भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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विविधानिध्याध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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—अत्र गव्यं तु जीवनीयं रसायनम् ॥ २१ ॥

क्षतक्षीणहितं मेध्यं बल्यं सत्य्यकरं सरम् । श्रमप्रममदालक्ष्मीश्वासकासातिरुदक्षुधः ॥ २२ ॥

जीर्णज्वरं मूत्रकृच्छ्रं रक्तपित्तं च नाशयेत् ।

गाय के दूध के गुण—यह विशेष करके जीवनीय शक्ति को देने वाला तथा रसायन के गुण-धर्मों से युक्त होता है। उरःक्षत एवं क्षयरोगियों के लिए हितकर होता है। यह मेधा (धारणाशक्ति) दायक, बलकारक, मूत्रवर्धक तथा सर है। यह श्रम, श्रम, मद, अलक्ष्मी (कान्तिहीनता), श्वास, कास, प्यास का अधिक ज्वर, अधिक भूख का लगना, जीर्ण (पुराना) ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तपित्त रोग का विनाशक है ॥ २१-२२ ॥

हितमत्यन्मन्यनिद्रेभ्यो गरीयो माहिषं हिमम् ॥ २३ ॥

भैंस के दूध का गुण—जिनकी जठराग्नि तीक्ष्ण हो गयी हों, जिन्हें नींद न आती हों उनके लिए हितकर होता है। यह गाय के दूध से अधिक गुरु तथा शीतल होता है ॥ २३ ॥

वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में वर्णित भैंस के दूध के गुणों में परस्पर विरोध प्रतीत होता है—‘महिषीणां मूत्रं गव्याच्छीततरं पयः। स्नेहान्युनमनिद्राय हितमत्यप्रये च तत्’ ॥ (च.सू. २७।२१९) और—‘महाभिष्यन्दिन्यं माहिषं वह्निनाशनम्। निद्राकरं शीतकरं गव्यात् स्निग्धतरं गुरु’ ॥ (सु.सू. ४५।५५) समन्वय—यहाँ चरक द्वारा कहा गया—गाय के दूध से भैंस के दूध में जो स्नेह की कमी कही गयी है, वह हृदय के लिए कम हितकर है, इस दृष्टि से कहा गया है। भैंस के दूध से निकली वाला जो स्नेह (घी) है, उसकी अपेक्षा गाय के दूध से उत्पन्न स्नेह (घी) हृदय के लिए अधिक हितकर होता है, यही अभिप्राय है। इसीलिए ‘खरण्णादि’ ने भी ‘उत्तम’ शब्द का प्रयोग किया है—‘गव्यं स्नेहोत्तमं क्षीरं गव्याच्च पयसः पयः। यथोत्तरं स्नेहहीनमीरभ्रच्छागमाहिषम्’ ।

अल्पाम्बुपानव्यायामकटुतिक्ताशनैर्लघु । आजं शोषज्वरश्वासरक्तपित्तातिसारजित् ॥ २४ ॥

बकरी के दूध के गुण—बकरी जल थोड़ा पीती है, कूदना-फौदना, दौड़ना आदि अनेक प्रकार का व्यायाम अधिक करती है; कटु-तिक्ता रस युक्त पत्तों को प्रायः खाती रहती है, अतः उसका दूध हल्का (मृदु) होता है। यह शोष (राजयश्म), ज्वर, श्वास, रक्तपित्त तथा अतिसार रोगों को नष्ट करता है ॥ २४ ॥

वक्तव्य—बकरी स्वयं में राजयश्म-चिकित्सा की एक प्रयोगशाला है। चरक-टीकाकार चक्रपाणि ने स्वरचित ‘चक्रदत्त’ में एक प्रयोग इस प्रकार दिया है—

‘छागं मांसं पयश्छागं छागं सर्पिः सशर्करम्।

छागोपसेवा शयनं छागमध्ये तु यक्षमनुत् ॥

अर्थात् बकरी का मांस, चीनी मिला हुआ बकरी का दूध, बकरी का घी, बकरियों के बीच में रहना, इन्हीं के बीच में सोना और इनकी मैं-मैं सुनना यक्षमरोगनाशक होता है। बकरी के दूध-घी आदि के अलग-अलग प्रयोग प्राचीन संहिताओं में भी मिलते हैं। इस प्रकार बकरी का सर्वांग उपयोग आचार्य चक्रपाणि का बुद्धिकौशल है।

काशी-निवासी स्वतन्त्रतासेनानी, वयोवृद्ध पण्डित शिवविनायक मिश्र वैद्य अपने जीवन के अन्तिम दिनों में क्षयरोग से पीड़ित हो गये थे। उन्होंने चक्रदत्त के उक्त श्लोक के अनुसार अपनी जीवनचर्चा बना ली थी, जिससे वे रोगमुक्त हो गये थे; तब से समीपस्थ जनता उन्हें ‘बकरिया वैद्य’ कहा करती थी। उनका स्वर्गवास उसके बहुत दिनों के बाद १९७६ में हुआ। ये स्वतन्त्रता-संग्राम के बाद आयुर्वेद के जीवन्त सेनानी एवं प्रहरी थे। ये बकरी का मांस नहीं खाते थे।

ईषदूक्षोण्णलवणमोष्टूकं दीपनं लघु। शस्तं वातकफानाहकृमिशोफोदराशंसाम् ॥ २५ ॥