मदात्ययरोग, ग्लानि (हर्षभाय), मूर्च्छा (बेहोशी), छर्दि (वमन), श्रम (थकावट), भ्रम, तृष्णा, उष्ण या ऊष्म (गर्मी या पसीने की अधिकता), ज्वर (जलन), पित्तविकार, रक्तविकार तथा विषविकार नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ॥