भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

दीपनं पाचनं कण्ठं लघुणं बस्तिशोधनम् ॥ १६ ॥

हिध्माधानानिलश्लेष्मसद्यःशुद्धिनवज्वरे । कासामपीनसन्वासपाश्वरक्षु च शस्यते ॥ १७ ॥

उष्ण जलसेवन के लाभ—यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, आमरस को पचाता है, कण्ठ के लिए हितकर है, लघु ( शीघ्र पचता ) है, बस्ति का शोधक है; हिका, अफरा, वातविकार, कफविकार, तत्काल किये गये वमन, विरेचन, नवज्वर, कास, आमाजीर्ण, पीनस, श्वास तथा पाश्वशूल रोगों में इसका प्रयोग प्रशंसित है ॥ १६-१७ ॥

वक्तव्य—उष्ण जल के प्रयोग सम्बन्धी अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं। यथा—१. अष्टमांश शेष, २. चतुर्थांश शेष, ३. अर्धांश शेष तथा ४. उबाल कर रखा गया। ये जल उत्तरोत्तर सामान्य होते हैं। अष्टमांश शेष जल का प्रयोग प्रायः उच्च तापमान वाले ज्वर में गुनगुना करके दिया जाता है। यह स्वयं भी एक उत्तम औषध का काम करता है, व्यवहार करके देखें। जल को उबाल कर छान लें, उसे ठण्डा करने के लिए रख दें। यह निर्दिष्ट जल सभी के पीने योग्य होता है। उष्णजल की उत्तमता १२ या २४ घण्टों तक ही रहती है, शेष आगे देखें।

अनभिष्यन्दि लघु च तोयं क्वथितशीतलम्। पित्तयुक्ते हितं दोषै, व्युषितं तत्त्विदोषकृतम् ॥ १८ ॥

भूतशीत एवं बासी जल—उक्त विधियों से पकाकर शीतल किया हुआ जल अभिष्यन्दी नहीं होता अपितु वह लघु होता है। यह जल वातपित्त, कफपित्त तथा सन्निपात में भी यदि पित्त की अधिकता हो तो हितकर होता है और यही जल जब बासी हो जाता है, तो त्रिदोषकारक होता है ॥ १८ ॥

वक्तव्य—इस विषय में मुश्रुत की स्पष्टोक्ति देखें—'यत् ब्राह्म्यानं निर्वाणं निष्केनं निर्मलं लघु। चतुर्मागावेशपस्तु ततोयं गुणवत् स्मृतम्' ॥ ( सु.सू. ४।१० ) अर्थात् जो पानी पकाने पर वेगरहित, झगरहित तथा निर्मल हो जाय और चतुर्थांश शेष रह गया हो, वह लघु एवं गुणकारी होता है।

नारिकेलोदकं स्निग्धं स्वादु वृष्यं हिमं लघु। तृष्णापित्तानिलहरं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ १९ ॥

नारियल का जल—नारियल के कच्चे फल के भीतर दूध की आकृति का जो पानी होता है, वह स्निग्ध, स्वादु, वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतल तथा लघु होता है। यह प्यास, पित्तविकार, वातविकार को नष्ट करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है तथा बस्ति को शुद्ध करता है ॥ १९ ॥

वक्तव्य—कवि कहता है कि ईश्वर की लीला विचित्र है। देखें उदाहरण—'समायाति यदा लक्ष्मीनारि-केलफलाम्बुवत्। विनिर्याति यदा लक्ष्मीर्जम्बुतकपित्यवत्' ॥ अर्थात् जब लक्ष्मी आती है तो नारियल के फल के भीतर पानी की भीति और जब वह जाने लगती है तो हाथी द्वारा खाये ( निगले ) गये कैथ के गूदा की भीति। हाथी कैथ के फल को गूदा सहित निगल जाता है और जब उसके मल में वह कैथ का फल पाया जाता है तो बिना गूदा का। आश्चर्य है, बिना फल के फूटे वह गूदा कहीं गया ?

वर्षासु दिव्यनादेये परं तोये वरावरे।

इति तोयवर्गः।

उत्तम एवं अधम जल—वर्षा ऋतु में दिव्य ( वर्षा का ) जल उत्तम होता है और नदी का जल पीने योग्य नहीं होता है।

अथ क्षीरवर्गः

स्वादुपाकरसं स्निग्धमोजस्यं धातुवर्धनम् ॥ २० ॥

वातपित्तहरं वृष्यं श्लेष्मलं गुरु शीतलम्। प्रायः पयः—

सामान्य दूध के गुण—प्रायः दूध रस एवं पाक में मधुर, स्निग्ध, ओजस् एवं रस आदि धातुओं को बढ़ाने वाला, वात-पित्तशामक, वीर्यवर्धक, कफकारक, गुरु तथा शीतल होता है ॥ २० ॥