अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
को भी 'कूर्पिका' कहते हैं, लोकव्यवहार में जिसे 'खोया' या 'मावा' कहते हैं। दूध को फाइकर जो घन भाग बच जाता है, उसे 'किलार' या 'छेना' कहते हैं।)
मण्ड —यह तक्र से भी पाचन में लघु होता है, इसे 'मस्तु' भी कहते हैं। इसे दही का पानी या छाछ का पानी भी कहते हैं।
तक्रप्रयोग-निषेध —घाव लगा जाने पर, उष्णकाल (ग्रीष्म तथा शरद ऋतु) में, दुर्बलता में, मूच्छ्रा, भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त रोग में तक्र का प्रयोग न करें।
तक्रप्रयोग काल —शीतकाल में, अग्रिमान्चरोग में, कफजनित विकारों में, स्रोतों में रुकावट आने पर तथा वात के दूषित होने पर तक्र का सेवन करना उत्तम होता है।
तक्र के गुण —मधुर रस वाला तक्र कफप्रकोपक तथा पित्तशामक होता है और अम्लरस-प्रधान तक्र वातनाशक तथा पित्तकारक होता है।
तक्रप्रयोग-विधि —वातदोष में अम्ल तक्र में नमक मिलाकर, पित्तदोष में मधुर तक्र में चीनी मिलाकर तथा कफदोष में तक्र में सोठ, मरिच, पीपल के साथ कोई एक धार मिलाकर पीना चाहिए। इन प्रसंगों को देखें—सु.सू. ४५ के तक्रवर्ग में।
तक्र की प्रशंसा —संस्कृत के सुभाषित-साहित्य में विद्वानों ने तक्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यथा—'तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्'। कविराज लोलिम्बराज ने इसका वर्णन आलंकारिक भाषा में किया है। देखें—वैद्यावतंस, निघण्टु। तक्र के वास्तविक गुणों का परिचायक एक पद्य इस प्रकार है—
'न तक्रसेवी व्यथते कदाचित् न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः।
यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमस्ति'॥
तद्वमस्तु सरं स्रोतःशोधि विष्टम्भजिल्लघु।
मस्तु का वर्णन —मस्तु (दही का पानी) भी तक्र के समान गुण वाला होता है। विशेषकर यह सर, स्रोतों का शोधक, विष्टम्भ (कञ्चियत) को दूर करता है तथा पाचन में लघु होता है।
वक्तव्य —जब तक्र का गाढ़ा भाग नीचे बैठ जाता है और उसके ऊपर जो जलीय भाग तैरता है, वह 'तक्रमस्तु' है।
नवनीतं नवं वृष्यं शीतं वर्णबलाश्रिकृत्॥ ३५॥
सङ्ग्रहि वातपित्तसुक्क्षयाशौदितकासजित्।
नवनीत-वर्णन —नवनीत (ताजा निकाला गया) मक्खन वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, कान्तिकारक, बलवर्धक, अग्नि को तीव्र करने वाला और संग्राही (मल को बाँधने वाला) होता है। वातविकार, पित्तविकार, रक्तविकार, क्षयरोग, अशरिरोग (रक्ताशर्), अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा) तथा कासरोग का विनाश करता है॥ ३५॥
क्षीरोद्भवं तु सङ्ग्रहि रक्तपित्तक्षिरोगजित्॥ ३६॥
दूध का नवनीत —दूध से निकाला गया नवनीत विशेषकर संग्राही होता है। यह रक्तरोग, पित्तरोग तथा नेत्ररोगों का विनाश करता है॥ ३६॥
वक्तव्य —दूध को मथकर जो स्नेहद्रव्य प्राप्त किया जाता है, उसे 'नवनीत' कहा जाता है। आज के दूध को गरम करके दही जमाकर, कल को उसे मथकर जो स्नेहद्रव्य प्राप्त किया जाता है, उसे 'हैयंगवीन' कहते हैं। यह भी 'नवनीत' का ही एक प्रकार-भेद है। दोनों में ही दूध या दही का कुछ भाग लगा रहता है। पकाने पर घी का भाग ऊपर आ जाता है और दूध या दही का भाग नीचे रहकर जल जाता है।