भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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ब्रह्मवैज्ञानीयाध्यायः ५ ]

सूत्रस्थानम्

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बक्तव्य—मनुष्यों की सन्तानें गाय, भैंस आदि के बच्चे जो माता का स्तनपान करते हैं, उन्हें धारोष्ण दूध सुलभ होता है। नवजात किंवा धीराद शिशुओं के भाग्य में अब धारोष्ण दूध पीना नहीं लिखा है, बल्कि आज के युग की देन है।

अस्त्वपाकरसं ग्राहि गुरुष्णं दधि वातजित् ॥ २९ ॥

मेदःशुक्रबलम्स्नेषपितरत्ताग्निशोफकृत । रोचिष्णु शस्तमरुचौ शीतके विषमज्वरे ॥ ३० ॥

पीनसे मूत्रकृच्छ्रं च, रुक्षं तु ग्रहणीगदे। नैवाद्यान्निशि नैवोष्णं वसन्तोष्णशरत्सु न ॥ ३१ ॥

नामृदसूषं नाक्षौद्रं तत्राघृतसितोपलम् । न चानामलकं नापि नित्यं नो मन्दमन्यथा ॥ ३२ ॥

ज्वरासुकपित्तवीसर्पकुष्ठपाण्डुप्रमप्रदम् ।

दधिगुण-वर्णन—दही पाक एवं रस में अम्ल होता है। ग्राही (मल को बाँधने वाला), गुरु (पचने में देर लगाने वाला), उष्ण तथा वातनाशक होता है। मेदोधातु, शुक्र, कफ, पित्त, रक्त, अश्विधर्क एवं बौधकारक होता है। भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है। इसका प्रयोग अरुचि में किया जाता है। जाड़ा लमकर आने वाले विषमज्वर में, पीनसरोग में एवं मूत्रकृच्छ्ररोग में इसका प्रयोग हितकर होता है। ग्रहणीरोग में रुक्ष (मक्खन निकाला हुआ) दही हितकर होता है।

रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिए, उष्ण (आग में तपाया हुआ) दही न खाये, वसन्त, शोम तथा शरद ऋतु में दही न खाये, मूंग की दाल तथा उसके बड़े के बिना दही न खाये, मधु, घी, मिर्ची से रहित दही न खाये, आँवलों से रहित दही न खाये, प्रतिदिन दही न खाये और मन्दक (जो कनीभीति जमा न हो) ऐसा दही भी नहीं खाना चाहिए। यदि इस प्रकार के निषिद्ध दही का सेवन किया गया तो ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठरोग, पाण्डुरोग, भ्रम (चक्कर आना)—ये विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २९-३२ ॥

बक्तव्य—आजकल मक्खन रहित दूध तथा दही भी मिलता है। पुराने क्रम से घी निकालने में देर लगती है। आज भी पञ्जाब प्रदेश में उत्तम दूध, दही, घी सुलभ हैं। यद्यपि दही को बहुत-से लोग सदा खाने हैं, फिर भी इसके निषिद्ध विधि से निषिद्ध कालों में सेवन करने से ऊपर कहे गये ज्वर आदि रोगों के होने की सम्भावना बनी रहती है।

तक्रं लघु कषायाम्लं दीपनं कफवातजित् ॥ ३३ ॥

शोफोदराशौग्रहणीदोषमूत्रग्रहरुचीः । प्लीहगुल्मघृतव्यापदगर्पाण्डुवामयान् जयेत् ॥ ३४ ॥

तक्र (मढ़ा या छाछ)—यह लघु, कषाय, अम्ल, जठराग्निदीपक तथा कफ-वातनाशक होता है। यह शोथरोग, उदररोग, अशौरीग, ग्रहणीरोग, मूत्राघात, अरुचि, प्लीहाविकार, गुल्म, घृत (स्नेह)—व्यापत्, मरविष तथा पाण्डुरोग को जीत लेता है ॥ ३३-३४ ॥

बक्तव्य—'तक्र' के भेदों के सम्बन्ध में सुश्रुत के विचार—'तक्र'—'जिस दही में आधा जल मिलाकर पचने में स्नेह (मक्खन) अलग कर लिया जाता है, फिर जो पतला दही का भाग शेष रहता है, उसे 'तक्र' कहते हैं। यह न तो अधिक गाढ़ा और न अधिक पतला होता है। यह तक्र मधुरविपाकी, रस में अम्ल एवं कषाय होता है।

घोल—बिना पानी मिलाये जो दही मथा जाता है और जिसमें से स्नेह भाग भी अलग नहीं किया जाता, उसे घोल कहते हैं।

तक्रकूर्चिका—यह संग्राही, वातकारक तथा रुक्ष होती है एवं कठिनायी से पचती है।

(दही के साथ दूध को पकाने से 'दधिक्ूर्चिका' और तक्र के साथ दूध को पकाने से 'तक्रकूर्चिका' कन्ती है। तक्र तथा दही के गाढ़े भाग को भी 'कूर्चिका' या 'पनीर' कहते हैं। दूध के गाढ़े भाग