अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदय
ऊंटनी के दूध के गुण—ऊंटनी का दूध थोड़ा रुक्षता युक्त, उष्ण तथा लवण रसयुक्त, अपिद्दीपक, लघु ( हल्का ) होता है। यह वातविकार, कफविकार, आनाह ( अफरा ), कुमिरोग, शोथरोग, उदररोग तथा अशरिग में हितकर होता है ॥ २५ ॥
मानुषं वातपित्तासुगभिघाताक्षिरोमजित्। तर्पणाश्चोतनैर्नस्यैः—
मानुषी दूध के गुण—नारी का दूध वात, पित्त, रक्त तथा अभिघात ( चोट आदि लगने ) के कारण उत्पन्न त्रैव सम्बन्धी रोगों में तर्पण, आच्छ्योत्तन एवं नस्य के रूप में प्रयोग करने से हितकर होता है।
वक्तव्य—तर्पण-विधि—रोगों को चित्त लेटाकर दो-चार बूँदें उसकी आँखों में डालकर कुछ देर दूध से आँखों को तुप्त होने दें। आच्छ्योत्तन-विधि—आँखों या आँख में नारी के दूध की दो-चार बूँदें टपकाना, यह विधि अनेक बार की जाती है। वे दूध की बूँदें बहकर नीचे आ जाती हैं। नस्य-विधि—इसमें नारी के दूध को नथुनों में डालकर ऊपर की ओर को खींचा जाता है। इस नस्य से शिरोरोगों में शान्ति मिलती है।
—अहृद्यं तृणमाविकम् ॥ २६ ॥ वातव्याधिहरं हिध्माग्नासपित्तकफप्रदम्।
भेड़ी के दूध का गुण—हृदय को अप्रिय या अहितकर, उष्ण, वातव्याधिनाशक, हिचकी, श्वास, पित्त एवं कफ को उभाड़ता है ॥ २६ ॥
वक्तव्य—वातव्याधि में इसकी मालिश करने तथा इसे पीने से लाभ होता है।
हस्तिन्याः स्यैर्यकृत—
हथिनी के दूध का गुण—यह शरीर की स्थिरता को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाता है। वास्तव में इसका यह गुण 'कारणानुरूपं कार्यम्' को चरितार्थ करता है।
—बाढमृणं त्वैकशफं लघु ॥ २७ ॥ शाखावातहरं सास्त्रलवणं जडताकरम्।
एकशफ दूध के गुण—एक खुर वाले प्राणियों ( घोड़ी, गधो आदि ) का दूध उष्ण ( गरम ) एवं लघु ( हल्का ) होता है। शाखाओं ( टाँगों, बाँहों, रक्त आदि धातुओं एवं त्वचा ) के वातदोष का नाशक है। यह कुछ खट्टा एवं लवणरस युक्त होता है और जडता ( आलस्य एवं बुद्धिहीनता ) कारक होता है ॥ २७ ॥
वक्तव्य—ऊपर २७वें पद्य में श्रीहेमाद्रि ने 'बाढम्' इस पद को हथिनी के दूध का विशेषण माना है और दूसरे विद्वानों ने इसे एकशफ दुग्ध का विशेषण स्वीकार किया है। 'एकशफ' शब्द 'जाती एकवचनम्' के अनुसार एक मान लेने पर यहाँ तक आठ प्राणियों के दूधों का वर्णन कर दिया है। एक शफ ( खुर ) वाले प्राणी अन्य अनेक होते हैं।
पयोऽभिष्यन्ति गुर्वामं, युक्त्या भूतमतोऽन्यथा ॥ २८ ॥
आमभूत दुग्ध-गुण—कच्चा ( बिना गरम किया ) दूध अभिष्यन्दी एवं गुरु, पाक में भारी होता है। विधिवत् पकाया गया दूध इस ( कच्चे ) के विपरीत गुण वाला होता है ॥ २८ ॥
भवेदगरीयोऽतिभूतं, धारोष्णममृतोपमम्।
धारोष्ण दूध के गुण—अत्यन्त पकाया गया दूध अधिक गुरु हो जाता है और धारोष्ण दूध अमृत के समान गुणकारक होता है।