अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
को भी 'कूर्पिका' कहते हैं, लोकव्यवहार में जिसे 'खोया' या 'मावा' कहते हैं। दूध को फाइकर जो घन भाग बच जाता है, उसे 'किलार' या 'छेना' कहते हैं।)
मण्ड —यह तक्र से भी पाचन में लघु होता है, इसे 'मस्तु' भी कहते हैं। इसे दही का पानी या छाछ का पानी भी कहते हैं।
तक्रप्रयोग-निषेध —घाव लगा जाने पर, उष्णकाल (ग्रीष्म तथा शरद ऋतु) में, दुर्बलता में, मूच्छ्रा, भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त रोग में तक्र का प्रयोग न करें।
तक्रप्रयोग काल —शीतकाल में, अग्रिमान्चरोग में, कफजनित विकारों में, स्रोतों में रुकावट आने पर तथा वात के दूषित होने पर तक्र का सेवन करना उत्तम होता है।
तक्र के गुण —मधुर रस वाला तक्र कफप्रकोपक तथा पित्तशामक होता है और अम्लरस-प्रधान तक्र वातनाशक तथा पित्तकारक होता है।
तक्रप्रयोग-विधि —वातदोष में अम्ल तक्र में नमक मिलाकर, पित्तदोष में मधुर तक्र में चीनी मिलाकर तथा कफदोष में तक्र में सोठ, मरिच, पीपल के साथ कोई एक धार मिलाकर पीना चाहिए। इन प्रसंगों को देखें—सु.सू. ४५ के तक्रवर्ग में।
तक्र की प्रशंसा —संस्कृत के सुभाषित-साहित्य में विद्वानों ने तक्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यथा—'तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्'। कविराज लोलिम्बराज ने इसका वर्णन आलंकारिक भाषा में किया है। देखें—वैद्यावतंस, निघण्टु। तक्र के वास्तविक गुणों का परिचायक एक पद्य इस प्रकार है—
'न तक्रसेवी व्यथते कदाचित् न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः।
यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमस्ति'॥
तद्वमस्तु सरं स्रोतःशोधि विष्टम्भजिल्लघु।
मस्तु का वर्णन —मस्तु (दही का पानी) भी तक्र के समान गुण वाला होता है। विशेषकर यह सर, स्रोतों का शोधक, विष्टम्भ (कञ्चियत) को दूर करता है तथा पाचन में लघु होता है।
वक्तव्य —जब तक्र का गाढ़ा भाग नीचे बैठ जाता है और उसके ऊपर जो जलीय भाग तैरता है, वह 'तक्रमस्तु' है।
नवनीतं नवं वृष्यं शीतं वर्णबलाश्रिकृत्॥ ३५॥
सङ्ग्रहि वातपित्तसुक्क्षयाशौदितकासजित्।
नवनीत-वर्णन —नवनीत (ताजा निकाला गया) मक्खन वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, कान्तिकारक, बलवर्धक, अग्नि को तीव्र करने वाला और संग्राही (मल को बाँधने वाला) होता है। वातविकार, पित्तविकार, रक्तविकार, क्षयरोग, अशरिरोग (रक्ताशर्), अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा) तथा कासरोग का विनाश करता है॥ ३५॥
क्षीरोद्भवं तु सङ्ग्रहि रक्तपित्तक्षिरोगजित्॥ ३६॥
दूध का नवनीत —दूध से निकाला गया नवनीत विशेषकर संग्राही होता है। यह रक्तरोग, पित्तरोग तथा नेत्ररोगों का विनाश करता है॥ ३६॥
वक्तव्य —दूध को मथकर जो स्नेहद्रव्य प्राप्त किया जाता है, उसे 'नवनीत' कहा जाता है। आज के दूध को गरम करके दही जमाकर, कल को उसे मथकर जो स्नेहद्रव्य प्राप्त किया जाता है, उसे 'हैयंगवीन' कहते हैं। यह भी 'नवनीत' का ही एक प्रकार-भेद है। दोनों में ही दूध या दही का कुछ भाग लगा रहता है। पकाने पर घी का भाग ऊपर आ जाता है और दूध या दही का भाग नीचे रहकर जल जाता है।
ब्रह्मवैवर्तमानीयाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
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शस्तं धीस्मृतिमेधाग्रिबलायुःशुक्रचक्षुषाम् । बालवृद्धप्रजाकान्तिसीकुमार्यस्वराथिनाम् ॥ ३७ ॥ क्षतक्षीणपरीसर्पशस्त्राग्रिलपितात्मनाम् । वातपित्तविषोन्मादशोषालक्ष्मीज्वरापहम् ॥ ३८ ॥ स्नेहानामृतत्वं शीतं वयसः स्थापनं परम् । सहस्रवीर्यं विधिभिर्घृतं कर्मसहस्रकृतम् ॥ ३९ ॥
घृत के गुण—बुद्धि, स्मृति (स्मरणशक्ति), मेधा (धारणाशक्ति वाली बुद्धि), जठराग्नि, शारीरिक बल, दीर्घायु (आयुर्वे घृतम्), शुक्र तथा दृष्टि के लिए उत्तम है; बालकों तथा वृद्धों के लिए श्रेष्ठ है। प्रजा (सन्तान), कान्ति, सुकुमारता तथा सुरीला या तेज स्वर चाहने वालों के लिए उत्तम है। क्षत, क्षीण (क्षयपीडित), विसर्परीगो, शस्त्रहत, अग्रिदाह से पीड़ित रोगियों के लिए हितकर है। वातविकार, पित्तविकार, विषविकार, उन्माद, शोष (राजयक्ष्मा), अलक्ष्मी (निर्धनता या कुरूपता) तथा ज्वर का नाश करता है। यह समस्त स्नेहद्रव्यों में श्रेष्ठ है, शीतवीर्य है, जीवन को स्थिर रखने वाले द्रव्यों में भी सर्वश्रेष्ठ है। शास्त्रोक्त विधियों से पकाकर रखा गया घी हजारों शक्तियों से पूर्ण होता है, अतएव युक्तियुक्त इसका प्रयोग करने पर यह हजारों चिकित्सोपयोगी कर्मों को करता है ॥ ३७-३९ ॥
मदापस्मारमूर्च्छाविशिरःकर्णाक्षियोजिनाम् । पुराणं जयति व्याधीन् ब्रणशोघनरोपणम् ॥ ४० ॥
पुराने घी के प्रयोग—मदपानजनित मदात्यय आदि विकारों में, अपस्मार, मूर्च्छा, सिर, कान तथा कनि (गर्भाशय, भ्रग) के रोगों का विनाश करता है। यह ब्रणों का शोधन एवं रोपण करता है ॥ ४० ॥
वक्तव्य—पुराने घी का व्यावहारिक परिचय सु.सू. ४५।१०७-१०९ से प्राप्त होगा। शास्त्रकारों ने काल की अवधि के अनुसार इसके नामभेद किये हैं। यथा—१. पुराणघृत, २. कुम्भसर्पि तथा ३. महाघृत। इनका प्रयोग उक्त सूत्रत-सन्दर्भ के अनुसार करें। इसके भी कुछ अवात्सर भेद किये गये हैं। यथा—१ वर्ष पुराना, १० वर्ष पुराना, १५ वर्ष से अधिक पुराना अथवा १०० वर्ष या १११ वर्ष पुराना घृत 'पुराणघृत' वा 'कुम्भसर्पि' कहा जाता है। इससे भी अधिक पुराने घी को 'महाघृत' कहा जाता है। यह घी केवल औषधोपयोगी रह जाता है। घी जितना पुराना होगा उसका वर्ण मोमियों हो जाता है। तब इसमें विशेष प्रकार की गन्ध आने लगती है। इस घी का प्रयोग—सन्निपातज्वर में सिर के ऊपर ब्रह्मरन्ध के स्थान पर रखते हैं। श्वासरोग में इसे छाती, पसलियों तथा गले में लगाते (मलते) हैं। इसका संग्रह पहले श्रीमानों के घरों में, प्राचीन परम्परा के वैद्यों तथा हकीमों के चिकित्सालयों में होता था। यह चिकित्सा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण माना जाता था।
बल्याः किलाटपीयूषकूर्चिकामोरणादयः । शुक्रनिद्राकफकरा विष्टम्भिगुरुदोषलाः ॥ ४१ ॥
किलाट आदि का वर्णन—दूध से बनाये गये किलाट, पीयूष, कूर्चिका, मोरण या मोरट आदि ज्वर से क्षीरशाक एवं तर्कपिण्ड का ग्रहण किया जाता है। ये सब बल, शुक्र, निद्रा तथा कफदोष को बढ़ाते हैं। ये विष्टम्भी, गुरु तथा दोषकारक होते हैं ॥ ४१ ॥
वक्तव्य—किलाट आदि का परिचय—इनके सम्बन्ध में हम इसी अध्याय में ३३-३४ श्लोकों के नीचे कह चुके हैं। मोरण या मोरट—पकते हुए दूध को नीबू के रस या फिटिकरी डालकर फाड़ लिया जाता है। जलीय भाग को मोरण या मोरट जेज्जट ने सूक्ष्म के ४५वें अध्याय में यथास्थान कहा है। उसके बाद भाग को छेना कहते हैं। पीयूष—अन्त्य इसका अर्थ 'अमृत' है। नवप्रसूता गाय या भैंस के एक सप्ताह तक के दूध को पकाया जाता है, पकाते ही वह फटकर गाढ़ा हो जाता है, इसे पीयूष कहा जाता है। यह अत्यन्त गरिष्ठ होता है। ५-७ दिन के बाद यह दूध शुद्ध हो जाता है।
गव्ये क्षीरघृते श्रेष्ठे निन्दिते चाविसम्भवे ।
इति क्षीरवर्गः ।
उत्तम-अधम विचार—इस प्रकरण में कहे गये दूध तथा घी में गाय का दूध और गाय का घी का उत्तम होता है और भेड़ का दूध एवं घी निन्दिता होता है।
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—'नानौषधिभृतं जगति किञ्चिद् विद्यते'। चरक के इस वचन के अनुसार सभी पदार्थ चिकित्सोपयोगी हैं, अतएव उन सबका अपने-अपने स्थान पर महत्त्व होता ही है। यहाँ तो गाय और भेड़ के दूध, दही, घी की परस्पर तुलना की चर्चा मात्र है।
अथेशुवर्गः
इक्षो रसो गुरुः स्निग्धो बृंहणः कफमूत्रकृत् ॥४२॥
वृष्यः शीतोऽघ्नपित्तजः स्वादुपाकरसः सरः।
ईख के रस का वर्णन—ईख का रस सामान्य रूप से गुरु, स्निग्ध, बृंहण (पुष्टिकारक), कफ तथा मूत्र को बढ़ाने वाला होता है। यह वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतल, रक्तपित्तनाशक, रस एवं पाक में मधुर तथा सर (मलभेदक) होता है ॥४२॥
बक्तव्य—शास्त्रान्तरों में ईख के भेद—आज चल रही विकास की आँधी में इनकी कुछ ही जातियों के नाम सुनायी देते हैं, हो सकता है कि आगे ये बचे-खुचे नाम भी उड़ जायेंगे; तथापि इनका उल्लेख यहाँ कर दिया जा रहा है! १. पौडूक (पौड़ा), २. भीरूक, ३. वंशक, ४. शतपोरक (सौ गाँठों वाला), ५. कान्त्तर, ६. तापसेधु (जंगलों में होने वाली ईख), ७. कण्डेशु, ८. सूचिपत्रक (जिसके पत्ते सुई की भाँति चुभते हों या नाम-विशेष), ९. नेपाल (नेपाल देश में होने वाला), १०. दीर्घपत्र (नाम-विशेष, जैसे तो सभी ईखों के पत्ते लम्बे होते हैं), ११. नीलपोर (जिसकी गाँठों में नीली आभा हो), १२. कोशकृत् तथा १३. मनोगुप्ता—ये तेरह जातियाँ ईख की कही गयी हैं, इसी को 'ऊख' भी कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे 'सुगर केन' कहते हैं। संस्कृत में इसका एक नाम 'गुडमूल' है अर्थात् ईख सभी प्रकार की मिठाइयों की जड़ है। आगे चलकर बाल, तरण, वृद्ध भेद से भी इसके गुणों का वर्णन किया गया है।
ईख के रस से निर्मित पदार्थ—१. फाणित (राब), २. मत्स्यण्डी (मछली के अण्डों के सदृश) या खण्डराब, ३. गुड, ४. खण्ड (खाँड़), ५. शर्करा (चीनी), ६. पुष्पसिता या सितोपला (फूलमिश्री)। इनके गुण चरक, सुश्रुत आदि में देखें।
सोऽग्रे सलवणो, दन्तपीडितः शर्करासमः ॥४३॥
अगले भाग का रस—ईख के प्रारम्भिक एक-दो पोरों का रस कुछ नमकीन जैसा होता है। मध्य भाग का दौतों से चूसा हुआ रस चीनी के समान मधुर एवं गुणकारक होता है ॥४३॥
मूलाग्रजन्तुजगधादिपीडनात्मलसङ्घ्रातु। किञ्चित्कालं विधृत्या च विकृतिं याति यान्निकः ॥
विदाही गुरुविष्टम्भी तेनासौ—
यान्निक रस के भेद—यन्त्र-विशेष में दबाकर निकाला हुआ ईख का रस—जड़ का भाग, अगला भाग तथा कीड़े आदि द्वारा खाया गया भाग सब एक साथ निचोड़ा जाता है। उसमें मैल का भी मिश्रण हो जाता है और वह कुछ समय तक उसी प्रकार पड़ा रह जाता है, तो वह रस विकृत (विकारयुक्त) हो जाता है। अतः वह विदाहक, गुरुपाकी तथा विष्टम्भी हो जाता है ॥४४॥
—तत्र पौण्ड्रकः। शैत्यप्रसादमाधुर्यैर्वस्तमनु वांशिकः ॥४५॥
ईख के भेद तथा गुण—ईख की अनेक जातियाँ होती हैं, उनमें पौण्ड्रक नामक ईख जो देखने में मोटी, चबाने में कोमल होती है, उसका रस शीतल, स्वच्छ एवं मधुर होने के कारण सबमें श्रेष्ठ होता है। इससे गुणों में कुछ कम 'वांशिक' नामक ईख होती है ॥४५॥
बक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने 'वांशिक' नामक ईख का पर्याय 'नीलेषु' दिया है। यह पौण्ड्रक जैसी मोटी तो होती है, किन्तु उससे कठोर होती है।
शतपर्वकान्तरनैपालाद्यास्ततः क्रमात्। सक्षाराः सकषायान्श्च सोष्णाः किञ्चिद्विदाहितः ॥
ब्रह्मवैज्ञानीयाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
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शतपर्वक आदि ईखों के गुण—शतपर्वक ईख ( अनेक पोरों वाला ) कान्त्तर, नैपाल, आदि शब्द से दीर्घपत्र आदि भेदों को समझना चाहिए। उक्त ईखों के रस वंशिक नामक ईख के रस से उत्तरोत्तर हीन गुण वाले होते हैं। यथा—क्रमशः कुछ खारे, कुछ कसैले, कुछ उष्ण और कुछ विदाहकारक होते हैं ॥ ४६ ॥
बक्तव्य—आज जहाँ ईख की प्राचीन जातियों का ह्रास हो रहा है, वहीं कृषि सम्बन्धी वैज्ञानिक अनुसन्धानों द्वारा नयी-नयी ईख की जातियों का आविष्कार भी हो रहा है। आज के नये उर्वरकों द्वारा उनकी उपज में बढ़ोत्तरी देखी जाती है, किन्तु स्वाद-गुण में प्राचीन जातियों की तुलना में ये कहीं स्थिर नहीं हैं, ऐसा बुद्धिजीवियों का मानना है। ये सब गुणानुरूप कार्य हैं।
फाणितं गुर्वभिष्यन्दि चयकृन्मूत्रशोधनम्।
फाणित के गुण—फाणित गुरु, अभिष्यन्दी, दोषों का संचय करने वाला किन्तु मूत्र का शोधन करने वाला होता है अर्थात् इसका सेवन करने से मूत्र खुलकर निकल आता है।
नातिस्त्वेष्वकरो धीतः सूष्ट्यमूत्रशकदुगुडः ॥ ४७ ॥
प्रभूतकृमिमज्जासुइमेदोमांसकफोऽपरः ।
गुड के गुण—१. ईख के रस को स्वच्छ करके बनाया गया प्रथम श्रेणी का गुड अधिक कफकारक नहीं होता तथा यह मूत्र एवं पुरीष का प्रवर्तक होता है। २. ईख के रस को पकाते समय उसकी मील को निकाले बिना जो गुड बनाया जाता है, वह उक्त प्रथम गुड से दूसरी श्रेणी का होता है। उसके गुण—इसके सेवन से पेट में पर्याप्त क्रिमियों की उत्पत्ति होती है, यह मज्जा, मेदस्, मांस तथा कफदोष को बढ़ाता है ॥ ४७ ॥
हृद्यः पुराणः पथ्यश्च, नवः स्त्वेष्मायिसादकृत ॥ ४८ ॥
पुराने-नये गुड के गुण—पुराना गुड हृदय के लिए हितकारक तथा पथ्य होता है और नया गुड कफदोष को बढ़ाने वाला एवं जठराग्नि को मन्द कर देता है ॥ ४८ ॥
वृष्याः क्षीणक्षतहिता रक्तपितानिलापहाः। मत्स्यण्डिकाखण्डसिताः क्रमेण गुणवत्तमाः ॥ ४९ ॥
मत्स्यण्डिका आदि के गुण—मत्स्यण्डिका ( राब ), खण्ड ( खाँड़ ) तथा सिता या सितोपला ( मिश्री ) ये उत्तरोत्तर गुणवान् होते हैं अर्थात् मत्स्यण्डिका से खण्ड, इससे सिता अधिक गुणवाली होती है। इनके गुण—ये सभी वृष्य, क्षत ( उःक्षत ) तथा क्षीण पुरुषों के लिए हितकर होते हैं और रक्तपित्त एवं वातदोष नाशक हैं ॥ ४९ ॥
बक्तव्य—ईख के रस को भलीभाँति पकाते-पकाते जब वह पत्थर की भाँति कड़ा हो जाता है, तो उसे 'गुड' कहते हैं, किन्तु उसी गुड को गौड ( बंगाल का पुराना नाम ) देशवासी मत्स्यण्डी कहते हैं। यथा—'इक्षो रसो यः सम्पन्नो जायते लोछवद् घनः। स गुडो, गौडदेशे तु मत्स्यण्डयेव गुडो मतः' ॥
तद्वृणा तित्तमधुरा कषाया यासशर्करा।
यासशर्करा या यवासशर्करा—इसे 'जवासा' की खाँड़ या चीनी कहते हैं। यह भी ईख की चीनी के समान गुणों वाली होती है। यह कुछ तित्त, मधुर तथा कषाय रस वाली होती है।
दाहतुदच्छर्दिमूर्च्छासूकपित्तज्यः सर्वशर्कराः ॥ ५० ॥
सभी प्रकार की शर्कराओं के गुण—दाह ( जलन ), प्यास, वमन, मूर्च्छा ( बेहोशी ) तथा रक्तपित्त का शमन करती हैं, अतः इन्हें उत्तम कहा गया है ॥ ५० ॥
बक्तव्य—ईख के अतिरिक्त अन्य पदार्थों से भी शर्करा का निर्माण किया जाता है। जैसे—ताड़ का गुड, ताड़ की चीनी, खजूर की चीनी, दाख ( मुनबका ) की चीनी तथा अन्य मधुर फलरसों से बनायी गयी चीनी, मधुशर्करा आदि।
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अष्टाङ्गहृदये
मधुशर्करा—जैसे राब में बाँड का अंश नीचे बैठ जाता है वैसे ही किसी-किसी मधु में मधुशर्करा का अंश नीचे इकट्ठा हो जाता है। उसमें चीनी के सदृश कण दिखलायी देते हैं। यह स्थिति मधु में दो या तीन मास के बाद देखी जाती है और मधु का तरल भाग ऊपर तैरता रहता है, यह भी शर्कराभेद ही है। यही कारण है कि प्राचीन संहिताकारों ने मधुशर्करा के गुण-धर्मों का वर्णन किया है। देखें—सू. सू. ४५।१६६। कुछ पर्वतीय प्रदेशों में मधु को जमा देने के लिए शुद्ध घी का जामन डाल देते हैं। इससे मधु जम जाता है, उसे बर्फी की भाँति काटकर मेहमानों ( महामान्यों ) का स्वागत किया जाता है।
शर्करेशुविकाराणां फाणितं च वरावरे।
इतीशुवर्गः।
शर्करा की उत्तमता—ईध के रस से बनने वाले सभी पदार्थों में शर्करा तथा मिथी सर्वश्रेष्ठ होती है। फाणित ( राब ) अधम होती है।
वक्तव्य—‘यासशर्करा’—जवासा नामक पौधा से जो गोंद निकलती है, उसी को यासशर्करा अथवा यवासशर्करा कहते हैं। देखें—सू. सू. ४५।१६७। यह औषध व्यवसाइयों की दूकान में माना या मना नाम से मिलती है। यह राजाओं एवं श्रीमानों के योग्य विरचन है, यूनानी वैद्यक में प्रसिद्ध तुरअवनी भी यही है। इसे चासनी बनाकर बर्फी की भाँति जमा लिया जाता है, एक टुकड़ा बर्फी पानी के साथ लें, मुँह भी मीठा और पेट भी साफ।
अथ मधुवर्गः
चक्षुष्यं छेदि तुर्यलेम्विषहिध्माघ्रपितन्तु॥५१॥
मेहकुष्ठकृमिच्छर्दिषासकासतिसारजित्। ब्रणशोधनसन्धानरोपणं वातलं मधु॥५२॥
रूक्षं कषायमधुरं, तत्तुल्या मधुशर्करा।
मधु का वर्णन—मधु ( शहद ) नेत्रों के लिए हितकारक होता है, यह लेखन होने के कारण कफ को निकाल देता है; प्यास, कफदोष, विषविकार, हिवका ( हिवकी ), रक्तपित्त, प्रमेह, कुष्ठ, क्रिमि, छर्दि, श्वास, कास तथा अतिसार रोग को नष्ट करता है। यह ब्रणशोधक, ब्रणसन्धान तथा ब्रणरोपण करता है। यह वातदोषकारक है, रूक्ष, कषाय एवं मधुर गुणवाला है। इसी के समान गुणों वाली ‘मधुशर्करा’ भी होती है॥५१-५२॥
वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार मधु आठ प्रकार का होता है—१. पौस्तिक, २. ग्रामर, ३. शौद्र, ४. माशिक, ५. छात्र, ६. आर्य्य, ७. औद्गालक तथा ८. दाल। हमने मधुशर्करा का वर्णन ऊपर श्लोक ५० के वक्तव्य में कर दिया है, क्योंकि उक्त श्लोक का विषय था ‘सर्वशर्करा’ वर्णन।
उष्णमुष्णार्तमुष्णं च युक्तं चोष्णैर्निहन्ति तत्॥५३॥
उष्णमधुत्वेन का निषेध—उष्ण मधु का सेवन उष्ण ( घूष, घाम या अग्नि ) से सन्तप्त मानव को उष्णकाल ( गर्मी के दिनों ) में उष्ण जल आदि के साथ खाने-पीने या चाटने के लिए नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हानि होती है॥५३॥
प्रच्छदने निरुहे च मधूष्णं न निवार्यते। अलब्धपाकमाश्वेव तयोर्यस्मान्निवर्तते॥५४॥
इति मधुवर्गः।
संशोधन में मधु-प्रयोग—वमन के लिए तथा निरुहणबस्ति में प्रयुक्त उष्ण मधु अथवा द्रव पदार्थ के साथ मिला हुआ मधु हानिकारक नहीं होता, क्योंकि वमन, निरुहण में प्रयुक्त उष्ण मधु शरीर में बिना पचे ही शीघ्र बाहर लौट ( निकल ) जाता है॥५४॥
ब्रह्मविविज्ञानाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
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अथ तैलवर्गः
तैलं स्वयोनितवत्स मुख्यं तीक्ष्णं व्यवयति च । त्वदोषकुदचक्षुष्यं सूक्ष्मोष्णं कफकुत्र च ॥ ५५ ॥ कुशानां बृहणायालं स्थूलानां कर्शनाय च । बद्धविट्कं कुमिर्णं च संस्कारात्सर्वरोगजित् ॥ ५६ ॥ सामान्य तैल का वर्णन—सभी तेल अपने-अपने उत्पत्तिकारणों के समान गुण-धर्म वाले होते हैं। मन्त्र तेलों में 'तिलतैल' मुख्य होता है, क्योंकि तैल शब्द की निष्पत्ति ही तिल शब्द से होती है। यथा 'तिलोदश्च तैलम्' । तिलतैल—तीक्ष्ण ( मन्त्र से विपरीत ), व्यवयी ( शीघ्र फैलने वाला ), त्वदोषनाशक ( दोषं कुन्तीति दोषकृत ), नेत्रों के लिए हानिकारक, सूक्ष्म तथा उष्ण होता है। यह स्निग्ध होने पर भी कफकारक नहीं होता, कुश पुरुषों को पुष्ट करने में समर्थ है, अतएव वह बृहण-कार्य भी करता है। स्थूलों को कुश करता है, पुरीष को बांधता है, कुमिनाशक है और संस्कार करने से वात आदि दोषों को नष्ट करता है ॥ ५५-५६ ॥
वक्तव्य—'कुशानां बृहणायाऽलम्'—यह तिलतैल जो दुबले हैं, उन्हें पुष्ट करने में समर्थ है और 'स्थूलानां कर्शनाय च'—स्थूल पुरुषों को कुश भी करता है। ये गुण इसके परस्पर विरुद्ध हैं ? इसका समाधान—यह तैल कुश पुरुष के संकुचित हुए श्रोतों में जाकर व्यवयि गुण के कारण उनमें प्रवेश कर उन श्रोतों को रस आदि धातुओं को वहन करने की शक्ति देकर उनका बृहण करता है और यह वातदोष तथा कफदोष का क्षय करके स्थूल पुरुषों को कुश करता है। यथा—'तैलं वातश्लेष्मप्रशमनानाम्' । ( च.सू. २५।४० )
सतिक्तोषणमैरण्डं तैलं स्वादुं सरं गृह । वर्धमगुल्मानिलकफातुरं विषमज्वरम् ॥ ५७ ॥ एकशोफौ च कटीगृह्यकोष्ठपुष्ठाश्रयो जयेत् । तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं विस्त्रं, रक्तैरण्डोद्भवं त्वति ॥ एरण्डतैल के गुण—यह कुछ तिक्त एवं कुछ कटु तथा मधुर रस वाला, विरेचक और पचने में भारी होता है। यह अण्डवृद्धि, गुल्मरोग, वातरोग, कफरोग, उदररोग एवं विषमज्वर का विनाश करता है। कमर, गृह्यप्रदेश, समस्त कोष्ठ के अवयवों, पीठ की पीड़ा तथा सूजन को जीत लेता है।
लाल एरण्ड का तैल—यह तीक्ष्ण, उष्ण, पिच्छिल एवं अप्रिय गन्ध वाला होता है ॥ ५७-५८ ॥ वक्तव्य—कटिशूल में इसकी शीघ्र गुणकारिता को देखकर कहा गया है—'आमवातगजेन्द्रस्य कटीविपिनचारिणः । एक एव निहन्ताऽसौ एरण्डतैलकेशरी' ॥ अर्थात् आमवातरोग रूपी कमररूपी वन में घूमने वाले हाथी को मारने वाला यह एरण्डतैल रूपी सिंह अकेला काफी है और इसका प्रयोग विरेचन के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग करने के लिए ऋतु एवं देश-काल का विचार कर लेना चाहिए। पूर्ण अवस्था वालों को २ या ४ तोले की मात्रा में इसे दूध में मिलाकर देना चाहिए। बच्चों की नाभि के चारों ओर इसे गुनगुना कर मालिश कर देने से भी वही लाभ होता है।
कटूष्णं सार्षपं तीक्ष्णं कफशुक्रानिलापहम् । लघुं पिप्ताम्रकृतं कोठकुष्ठाशोत्रिणजन्तुजित् ॥ ५९ ॥ सरसों का तैल—सरसों का तैल कटु, उष्ण, तीक्ष्ण होता है। यह कफ, शुक्र तथा वात दोषनाशक है, लघु है, पिप्त एवं रक्तवर्धक है, कोठ ( जुलपिती या पिप्त उभड़ना ), कुष्ठरोग, अशोरोग, ब्रण तथा क्रिमियों को नष्ट करता है ॥ ५९ ॥
वक्तव्य—सरसों वर्ण से दो प्रकार की होती है—१. लाल तथा २. पीली। इनमें लाल सामान्य है। इसका तैल निकाला जाता है। पीली सरसों पूजा-पाठ आदि शुभकृत्यों में सर्वत्र प्रयोग में लायी जाती है। पीली सरसों का प्रयोग कृत्या ( मारण, मोहन, वशीकरण, उन्चाटन ) आदि में भी होता है। पुनः यह दो प्रकार की होती है—१. मीठी तथा २. कड़वी। मीठी सरसों का शाक पर्वतीय क्षेत्रों तथा पञ्जाब आदि में बड़े चाव से खाया जाता है। कड़वी सरसों को राई या लाई भी कहा जाता है। अलमोड़ा, नैनीताल आदि क्षेत्रों में इसे बादशाहलाई भी कहते हैं। इसके पत्ते दो-चार इंच चौड़े होते हैं, इनका शाक भी अत्यन्त रुचिकर होता है। इसका तैल झालदार होता है, नासिका तथा त्वचा पर लगाने से चुनचुनाता है। साहित्य-दर्पणकार ने 'तरुणं सर्पपशकं' को ग्रामीणों का भोजन कहा है। यह नागरिकों को मिलता भी कहाँ है ?
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अष्टाङ्गहृदये
आसं स्वादु हिमं केश्यं गुरु पित्तानिलापहम्।
बहेड़े की गिरी का तेल—बहेड़ा का तेल स्वादु (मधुर), शीतल, बालों के लिए हितकर, पचने में भारी, पित्त तथा वात विकारों का शमन करता है।
नात्युष्णं निम्बजं तित्तं कृमिकुष्ठकफप्रणुत् ॥ ६० ॥
नीम की गिरी का तेल—निंबोलियों से निकाला गया तेल अधिक उष्णवीर्य वाला नहीं होता, स्वाद में तित्त होता है। यह क्रिमियों, कुष्ठरोगों तथा कफज रोगों का नाश करता है ॥ ६० ॥
उमाकुसुम्भजं चोष्णं त्वदोषकफपित्तकृत।
अतसी एवं कुसुम्भ तेल—अतसी (अलसी या तीसी) तथा कुसुम्भ (बर्) के तेल उष्णवीर्य होते हैं; त्वका के विकारों, कफदोष तथा पित्तदोष को बढ़ाते हैं।
बक्तव्य—स्थावर तेलों की संख्या अनन्त हो सकती है। फिर भी कुछ तेल ऐसे हैं जो मिलते हैं, जिनकी आवश्यकता पड़ती रहती है; उनका परिगणन मात्र हम यहाँ कर रहे हैं—१. मूलक (मूली के बीजों का) तेल, २. दन्ती (जमालगोटा) का तेल, ३. इंगुदी (हिंगत) के बीजों का तेल, ४. सरसों का तेल, ५. राई का तेल, ६. करञ्ज (डिठेरी) का तेल, ७. नीम का तेल, ८. सहजन के बीजों का तेल, ९. सुवर्चला (हुलहुल) के बीजों का तेल, १०. पीलू के बीजों का तेल, ११. नीप (कदम्ब) के बीजों का तेल, १२. शक्तिनी वृक्ष के बीजों का तेल (च.क. १११२० में देखें), १३. तुवरक (चालमोगरा) का तेल (देखें—सु.चि. १३१२०-२६), १४. बारुक्कर (भिलावा) का तेल, १५. बिभीतक (बहेड़ा की गिरी) का तेल, १६. अतिमुक्तक (माधवीलता के बीजों) का तेल, १७. अशोट (अखरोट की गिरी) का तेल, १८. नारिकेल की गिरी का तेल, १९. मधुकबीजों का तेल, २०. त्रपुष (खीरा) के बीजों का तेल, २१. कूष्माण्ड-बीजतेल, २२. श्लेष्मातक (लिमोड़ा) के बीजों का तेल, २३. राजादन (चिरौजी) का तेल, २४. अगुलसारतेल, २५. सरल (चीड़) सार का तेल (गन्धविरोजा), २६. देवदास्सार (तारपीन) का तेल, २७. शिशिपा (सार) का तेल, २८. श्रीपर्णी (गम्भारी) के बीजों का तेल, २९. किशुक (पलाश) के बीजों का तेल, ३०. खर्बूजा के बीजों का तेल, ३१. बादाम का तेल तथा अन्य अनेक तेल।
वसा मज्जा च वातन्ती बलपित्तकफप्रदी ॥ ६१ ॥
मांसानुगस्वरूपी च, विद्यान्मोदोऽपि ताविव।
इति तैलवर्गः।
प्राणिज स्नेह—स्थावर-स्नेहों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से जंगम-स्नेहों का वर्णन किया जा रहा है। वसा तथा मज्जा नामक स्नेहों की प्राप्ति प्राणियों से की जाती है। ये दोनों स्नेह वातनाशक, बल, पित्त, कफ को बढ़ाते हैं। ये मांस के समान गुण वाले हैं। भेदोद्घातु के गुण भी वसा-मज्जा के समान होते हैं ॥ ६१ ॥
बक्तव्य—द्विन्चर्या-प्रकरण में उद्घर्तन का महत्त्व निर्दिष्ट है, उसी से सम्बन्धित विषय यहाँ भी दिया गया है—‘तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जितश्चमाः। आसन्नतिबला युद्धे दैत्याधिपतयः पुरा’ ॥ (अ.सं.सू. ६।१०१) स्थावर-जंगम स्नेहों के सम्बन्ध में विशेष देखें—च.सू. १३; सु.सू. ४५ तथा सु.चि. ३१।
अथ मन्त्रावर्गः
दीपनं रोचनं मद्यं तीक्ष्णोष्णं तुष्टिपुष्टिदम् ॥ ६२ ॥
सस्वादुतिकटुककमलपाकरसं सरम्। सकपायं स्वरारोग्यप्रतिभावर्णकूललघु ॥ ६३ ॥
नष्टनिद्राऽतिनिद्रेभ्यो हितं पितामहदूषणम्। कृशस्थूलह्रितं हृषं सूक्ष्मं द्रोतोविशोधनम् ॥ ६४ ॥
वातन्म्लेष्महरं युक्त्या पीतं विषवदयथा।
द्वयव्यवज्ञानायाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
७९
मद्य का वर्णन —विधिपूर्वक सेवन करने पर प्रायः सभी प्रकार के मद्य जठराग्नि को प्रदीप्त करते (बढ़ाते) हैं, रोचन (भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाने वाले) हैं, ये तीक्ष्ण एवं उष्ण होते हैं। मात्रानुकूल सेवन करने से तृष्टि (सन्तोष) तथा शारीरिक पुष्टि को देते हैं। सामान्य मद्य कुछ मधुर, तिक्त, कटु रस वाला होता है। इसका अम्लपाक होता है, सर (मल को निकालने वाला) है, कुछ कषाय रसयुक्त भी होता है। यह स्वर, आरोग्य, प्रतिभा तथा मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाता है, लघु है। जिन्हें निद्रा न आती हो और जो अतिनिद्रा से पीड़ित हों उनके लिए हितकर होता है। यह पित्त तथा रक्त को दूषित कर देता है, कृश को पुष्ट करता है और स्थूल को कृश कर देता है, रूक्ष तथा सूक्ष्म है, स्रोतों को शुद्ध करता है, वातदोष एवं कफदोष को दूर करता है। विधि-विपरीत सेवन किया मद्य विष के समान हानिकारक होता है॥ ६२-६४॥
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. २५।४०; च.चि. २४; सु.सू. ४५; सु.उ. ४७ तथा अ.सं.सू. ६ मद्यवर्ग।
वक्तव्य —‘मद्यं सौमनस्प्यजननानां, मद्याक्षेपो धीघृतिस्मृतिहरणाम्’। (च.सू. २५।४०) मद्य में जो दस गुण होते हैं वे क्रमशः ओजस् को जो शुक्र का उपधातु है, उसका विनाश कर देते हैं; यदि मद्य का अविधि सेवन किया गया तो। देखें—च.चि. २४।२९-३१। तैलवर्ग के बाद यहाँ मद्यवर्ग का इसलिए वर्णन किया गया है कि यह भी द्रव-द्रव्य है, दूसरा कारण यह भी है कि तेल और मद्य में ‘कृश-स्थूल हित’ धर्म समान हैं।
मद्य किस प्रकार कृश तथा स्थूल पुरुषों के लिए हितकारक होता है, उसका विवेचन यहाँ दिया जा रहा है—मद्य अपने तीक्ष्ण, सूक्ष्म आदि गुणों से तथा स्रोतों को शुद्ध करने आदि कर्मों के कारण ही कृशता अथवा स्थूलता को नष्ट करता है। कृशता-नाश—स्रोतों का भलीभाँति शोधन हो जाने से शरीर में रसधातु का संचार सुचारू रूप से होने लगता है, जिसके फलस्वरूप रस आदि सभी धातुएँ पुष्ट होने लग जाती हैं, जिससे मानव-शरीर पुष्ट हो जाता है। स्थूलहित—मद्य में रूक्ष, सर, तीक्ष्ण आदि कतिपय गुण ऐसे होते हैं, जिनके कारण तथा उक्त प्रकार से स्रोतों के संशोधन-कर्म से मेदोधातु का संचय होना भी रुक जाता है और पहले से संचित मेदोधातु उधर-उधर विलीन हो जाती है, मेदोवृद्धि ही तो स्थूलता में मूल कारण है।
नष्टनिद्राऽतिनिद्रेभ्यो हितम् —मद्य में तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष आदि गुण होते हैं, इनके कारण अतिनिद्रा का नाश हो जाता है। मद्य में मादकता यह एक प्रधान गुण होता है, जिसके कारण जिन्हें निद्रा नहीं आती है उन्हें मद्यपान कराने से निद्रा आ जाती है।
मद्य-परिचय —‘बुद्धिं लुभति यद्व्यव्यं मदकारि तदुच्यते। तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम्’॥ (शा.पू.खं. ४।२१) अर्थात् जो द्रव्य (मद्य) बुद्धि का विनाश कर देता है, उसे मदकारक कहते हैं, क्योंकि उसमें तमोगुण की प्रधानता रहती है। जैसे—मद्य, सुरा आदि।
मद्य रसायन है —यद्यपि मद्य एवं विष समान गुण वाले कहे गये हैं, तथापि मद्य तथा अन्न को समान रूप से प्रतिदिन सेवनीय कहा गया है। जब मद्य का अनुचित प्रकार से प्रयोग किया जाता है, तब यह रोगोत्पादक होता है, विधिपूर्वक सेवन करने से इसमें अमृत के समान गुण हैं। देखें—च.चि. २४।५९।
विधिप्रयुक्त मद्य के गुण —विधिपूर्वक, मात्रानुसार तथा समय पर चिकने पदार्थों के साथ यथाशक्ति, प्रसन्नचित्त होकर जो मद्यपान करता है, उसके लिए वह अमृत के समान गुणकारी होता है। देखें—च.चि. २४।२७।
सुरा का ऐतिहासिक वर्णन —बरक-चिकित्सास्थान २४।३ में सुरा की प्रशंसा करते हुए कहा है कि इसकी ‘सौत्रामणि’ नामक यज्ञ में आहुति भी दी जाती है। इस दृष्टि से यह सुरा यज्ञीय (पवित्र)
८०
अष्टाङ्गहृदये
द्रव्य है। उक्त यज्ञ का संक्षिप्त परिचय—सौत्रामणि यज्ञ का ऋषि प्रजापति, देवता सुरा तथा इसका छन्द अनुष्टुप् है। इस यज्ञ में जिस समय सुरा-सन्धान किया जाता है, उस समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है—‘ॐ स्वाद्वीन्त्वा स्वादुना तीव्रा तीब्रेणामृतामृतेन। मधुमतीं मधुमता सुजामि। स सोमेन सोमोऽस्यश्विभ्यो पञ्चस्य सरस्वत्यै पञ्चस्वेन्द्राय सुवाम्णे पञ्चस्य’। इसका विस्तृत विवरण यजुर्वेद-काण्वाशाखा अध्याय २१-२३ में देखें।
गुरु तद्दोषजननं नवं, जीर्णमतोऽन्त्यम् ॥६५॥
नया तथा पुराना मद्य—नया मद्य गुरु (देर में पचने वाला) तथा विदोषकारक होता है और इसके विपरीत पुराना मद्य लघु (शीघ्र पचने वाला) एवं विदोषशामक होता है ॥६५॥
वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि नये मद्यों का सेवन नहीं करना चाहिए, केवल पुराने मद्य, आसव, अरिष्ट आदि का सेवन करना चाहिए। अतएव कहा गया है—‘पुराणाः स्युर्गुणैर्मुक्ता आसवा धातवो रसाः’। अर्थ स्पष्ट है।
पेयं नोष्णोपचारेण न विरिक्तभुधातुरैः। नात्यर्थतीक्ष्णमृद्वत्पसम्भारं कलुषं न च ॥६६॥
मद्य का निषेध—उष्ण गुणयुक्त आहार-विहार के साथ, विरिचन करने के बाद एवं भूखे पेट में मद्य का सेवन न करे। अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु (जिसमें मादकता बहुत कम हो), जो समुचित सामग्री से न बनाया गया हो और जो मलिन अर्थात् स्वच्छ न किया गया हो, ऐसे मद्य को नहीं पीना चाहिए ॥६६॥
गुल्मोदराशौग्रहणीशोषहृत्य स्नेहनी गुरुः। सुराऽनिलम्नी मेदोऽमुक्तत्प्यमृत्रकफावहा ॥६७॥
विभिन्न सुराओं का वर्णन—‘सुरा’—यह गुल्मरोग, उदररोग, अशरिग, ग्रहणीरोग तथा शोष (राजयक्ष्मा) रोग का विनाश करती है। यह स्नेहनकारक, गुरु (देर में पचने वाली) तथा वातनाशक होती है। यह मेदोधातु, रक्तधातु, दूध, मूत्र एवं कफदीष को बढ़ाती है ॥६७॥
वक्तव्य—सुरा-परिचय—‘शालिपिष्टकृतं मद्यं सुरा’। (श्रीहेमाद्रि) मद्य के अनेक भेदों में सुरा का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। सुरा-निर्माण के लिए शास्त्रोचित सामग्री का सन्धान हो जाने पर जब यन्त्र द्वारा मद्य निकाला जाता है, तो उसमें से पहले जो अर्क निकलता है, वह बहुत साफ होता है, अतएव उसे ‘प्रसन्ना’ कहते हैं। इसे पीते समय इसमें जल मिलाकर पिया जाता है, अतः इसे उत्तम श्रेणी की ‘सुरा’ कहते हैं। इसके बाद कादम्बरी, जगल और मेदक क्रमशः निम्न स्तर की होती हैं। प्राचीन काल में सुर, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं मनुष्य भले ही इस उपद्रवकारिणी सुरा का आदर के साथ सेवन करते रहे हों; जैसा वर्णन च.चि. २४ में मिलता है और आज भी मद्य पीने वालों की कमी नहीं है। सरकार को भी इससे पर्याप्त लाभ है, भले ही सरकार मद्यविक्रय के साथ मद्यपान-निषेध की भी घोषणा करती रहती है, अस्तु। महर्षि वाग्भट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है—‘मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत्’। (अ.हृ.सू. २।४०) अर्थात् मद्य का बनाना, बेचना, देना तथा लेना नहीं करना चाहिए। शास्त्र के इन उपदेशों को जब भले लोग नहीं सुनते हैं, तो भला ये शराबी कब सुनेंगे? और क्यों सुनेंगे?
सभी प्रकार के मादक पेय पदार्थों का नाम ‘मद्य’ है। प्राचीन उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों में ‘अर्क’ निकालने की विधि का उल्लेख नहीं मिलता। परवर्ती ‘वैष्णव्यरत्नावली’ नामक संग्रह-ग्रन्थ में ‘मृतसंजीवनी सुरा’ के निर्माण की विधि ‘मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराल्येऽपि यन्त्रके’ (ज्वराधिकार-प्रकरण) में अर्क निकालने का विधान किया गया है। अर्क जिनसे निकाला जाता है, उनके मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र ये प्राचीन नाम हैं। मद्य के लिए सन्धान किये गये द्रव्यों का जो अर्क रूप द्रव होता है, उसी को मद्य (शराब) कहते हैं। सन्धानकाल की निश्चित अवधि नहीं है, फिर भी जिन द्रव्यों का सन्धान शीत-प्रधान स्थानों में एक मास में हो जाता है, वही कार्य उष्ण-प्रधान स्थानों में १५ दिनों में होते देखा जाता है।
द्वन्द्वविज्ञानीयाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
८१
एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार मद्यसार ( सिद्र ) में औषधियाँ डालकर कुछ समय तक उसी में पड़ी रहने पर उस-उस औषध को टिंवर के रूप में तैयार कर लिया जाता है। आयुर्वेदीय पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान करके आसव, अरिष्ट आदि तैयार कर लिये जाते हैं। औषध-द्रव्यों के ब्वाथ आदि से आसव-अरिष्ट अपना प्रभाव इसलिए शीघ्र दिखलाते हैं, क्योंकि मद्य का एक गुण 'आशुकारी' भी है। अतएव सुश्रुत ने कहा है—'आशुत्वाच्चाशुक्रमकृत' । ( मु.उ. ४७५ )
तदुगुण वाशुणी हृद्या लघुस्तीक्ष्णा निहन्ति च । शूलकासवमिश्वासविबन्धाभ्मानपीनसान् ॥ ६८ ॥
वाशुणी-परिचय—वाशुणी नामक मद्य के गुण भी उक्त सुरा के समान होते हैं। शेष गुण इस प्रकार हैं—यह हृदय को बल देती हैं, लघु ( शीघ्र पचने वाली ) तथा तीक्ष्ण है। यह शूल, कास, वमन, श्वास, विबन्ध ( प्रोटों की रक्तावट, मल-मूत्र की रक्तावट ), अफरा तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ ६८ ॥
वक्तव्य—वरुणदेव ( जल तथा पश्चिम दिशा के स्वामी ) को यह मद्य प्रिय थी, अतः इसे 'वाशुणी' कहते हैं। शाङ्कधराचार्य का कथन है कि इसका निर्माण ताल या ताड़ तथा खजूर के रस का सन्धान करके किया जाता है। वैसे भी ताड़ एवं खजूर की ताड़ी प्रसिद्ध है। यह सूर्योदय से पहले पीने पर मधुर स्वाद वाली होती है, सूर्य निकलने के बाद क्रमशः खट्टी होती जाती है।
नातितीव्रमदा लघ्वी पथ्या बेभीतकी सुरा । ब्रणे पाण्डुवामये कुष्ठे न चाल्यर्थ विरध्यते ॥ ६९ ॥ विष्टम्भिनी यवसुरा गुर्वी रूक्षा त्रिदोषला ।
बहेड़ा की सुरा—बिभीतक ( बहेड़ा ) की सुरा अधिक नशीली नहीं होती, हलकी होती है, हितकर होती है। और सुराओं की भाँति यह ब्रण, पाण्डुरोग तथा कुष्ठरोग में अधिक हानिकारक नहीं होती ॥ ६९ ॥
यव ( जो से निर्मित ) सुरा—यह विष्टम्भकारक ( कन्वियत करने वाली ), गुरु, रूक्षा तथा त्रिदोषकारक होती है। कोहली सुरा—यह शरीर को स्थूल करने वाली तथा गुरु ( देर में पचने वाली ) होती है। मधूलक सुरा—यह कफकारक होती है।
वक्तव्य—वास्तव में 'विष्टम्भिनी'... 'मधूलकः' ॥ यह पद्य अ.सं.सू. ६१२४ क्रमसंख्या में सुलभ है। इसे कुछ विद्वान् यहाँ भी जोड़ना चाहते हैं और कुछ इसकी प्रथम पंक्ति को यहाँ उद्धृत करना चाहते हैं, किन्तु श्रीहेमाद्रि कोहली सुरा का वर्णन करने वाली पहली पंक्ति को भी 'हृदयकार' की सम्पत्ति नहीं मानते, अस्तु।
कोहली सुरा—प्रथम मत—वैद्यकशब्दसिन्धु में इसे 'कृष्णाण्डसुरा' कहा है अर्थात् कृष्णाण्ड = पेटा, जिसकी मिठाई ( कोहड़ापाक ) बनती है, उससे बनायी गयी सुरा। द्वितीय मत—'कोहलो यवमक्तुकुत-मद्याविशेषः' अर्थात् जो के सत्तुओं के द्वारा बनायी गयी सुरा। तीसरा मत—'कोहलः शक्तुभिर्देहै बाह्नीके क्रियते यवैः' । ( वाचस्पतिः ) बाह्नीक ( बल्लव—अरब ) देश में जो के सत्तुओं द्वारा निर्मित सुरा। इस प्रकार दूसरा-तीसरा मत प्रायः समान है, केवल तीसरे मत में देश-विशेष की चर्चा है।
'मधूलक' का परिचय देते हुए श्रीहन्तु कहते हैं—'सर्वं मद्यमसञ्जातं मधूलकमिति स्मृतम्'। इति हन्तुः। उन सभी मद्यों को 'मधूलक' कह सकते हैं, जिनका सन्धान भलीभाँति न किया गया हो।
यथाद्रव्यगुणोडरिष्टः सर्वमद्यगुणाधिकः ॥ ७० ॥
ग्रहणीपाण्डुकुष्ठाशैः शोफशोपोदरज्वरान् । हन्ति गुल्मकृमिष्पीहः कषायकटुवातलः ॥ ७१ ॥
अरिष्ट-परिचय—जिन द्रव्यों के संयोग द्वारा जिम अरिष्ट का निर्माण किया जाता है, वह अरिष्ट उन द्रव्यों के गुण-धर्म के समान होता है, किन्तु यह आसव सभी मद्यों से अधिक गुणवान् होता है। यह ग्रहणी, पाण्डु, कुष्ठ, अर्श, शोफ ( सूजन ), शोष ( क्षय ), उदररोग, ज्वर, गुल्म, क्रिमिरोग तथा प्लीहाविकारों को नष्ट करता है। यह स्वाद में कसैला तथा कटु होता है और वातवर्धक होता है ॥ ७०-७१ ॥
६ अ० ह०
८९
अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य —आचार्य शाङ्कधर ने आसव-अरिष्ट के विवेदक लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया है—‘यद-पक्षीषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः । अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मनि पलोन्मिप्तम्’ ॥ (शा.सं.म. १०।२) अर्थात् कच्ची औषधियाँ तथा जल के योग से सन्धान द्वारा जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ‘आसव’ कहते हैं। औषध-द्रव्यों को जल में डालकर क्वाथ करने के बाद जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ‘अरिष्ट’ कहते हैं। इन दोनों की साधारण मात्रा १ पल (४ तोला) है।
आसव-अरिष्ट का यह विवेदक लक्षण प्राचीन संहिताओं में नहीं मिलता है। हाँ, सुश्रुत ने आसवों से अरिष्टों को अधिक गुणवाला स्वीकार किया है—‘अरिष्टो द्रव्यमयोगसंस्कारादधिको गुणैः’ । (सु.सू. ४।१९४) अर्थात् अरिष्ट में आसव से अधिक औषधद्रव्यों का संयोग होने से तथा संस्कार-विशेष होने से यह (अरिष्ट) अधिक गुणवान् होता है।
माद्रीकं लेखनं हृद्यं नात्युष्णं मधुरं सरम् । अल्पपित्तानिलं पाण्डुमेहार्शःकृमिनाशनम् ॥ ७२ ॥
मूनक्का का मद्य —मुद्रीका को हिन्दी में मूनक्का या दाख कहते हैं। इसके द्वारा बनाया हुआ मद्य लेखन होता है, हृदय के लिए हितकर होता है। यह अधिक उष्ण नहीं होता, स्वाद में मधुर एवं इसका गुण सर है। यह थोड़ा पित्तदोष तथा वातदोष को बढ़ाता है। पाण्डुरोग, प्रमेह, अर्श (बवासीर) तथा क्रिमिरोग नाशक होता है ॥ ७२ ॥
वक्तव्य —ऊपर मूनक्का के मद्य (द्राक्षासव) को ‘लेखन’ कहा गया है। यह आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाला एक पारिभाषिक शब्द है। लिखने की क्रिया को जो ‘लेखन’ कहा जाता है, वह वास्तविक रूप में लेपन है, क्योंकि हम स्याही द्वारा लेपन कार्य करते हैं। हाँ, उत्कीर्ण-लेखन कार्य में इस शब्द का समुचित प्रयोग हुआ है, क्योंकि ‘लिख’ धातु का अर्थ है—अक्षरविन्यास। इसी अर्थ में आयुर्वेद का लेखन शब्द भी है, जरा इसकी परिभाषा देखें—‘धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षीरं नीरमुष्णं वचा यवाः’ ॥ (शा.पू. ४।१०) अर्थात् जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर तथा छीलकर निकाल देता है, वह ‘लेखन’ कहा जाता है। यथा—शहद, गरम जल, बालवच तथा जी। वास्तव में छेदन एवं लेखन दोनों द्रव्य भीतर के जमे हुए दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं।
अस्मादल्पान्तरगुणं खार्जूरं वातलं गुरु । शार्करः सुरभिः स्वादुहृद्यो नातिमदो लघुः ॥ ७३ ॥
खार्जूर-शार्कर आसव —खजूर का मद्य—ऊपर मूनक्का के मद्य के जो गुण कहे गये हैं, उनसे खजूर के मद्य में कुछ कम गुण होते हैं। यह वातकारक तथा गुरु (देर में पचने वाला) होता है।
शार्कर (चीनी से निर्मित) मद्य —यह सुगन्धित, स्वाद में मधुर, हृदय के लिए हितकारक, अधिक नशा न करने लायक तथा लघु (शीघ्र पचने वाला) होता है ॥ ७३ ॥
सूष्ठमूत्रशकुह्रातो
गौडस्तर्पणदीपनः ।
गुड निर्मित आसव —यह मल, मूत्र तथा अपानवायु को बाहर निकलने के लिए प्रेरित करता है। यह मद्य तुष्टिकारक तथा अग्निदीपक होता है।
वक्तव्य —मद्य, आसव, मुरा, शराब, दारू आदि जिस-जिस द्रव्य से बनाये जाते हैं, उस-उस नाम से ये पुकारे जाते हैं। इस विषय में चरक ने कहा है—‘योनिसंस्कारनामाद्यैविशेषैर्बहुधा च या । भूत्वा भवत्येकविधा सामान्यान्मदलक्षणान्’ ॥ (च.चि. २।४६) अर्थात् जो योनि (उत्पत्तिस्थान—धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, शर्करा), संस्कार (पिप्ली आदि द्रव्यों से) तथा नाम आदि विशेषताओं से बहुत प्रकार की होती हुई भी मदलक्षण के सब में समान होने के कारण शराब एक ही प्रकार की होती है। देखें—च.सू. २।४४९। चरक के उक्त सन्दर्भ में इसके यथासम्भव भेदों का वर्णन कर दिया गया है।
द्वद्वयविज्ञानीयाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
८३
वातपित्तकरः सीधुः स्नेहस्नेहोन्मविकारहा ॥ ७४ ॥
मेदः शोफोदराशीर्णस्तत्र पक्वरसो वरः ।
सीधु का वर्णन—यह वात-पित्तकारक होता है, स्नेह के कारण उत्पन्न हुए विकारों तथा कफ-विकारों को नष्ट करता है। यह मेदोरोग, ब्रणशोथ, उदरविकार तथा अशौरोग को नष्ट करता है। दो प्रकार के सीधुओं में शीत रस की तुलना में पक्वरस से बना हुआ सीधु गुणों में उत्तम होता है ॥ ७४ ॥
वक्तव्य—सीधु दो प्रकार का होता है—१. शीतरस तथा २. पक्वरस। इसका निर्माण-प्रकार इस प्रकार है—ईख तथा अंगूर आदि के मधुर रस को पात्र में डालकर धूप में रख दें। इसे दो-तीन सप्ताह के बाद छानकर दूसरे पात्र में रख दिया जाता है। जब-जब इसमें जाला पड़े तब-तब इसे छानकर दूसरे पात्र में रख दें। जब जाला पड़ना बन्द हो जाय और वह रस अत्यन्त निर्मल हो जाय तो समझना चाहिए कि सीधु (सिरका) तैयार है। इसे बनाने के पारिवारिक अन्य अनेक प्रकार भी देखे जाते हैं। प्रायः इसके निर्माण में ४-५ मास का समय लग जाता है। इसका स्वाद अम्ल (खट्टा) होता है। यह पाचन होता है। इसका प्रयोग चटनी आदि के लिए किया जाता है।
छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मेहपीनसकासजित् ॥ ७५ ॥
मध्वासव का वर्णन—मधु के संयोग से बनाये गये आसव को मध्वासव कहते हैं। यह मल आदि का छेदन करता है और गुणों में तीक्ष्ण होता है। प्रमेह, पीनस एवं कास रोग को नष्ट करता है ॥ ७५ ॥
रक्तपित्तकफोत्कलेदि शुक्तं वातानुलोमनम्। श्रुशोष्णतीक्ष्णरूक्षास्मत् हृदयं रुचिकरं सरम् ॥ ७६ ॥
दीपनं शिशिरस्यर्षं पाण्डुवृक्कुमिनाशनम्।
शुक्त का वर्णन—यह रक्त, पित्त तथा कफ दोष को उभारता है, वातदोष का अनुलोमन करता है। यह गुण में अत्यन्त उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष तथा अम्लरस-प्रधान होता है। हृदय के लिए हितकर, रुचिकर, सर (मल को निकालने वाला), अग्निदीपन तथा स्पर्श में शीतल होता है। यह पाण्डुरोग, नेत्ररोग तथा क्रिमिरोग का नाश करता है ॥ ७६ ॥
गुडेक्षुमद्यमार्द्रिकशुक्तं लघु यथोत्तरम् ॥ ७७ ॥
गुड आदि शुक्त—गुड का शुक्त, ईख का शुक्त, मद्यनिर्माण-विधि से बनाया गया शुक्त तथा मुनक्का से बनाया गया शुक्त उत्तरोत्तर गुणों में हल्के होते हैं ॥ ७७ ॥
कन्दमूलफलार्धं च तद्वद्विद्यात्तदासुतम्।
कन्द आदि शुक्त—सूरण, जिमीकन्द आदि कन्दों, गाजर-मूली आदि मूलों तथा लौकी, सेम, केवौच आदि फलों से बनाया गया आसुत (आसव की भाँति चुवाया गया) द्रव भी उसी प्रकार लघु होता है।
वक्तव्य—यह शुक्त दो-तीन दिन में तैयार हो जाता है। मारवाड़, पंजाब आदि प्रदेशों में इसे 'काँजी' कहते हैं। इसमें राई पीसकर डाली जाती है; हींग, जीरा, कालानमक, हल्दी, तेल में पकाये पकोड़े भी डाले जाते हैं। खट्टापन आते ही इसमें डाले गये पदार्थों के साथ वह पानी भी पिया जाता है, जो पाचक तथा भूख को बढ़ाता है।
शुक्त-चुक्रनिर्माण-विधि—'मुण्मयादिशुचो भाण्डे सगुडे क्षौद्रकाञ्जिकम्। धान्यराशो विरात्रिरस्य शुक्रं चुक्रं तदुच्यते' ॥ अर्थात् मिट्टी आदि (तीवा-पीतल का नहीं) के साफ पात्र में गुड तथा शहद को जल में घोलकर डाल दें। इस पात्र को तीन दिन तक धान्यराशि में दबाकर रख दें। इसी को शुक्त या चुक्र कहते हैं।
शाण्डाकी चासुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु ॥ ७८ ॥
८४
अष्टाङ्गहृदय
शाण्डाकी-वर्णन—शाण्डाकी, आसुत तथा दूसरे वे द्रव जो कुछ (३ या ४) दिन तक रख देने से खट्टे हो जाते हैं, वे रुचिकारक तथा लघु (सुपान्य) होते हैं ॥७८॥
बक्तब्य—शाण्डाकी, आसुत, सौवीर, तुषोदक आदि नाम अलग-अलग पदार्थों से बनायी गयी कॉजियों के हैं। यह गर्मी के दिनों में २-३ दिनों में सेवन करने योग्य हो जाती है और शीतकाल में ५-६ दिनों में तैयार हो पाती है। फिर जितने दिन इसे रखेंगे खट्टी होती जाती है। यह खट्टी तथा मीठी भेद से दो प्रकार की होती है।
खट्टी कॉजी के घटक द्रव्य—१. जल, २. तमक, ३. राई, ४. हल्दी तथा ५. कालीमिर्च।
मीठी कॉजी के घटक द्रव्य—ईख का रस आदि मीठे द्रव-द्रव्यों द्वारा जल के योग से बनाई जाती है। कॉजी का एक नाम 'अवन्तीसोम' भी है। वास्तव में यह मालव देश (मारवाड़) या जांगल देश का अमृत है, वही इसे विविध प्रकार से बनाया जाता है, अन्यत्र यह अच्छी बनती भी नहीं।
धान्याम्ल भेदि तीक्ष्णोष्णं पित्तकृत्स्पर्शशीतलम्। श्रमकलमहरं रुच्यं दीपनं बस्तिशूलनुत् ॥७९॥
शस्तमात्स्यापने हृद्यं लघु वातकफापहम्। एभिरेव गुणैर्युक्ते सौवीरकतुषोदके ॥८०॥
कृमिहृद्वोगुल्माश्वः पाण्डुरोगनिबर्हणे। ते क्रमाद्वितुषैर्विद्यात्सतुपैश्च यवैः कृते ॥८१॥
इति मद्यवर्गः।
धान्याम्ल आदि का वर्णन—धान्याम्ल नामक कॉजी मल (पुरीष) का भेदन कर उसे निकालती है। यह तीक्ष्ण, उष्ण, पित्तवर्धक तथा स्पर्श में शीतल होती है। यह श्रम (शारीरिक थकावट) एवं क्लम (मानसिक थकावट) को दूर करती है। रुचिवर्धक, दीपन (जठराग्नि को बढ़ाने वाली), बस्तिशूलनाशक, निरुह्णबस्ति में उपयोगी, हृदय के लिए हितकर, पाचन में लघु और वात तथा कफ दोष को नष्ट करती है।
सौवीरक तथा तुषोदक—उक्त धान्याम्ल के समान ही गुण इनके भी होते हैं। विशेष रूप से इनका प्रयोग इन रोगों के विनाश के लिए किया जाता है—क्रिमिरोग, हृदयरोग, गुल्मरोग, अशौरीग तथा पाण्डुरोग। दोनों में भेद—सौवीरक कॉजी तुषरहित यवसमूह से बनायी जाती है और तुषोदक कॉजी तुष सहित यवसमूह से बनायी जाती है ॥७९-८१॥
बक्तब्य—भात या भात के माँड में जो कॉजी बनायी जाती है, उसे 'धान्याम्ल' कहते हैं। 'सौवीरक' तथा 'तुषोदक' के भेदक लक्षण ऊपर कह दिये गये हैं।
ऊपर 'एभिरेव' से 'यवैः कृते' तक के श्लोकों की तीन पंक्तियाँ श्री अरुणदत्तसम्मत होने से इस संस्करण में अधिक हैं। ये पंक्तियाँ अ.सं.सू. ६।३९-१४० से ली गयी हैं।
कॉजी का स्पर्श शीतल होता है, अतः दाहशान्ति तथा ज्वरशान्ति के लिए इसमें साफ वस्त्र का रई के फाहा को भिगाकर दाहस्थान पर माथा या नाभि पर रखा जाता है। ध्यान रहे, इसकी वृंदें ओंछों में न पड़ने पायें।
अथ मूत्रवर्गः
मूत्रं गोडजाविमहिषीगजाश्वोष्ट्रवरोद्रवम्। पित्तलं रुक्षतीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं कटु ॥८२॥
कृमिशोफोदरानाहशूलपाण्डुकफानिलान्। गुल्मास्त्रचिपिष्वित्रकृच्छ्राशींस जयेरलघु ॥८३॥
इति मूत्रवर्गः।
आठ प्रकार के मूत्र—१. गाय, २. बकरी, ३. मेढी, ४. महिषी, ५. हाथी, ६. घोड़ा, ७. ऊँट तथा ८. गधा का मूत्र चिकित्सा में उपयोगी होता है। सामान्य दृष्टि से सभी मूत्र पित्तकारक, रुक्ष, तीक्ष्ण
द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ]
सूत्रस्थानम्
८५
उष्ण, लवणरसयुक्त तथा कटुरसयुक्त होते हैं। ये क्रिमि, शोथ, उदररोग, आनाह ( अफरा ), शूल, पाण्डुरोग, कफविकार, वातविकार, गुल्म, अरुचि, विषविकार ( विशेषकर सर्पविष ), श्वित्र ( सफेद दाग वाला कुष्ठ ), कुष्ठ तथा अर्श ( बवासीर ) रोगों को शीघ्र शान्त करते हैं ॥ ८२-८३ ॥
वक्तव्य —श्रीचक्रपाणि च.सू. १।९३ की व्याख्या करते हुए कहते हैं—‘अविमूत्रमित्यादौ स्त्रीमूत्रमेव प्रशस्तमिति लिङ्गपरिग्रहाद् दशयति; यतः स्त्रीणां लघ्वङ्कृत्वान्मूत्रमपि लघु; वचनं हि—‘लाघवं जातिसामान्ये स्त्रीणां पुंसां च गौरवम्’ ॥ ( च.सू. २।४३३८ ) वास्तव में उक्त पाठ इस प्रकार है—‘गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम्’। हारीत का कथन है कि चौपायों में स्त्री को लघु और पक्षियों में पुरुष को लघु माना है, अस्तु।
सुश्रुत का मत —इनके अनुसार गाय, भैंस, बकरी, भेड़ ( स्त्री जाति का ) और घोड़ा, हाथी, गधा, ऊँट ( पुरुष जाति ) का ग्रहण करना चाहिए। इन्होंने नरमूत्र का भी ग्रहण करते हुए कहा है—यह विषनाशक होता है। इस प्रकार मूत्रों की संख्या = ८ + १ = ९ हो जाती है।
मूत्रप्रयोग का क्षेत्र —विरचन के लिए इसका प्रयोग निरुहणबस्ति द्वारा किया जाता है। ये मूत्र विविध प्रकार के लेपों में तथा स्वेदन कार्य के लिए उपयोगी होते हैं। ये दीपन, पाचन तथा मलभेदक ( दस्तावर ) होते हैं। उक्त सभी मूत्रों में गोमूत्र उत्तम होता है। अ.सं.सू. ६।१४५-१४७ में वाग्भट ने इनके शक्तु ( मलों ) का भी वर्णन किया है।
आहार को पचाने के लिए पिताशय से आकर जितना पित्त द्रव खाये हुए आहार में मिलता है, इसका कुछ अंश मूत्र के साथ और कुछ मल के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, अतः मल एवं मूत्र में पित्तवर्धक गुण पाये जाते हैं, अतएव इनका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। मरे हुए प्राणियों के पिताशय से पित्तद्रव का संग्रह कर लिया जाता है, जिसका बाद में औषध रूप में प्रयोग किया जाता है। गाय के पित्त को ‘गोरोचन’ कहते हैं। इसका प्रयोग चिकित्सा तथा तान्त्रिक प्रयोगों में भी किया जाता है।
तोयक्षीरेभुतेलानां वर्गमैद्यस्य च क्रमात्। इति द्रवैकदेशेऽयं यथास्थूलमुदाहृतः ॥ ८४ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
उपसंहार —जल, धीर, दधु, तैल तथा मद्य वर्गों का इस अध्याय में क्रमशः वर्णन कर दिया गया है। इस प्रकार स्थूल रूप से द्रव-द्रव्यों के एक विशेष अंग को कह दिया है ॥ ८४ ॥
वक्तव्य —यद्यपि उक्त पद्य अष्टांगसंग्रह ( ६।१४९ ) से लिया गया है, तथापि इसमें ‘मूत्रवर्ग’ का उल्लेख नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने इक्षुवर्ग के अन्तर्गत ‘मधुवर्ग’ को दे दिया था, उसे हमने स्वतन्त्र वर्ग के रूप में दे दिया है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
द्रवद्रव्यविज्ञानीय नामक पाँचवीं अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
अथातोऽत्रस्वरूपविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम द्रवद्रव्यों का वर्णन करने के बाद यहाँ से अन्नद्रव्यों के स्वरूप के विज्ञान के लिए प्रस्तुत अध्याय की व्याख्या करेंगे। इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।
निरुक्ति—‘अन्नम्’—‘अद्यते’ इति ऋः । ‘अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात्’ । इति मेदिनी। अन्न का अर्थ है— भ्रात या खाया हुआ पदार्थ, इसका अर्थ यदि हम ‘भ्रात’ करते हैं तो विषय-निर्देश में संकीर्णता आ जाती है, क्योंकि ‘भुक्त’ शब्द का क्षेत्र विस्तृत है, वहाँ यहाँ अपेक्षित है, अस्तु । ‘अन्नस्वरूप’—आहार के उपयोग में आने वाले रोटी, चावल, दाल, सब्जी आदि। स्वरूप—उन-उन के नाम, रस, गुण, वीर्य, विपাক, प्रभाव, लक्षण आदि। यह अन्न (खाये जाने वाला पदार्थ) स्थावर तथा जांगम भेद से दो प्रकार का होता है। यथा—गेहूँ, चावल आदि स्थावर और मांस आदि जांगम (जंगम प्राणियों से प्राप्त होने वाला) ।
स्थावर धान्य भी रबी और खरीफ भेद से दो प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से पुनः दो प्रकार का होता है। यथा—१. शूकधान्य—शूक का अर्थ है नुकीले अग्रभाग वाले धान्य। जैसे—गेहूँ, जौ, धान आदि। २. शिम्बी या शमी धान्य—छीमी में उत्पन्न होने वाला दो दल युक्त अन्न। जैसे—चना, उड़द, कुलथी, सेम आदि।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २७, सु.सू. ४६ तथा अ.सं.सू.७ तथा १२ में देखें।
अथ शूकधान्यवर्गः
रक्तो महान् सकलमस्तूर्णकः शकुनाहृतः । सारामुखो दीर्घशूको रोद्रशूकः सुगन्धिकः ॥ १ ॥ पुण्ड्रः पाण्ड्रः पुण्डरीकः प्रमोदो गौरसारिबौ । काञ्चनो महिषः शूको दूषकः कुसुमाण्डकः ॥ लाङ्गला लोहवालाख्याः कर्दमाः शीतभीरुकाः । पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ स्वादुपाकरसाः स्निग्धाः वृष्या बद्धाल्यवर्चसः । कषायानुरसाः पथ्या लघवो मूलला हिमाः ॥
शूकधान्यों का वर्णन—रक्तशालि, महाशालि, कलमशालि, तूर्णकशालि, शकुनाहृतशालि, सारामुख, दीर्घशूक, रोद्रशूक (लोह के फूल के सदृश शूक वाला), सुगन्धिक (बासमती), पुण्ड्रशालि, पाण्डुशालि, पुण्डरीकशालि, प्रमोद, गौर, शारिब, काञ्चन, महिष, शूकशालि, दूषकशालि, कुसुमाण्डकशालि, लांगलशालि, लोहबाल नामक शालि, कर्दमशालि, शीतभीरुकशालि, पतंग तथा तपनीय शालि; इनके अतिरिक्त और भी जो अनेक शालियों की जातियाँ होती हैं, वे सब शालि उत्तम कोटि के होते हैं। वे सभी रस एवं विपक में मधुर, स्निग्ध, वीर्यवर्धक होते हैं। इनको खाने से वँधा हुआ थोड़ा-सा मल बनता है। वे सब कुछ कषाय रसवाले होते हैं। ये सभी के लिए पथ्य, लघु (हल्के), मूत्रकारक तथा हिम (शीतवीर्य) होते हैं ॥ १-४ ॥
बक्तव्य—शकुनाहृत नामक शालिधान्य के सम्बन्ध में कहा गया है कि इसे शकुनि (गरुड) पक्षी द्रौपान्तर से ले आया था, अतएव इसे शकुनाहृत या गरुडशालि भी कहते हैं। आजकल तो व्यापारीवर्ग भी बासमती को ‘गरुडब्राण्ड’ कहने लगे हैं। किसी संस्करण में ‘पुण्ड्र’...‘शीतभीरुका’ ये पंक्तियाँ नहीं मिलतीं। यह पाठ सम्पूर्ण अष्टांगसंग्रह ७ से लिया गया है।
ब्रह्मविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
८७
शूकजेषु वरस्तन रक्तसृष्णात्रिदोषहा ।
रक्तशालि का वर्णन—ऊपर कहे गये सब शूकधान्य हैं, इनमें रक्तशालि उत्तम होता है। यह प्यास को कम करता है और त्रिदोषनाशक (शामक) होता है।
महास्तमनु कलमस्त चाप्यनु ततः परे ॥५॥
क्रमशः गुणहीनता—रक्तशालि की तुलना में महाशालि, उससे कलमशालि, उससे भी तूर्णकशालि हीन गुणवाले होते हैं ॥५॥
वरक्य—वाग्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं—‘रक्तशालेः पश्चात् महान् शालिर्वः’। और ब्रह्मादि कहते हैं—‘तमनु रक्तशालेहीनो महान्’। उक्त दोनों टीकाकारों का स्पष्ट मतभेद है। इस मतभेद के समाधान के लिए हम महर्षि सृश्रुत की शरण में जाते हैं—‘तेषां लोहितकः श्रेष्ठः’...‘तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशः शालयोऽवराः’ ॥ (सू. सृ. ४६।६-७) अर्थ स्पष्ट है।
यवका हायनाः पांसुबाष्पनैषधकादयः। स्वादूष्णा गुरवः स्निग्धाः पाकेऽम्लाः श्लेष्मपित्तलाः ॥ सृष्टमृत्रपुरीषाश्च पूर्व पूर्व च निन्दिताः।
यवक आदि शालिधान्य—यवक (जई), हायनक, पांसु, बाष्प, नैषधक आदि अन्य अनेक प्रकार के शालिधान्य होते हैं। इनके गुण—ये स्वाद में मधुर, उष्ण, गुरु, स्निग्ध, पाक में अम्ल, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं। इनके सेवन से मल-मूत्र की प्रवृत्ति सरलता से हो जाती है। ये क्रमशः अपने पूर्व निन्दित होते हैं, इस क्रम से सबसे अधिक निन्दित यवक होता है ॥६॥
वरक्य—वरक ने सूत्रस्थान के २९वें अध्याय में ‘अहिततमानुपदेश्यामः—यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमलेन प्रकृष्टतमा भवन्ति’। (३९) कहा है और ‘लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे क्रममा भवन्ति’। (वर्ह ३८) वरक के इस वचन से इनकी गुणहीनता तथा गुणवत्ता का स्पष्ट संकेत मिल जाता है।
स्निग्धो ग्राही लघुः स्वादुस्त्रिदोषज्जः स्थिरो हिमः ॥७॥ षष्ठिको ब्रीहिषु श्रेष्ठो गौरश्चासितगौरतः।
ब्रीहिधान्य का वर्णन—ब्रीहिधान्यों में षष्ठिक (साठीधान्य) स्निग्ध, ग्राही (मल को बाँधने वाला), लघु (शीघ्र पचने वाला), स्वादु (मधुर), वात आदि तीनों दोषों का शामक, स्थिर (शरीर को स्थिर रखने वाला), हिम (शीतल) गुणवाला होता है। ब्रीहिधान्यों से साठीधान्य उत्तम होता है। यह दो प्रकार का होता है—१. गौर (सफेद रंग वाला) तथा २. हलका काला। इनमें गौर साठी उत्तम होता है ॥७॥
वरक्य—षष्ठिक धान्य ग्रीष्म ऋतु में पकता है। षष्ठिक (सफेद सांठी), कंगु, मुकुन्दक, पीतक, काकलक, असन, पुष्पक, महाषष्ठिक, चूर्णक, कुरबक, केदार आदि ये साठी धान्य की जातियाँ हैं। देखें—सू. सृ. ४६।८ से ११ तक।
ततः क्रमान्महाब्रीहिकृष्णब्रीहिजतुमुखलाः ॥८॥ कुक्कुट्टाण्डकलावास्थपारावतकशूकराः। वरकोहालकोज्ज्वालचीनशारददर्दुराः ॥९॥ गन्धनाः कुरुविन्दाश्च गुणरल्पान्तराः स्मृताः।
सामान्य गुणवाले षष्ठिक—उक्त षष्ठिक धान्यों से ये सामान्य (कुछ कम) गुण वाले होते हैं—महाब्रीहि, कृष्णब्रीहि, जतुमुख, कुक्कुट्टाण्ड, कपाल, पारावतक, शूकर, वरक, उद्दालक, उज्ज्वाल (ज्वार, मक्का, जुहरी), चीन (कौणी), शारद, दर्दुर, गन्धन तथा कुरुविन्द ॥८-९॥
८८
अष्टाङ्गहृदये
स्वादुरम्लविपाकोऽच्यो ब्रीहिः पित्तकरो गुरुः ॥ १० ॥
बहुमूत्रपुरीपोष्मा, त्रिदोषस्त्वेव पाटलः।
अन्य ब्रीहिधान्य-वर्णन—ये रस में मधुर, विपाक में अम्ल, पित्तकारक, पाचन में गुरु तथा उष्ण होते हैं। इनका अधिक भाग मल-मूत्र के रूप में परिणत हो जाता है अर्थात् ये पौष्टिक नहीं होते। इनमें 'पाटल' नामक ब्रीहि त्रिदोषकारक होता है ॥ १० ॥
बक्तव्य—शालि-षष्टिक ब्रीहिधान्यों का संक्षिप्त परिचय—१. शालिधान्य—इनकी फसल उगाने से पकने तक इन्हें जल से भरे खेतों की जहरत होती है, फिर भी ये शरद् ऋतु के बाद में पकते हैं। ये अधिक सफेद होते हैं। २. षष्टिक धान्य—ये प्रायः साठ दिन में पककर तैयार हो जाते हैं। ३. ब्रीहिधान्य—चरक के टीकाकार शौचक्रपाणि के अनुसार ये शरत् काल में पकने वाले आशुधान्य हैं।
कङ्गुकोद्रवनीवारश्यामाकादि हिमं लघु॥ ११ ॥
तुणधान्यं पवनकृल्लेखनं कफपित्तहृतं।
तुणधान्यों का वर्णन—कंगु (कंगुनी या कौणी), कोद्रव (जंगली कोदों), नीवार (तीनी—मुनि अन्न), श्यामाक (साँवा) आदि ये तुण (निःसार) धान्य हैं। ये सभी शीतल, हल्के, वातकारक, लेखन (खुरच कर मल या मैल को निकालने वाले), कफ तथा पित्त नाशक होते हैं ॥ ११ ॥
वक्तव्य—ये तुणधान्य बिना जोते-बोये स्वयं उग जाते हैं और कहीं-कहीं बोये भी जाते हैं। हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार अनेक व्रत ऐसे भी हैं, जिनमें 'हलकृष्ट न भुञ्जीत' अर्थात् हल जोतकर जो अन्न पैदा होते हैं, उन्हें व्रत के दिन खाने का निषेध रहता है, तब ये अन्न खाये जाते हैं। यही स्थिति बनवामों मुनियों की भी होती है, अतएव इन्हें मुनिअन्न भी कहते हैं। सुश्रुत ने इन अन्नो का परिगणन 'कुधान्यवर्ग' में किया है। देखें—सु.सू. ४६।२१। वास्तव में ये 'कुत्सितं धान्यं कुधान्यम्' हैं।
भग्प्रसन्धानकृतत्र प्रियङ्गुर्वृहणी गुरुः ॥ १२ ॥
प्रियंगुधान्य का वर्णन—तुणधान्यों में प्रियंगु (कंगुनी) भग् (टूटे हुए शरीरावयव अर्थात् अस्थि) को जोड़ता है। यह शरीर को मोटा बनाता है और पाचन में गुरु है अर्थात् देर में पचता है ॥ १२ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत में प्रियंगु का वर्णन इस प्रकार है—प्रियंगु काला-लाल-पीला-सफेद वर्णभेद से चार प्रकार का होता है। ये उत्तरोत्तर रूक्ष तथा कफनाशक होते हैं। देखें—सु.सू. ४६।२४। इस दृष्टि से वामभटोक्त लक्षणों से ये लक्षण विपरीत प्रतीत होते हैं।
कोरदूषः परं ग्राही स्पशं शीतो विषापहः।
कोदोधान्य का वर्णन—कोदोधान्य अत्यन्त ग्राही (मल को बाँधने वाला) होता है। यह स्पशं में शीतल होता है और विषजनित विकारों को नष्ट करता है।
वक्तव्य—दाह की स्थिति में इसे पीसकर माथा में, पैरों में, उदर में, पेडुओं में लेप लगाया जाता है। यह स्पशं में शीत होने के कारण दाहनाशक है। अष्टांगसंग्रह में कोरदूष = कोदों के बाद तुणधान्यों में एक 'उद्वालक' तथा 'मधूलिका' का भी ग्रहण किया है। इसे 'बड़ा कोदों' कहते हैं। यह उष्णवीर्य होता है। मधूलिका—यह शीतवीर्य, स्निग्ध तथा वृष्य होती है।
श्री अरुणदत्त का कथन है कि 'श्यामाकादि' में प्रयुक्त आदि शब्द से तोषश्यामाक, हस्तिश्यामाक, शिविर, प्रशान्तिका, मधूलिका, गवेधु, काण्डलोहित आदि का ग्रहण कर लेना चाहिए। देखें—ऊपर ११वें श्लोक की व्याख्या।
रूक्षः शीतो गुरुः स्वादुः सरो विड्वातकृचवः ॥ १३ ॥
वृष्यः स्वेयंकरो मूत्रमेदःपित्तकफान् जयेत्। पीनसभ्यासकासोरुस्तम्भकण्ठत्वगामयान् ॥ १४ ॥
अन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
८९
जो का वर्णन—जो हृक्ष, शीतल, पचने में गुरु ( भारी ), स्वाद में मधुर, सर ( मल को सरकाने वाला ), इसे खाने से मल ( पुरीष ) अधिक मात्रा में बनता है, यह वातदोष को बढ़ाता है। यह वीर्यवर्धक है। शरीर में स्थिरता को उत्पन्न करता है; मूत्रदोष, मेददोष, पित्त तथा कफविकारों को जीतता है। यह कौनस, श्वास, कास, ऊरुस्तम्भ, गले तथा त्वचा के रोगों को नष्ट करता है ॥ १३-१४ ॥
न्यूनो यवादनुयवः—
अनुयव का वर्णन—अनुयव ( छोटा जो ) के उक्त प्रसिद्ध जो से दाने भी छोटे होते हैं और यह उक्त जो से गुणों में भी कम होता है।
—रुक्षोष्णो वंशजो यवः ।
वंशज जो का वर्णन—बीस से उत्पन्न लगभग जो की आकृति वाले होने के कारण इन्हें बीस के जो कहते हैं। ये खाने में रुक्ष तथा उष्णवीर्य होते हैं।
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में वेणुयों का वर्णन इस प्रकार मिलता है—‘बीस के जो उष्ण, सर, कषाय रस-प्रधान, वात तथा पित्त कारक होते हैं’। देखें—अ.सं.सू. ७।२१।
वृष्यः शीतो गुरुः स्निग्धो जीवनो वातपिराहा ॥ १५ ॥
सन्धानकारी मधुरो गोधूमः स्थैर्यकृत्सरः ।
गोधूम का वर्णन—गेहूँ के गुण-धर्म—यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध, जीवनीय शक्ति प्रदान करने वाला, वात तथा पित्त का नाशक, टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाला, स्वाद में मधुर, स्थिरता को देने वाला तथा सर होता है ॥ १५ ॥
पथ्या नन्दीमुखी शीता कषायमधुरा लघुः ॥ १६ ॥
इति शूकधान्यवर्गः ।
नन्दीमुखी का वर्णन—नन्दीमुखी ( मुँडा गेहूँ ) पथ्य ( हितकर ), शीतवीर्य, कषैला, मधुर तथा पाचन में लघु ( हलका ) होता है ॥ १६ ॥
वक्तव्य—‘नन्दीमुखी’ यह नाम छोटे शूक वाले मुँडा गेहूँ का है, अतः व्याकरण की दृष्टि से इसका नाम ‘नन्दीमुख’ होना चाहिए ‘गौरमुख’ की भाँति। देखें—‘नखमुखात् संज्ञायाम्’ ( ४।१।५८ )—डोष न स्यात्।
अथ शिम्बीधान्यवर्गः
मुद्गाढकीमसूरादि शिम्बीधान्यं विबन्धकृत् । कषायं स्वादु सङ्ग्राहि कटुपाकं हिर्म लघु ॥ १७ ॥
मेदःश्लेष्माव्रपितेयु हितं लेपोपसेकयोः ।
शिम्बीधान्य-परिचय—मूंग, अरहर, मसूर आदि शिम्बीधान्य कहे जाते हैं। ये शिम्बीधान्य स्वाद में कषैले तथा मधुर होते हैं। मल को बांधते हैं, इनका कटु विपाक होता है। ये शीतवीर्य तथा लघुपाकी होते हैं। इनका प्रयोग मेदविकार, कफविकार, रक्तविकार तथा पित्तविकारों में लेप तथा उपसेक अर्थात् दाल, कढ़ी आदि के रूप में भी किया जाता है ॥ १७ ॥
वक्तव्य—इसके आगे कुछ संस्करणों में ‘चना’ नामक शिम्बीधान्य का इस प्रकार वर्णन मिलता है—‘अमुकपित्तहरो रूक्षो वातलक्षचवणकः स्मृतः’। इसका अर्थ है—चना। यह रक्तपित्तनाशक, रूक्ष तथा वातकारक होता है। अष्टांगसंग्रह ७।२६-२७ में इनके बारे में कुछ विशेष कहा गया है—दालों में मूंग की दाल श्रेष्ठ होती है, छोटे मूंग वातकारक होते हैं, हरे मूंग सबमें उत्तम होते हैं। मोठ—ये कुमिकारक
१०
अष्टाङ्गहृदये
होते हैं। मसूर—लेप, उबटन आदि के रूप में प्रयुक्त मसूर मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाते हैं। ये मल को बाँधते हैं। राजमाष ( लौबिया ) गुरु होता है। यह मलकारक, रुक्ष तथा वातकारक होता है।
बरोडत्र मुद्रोऽल्पचलः, कलायस्त्वतिवातलः ॥ १८ ॥
राजमाषोऽनिलकरो रुक्षो बहुशुक्रदुर्गुरुः।
मूँग, मटर, राजमाष—मूँग, अरहर, मसूर नामक दालों में मूँग थोड़ है, यह थोड़ा वातकारक होता है। कलाय ( मटर ) अत्यधिक वातकारक होता है। राजमाष ( लौबिया ) वातकारक, रुक्ष तथा गुरु ( पचने में ढेर लगाने वाला ) होता है। इसका अधिकांश भाग मल ( पुरीष ) बन जाता है ॥ १८ ॥
उष्णाः कुलत्याः पाकेऽम्लाः शुक्राश्मश्वासपीनसान् ॥ १९ ॥
कासाशः कफवातांश्च ज्वलति पिताम्रदाः परम्।
कुलथी का वर्णन—यह उष्ण, पाक में अम्ल, शुक्राश्मरी, श्वास, पीनस, कास, अर्श ( बवासीर ), कफविकार तथा वातविकारों को नष्ट करती है; पित्त और रक्त को बढ़ाती है ॥ १९ ॥
निष्पावो वातपिताम्रस्तन्यमूत्रकरो गुरुः ॥ २० ॥
सरो विदाही दूक्शुक्रकफशोफविषापहः।
सेम का वर्णन—निष्पाव ( सेम ) वात-पित्तकारक, स्तन्य ( दूध ) तथा मूत्र को बढ़ाता है। यह गुरुपाकी होता है, सर, विदाही ( पाचनकाल में द्राहकारक होता है ), नेत्रविकार, शुक्रदोष, कफविकार शोथ एवं विषविकारों को नष्ट करता है ॥ २० ॥
बक्तव्य—निष्पाव—निस् + पू + धज्। इसका अर्थ होता है—फटकना या अनाज को साफ करना। इस अर्थ की इस प्रसंग में कोई उपयोगिता नहीं है। आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से यह एक शिम्बीधान्य है। निष्पाव ( Phaseolus radiatus or a sort of pulse ), सफेद सेम, राजशिम्बीबीज, भट्वांस ( यह काला तथा सफेद रंग का होता है ), कुष्णात्रेय ने—'निष्पावा मधुरा रुक्षाः सकधाया विदाहिनः' कहकर इनकी अनेक जातियाँ होती हैं, कहा है, अतएव बहुवचन का प्रयोग किया है।
माषः स्निग्धो बलश्लेष्ममलपित्तकरः सरः ॥ २१ ॥
गुरुष्णोऽनिलह्वा स्वादुः शुक्रवृद्धिविरेककृत्।
माष का वर्णन—माष ( उड़द ) स्निग्ध, बलवर्धक, कफकारक, मलवर्धक, पित्तकारक, सर, पाचन में गुरु, उष्ण, वातनाशक, स्वाद में मधुर, शुक्रवर्धक एवं विरेचक है ॥ २१ ॥
बक्तव्य—माष ( उड़द )—पाकविधि—उड़दों को खोलते हुए पानी में डालकर पकाया जाता है, जब उसके दाने फूटने लगते हैं, तो उसमें तेल डालकर ढक दिया जाता है। इस स्थिति में वे फिर मन्द आँच पर पकाये जाते हैं। इसमें नमक, मिर्च-मसाले इच्छानुसार डालकर हाँग का छौंक भी लगाया जाता है। इस प्रकार पकायी गयी उड़द की दाल के गुणों का ही उक्त श्लोक में वर्णन है। पंजाब प्रान्त में इसी प्रकार उड़द की दाल बनायी जाती है। यह सूखी सब्जी की भाँति रोटियों तथा चावलों के साथ खायी जाती है। माष के अनेक वृष्य-प्रयोगों का वर्णन आयुर्वेद में प्राप्त होता है। माष का दाल के रूप में प्रयोग पश्चिम में अधिक होता है।
फलानि माषबद्धिद्यात्काकाण्डोलात्मगुप्तयोः ॥ २२ ॥
काकाण्डोला तथा केर्वाच—काकाण्डोला ( शूकर सेम ) तथा केर्वाच के बीज भी माष ( उड़द ) के समान गुण-धर्मवाले होते हैं ॥ २२ ॥
मन्त्ररूपविज्ञानाधिधायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
११
वक्तव्य —केवाँच की सेम जब पक जाती है, तो उसके रोम झड़ने लगते हैं। बन्दर उस सेम को बने के लिए जाते हैं तो वे रोम उनके शरीर पर गिरते हैं, वे दिनभर खुजलाते रहते हैं। इस दृष्टि से केवाँच को संस्कृत में 'कपिकन्धु' कहते हैं। इसके बीज अत्यन्त पौष्टिक होते हैं। इन्हें घिसकर गोंद का बी काम लिया जाता है। उष्णकटिबन्ध में इसकी लताएँ होती हैं, यह शारदीय फल है। सुकोमल केवाँच की फलियों की सन्नी सेम की भाँति बनायी जाती है। केवाँच के बीजों की खीर अत्यन्त पौष्टिक एवं बौद्धवर्धक होती है।
उष्णत्वच्यो हिमः स्पर्शे केशयो बल्यस्तिलो गुरुः। अल्पमूत्रः कटुः पाके मेधाऽग्रिकफपित्तकृत ॥
तिल का वर्णन —तिल उष्णवीर्य, त्वचा के लिए हितकर, स्पर्श में शीत, बालों के लिए हितकर, कल्मषवर्धक, गुरुपाकी, मूत्र को घटाने वाला, विपाक में कटु, बुद्धिवर्धक, अग्निवर्धक, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं ॥ २३ ॥
वक्तव्य —'त्वच्यः' तथा 'केशयः' तिलों के ये दो विशेषण प्रायः इनके तेल के हैं। तिलों को पीसकर इनका उबटन भी लगाया जाता है, तेल की मालिश भी की जाती है, अतः इन दोनों प्रकारों से यह त्वच्य है। 'केशयः' केवल तेल के कारण है। अल्पमूत्रः —जाड़ों में बुड़जनों को बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता है, अतएव इन दिनों तिलकूट, तिलवट, तिलवा, गजक आदि भक्ष्यपदार्थ तिल को भूँजकर कूटकर सूध या चीनी मिलाकर बनाये जाते हैं। इनका सेवन करने से मूत्र की मात्रा कम हो जाती है। यही वाग्भट का सन्देश है।
स्निग्धोमा स्वादुतिक्तोष्णा कफपित्तकरी गुरुः। दूकशुक्रहृदहृदः पाके, तद्रूदबीजं कुसुम्भजम् ॥
अतसी एवं कुसुम्भबीज —उमा (अलसी, तीसी या अतसी) स्निग्ध (तेल से युक्त), स्वाद में नमुर, कुछ तिक्त, उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, गुरुपाकी, दृष्टिनाशक, शुक्रनाशक और विपाक में बूढ़ होती है। कुसुम्भ (बेर) के बीज भी अतसी के समान गुण-कर्म वाले होते हैं ॥ २४ ॥
वक्तव्य —तिल, अतसी तथा कुसुम्भबीज ये तीनों द्रव्य तिलहन में गिने जाते हैं, यहाँ इनका परिगणन शिम्बीधान्य के रूप में किया गया है। यह भी तो है कि एक द्रव्य अपने गुण-धर्मों से अनेक से सम्बन्धित रहता है।
मापोऽत्र सर्वैष्ववरो, यवकः शूकजेषु च।
माष एवं यवक वर्णन —शिम्बीधान्यों में माष (उड़द) उक्त सभी धान्यों में अवर (निकुष्ट) होता है और शूकधान्यों में यवक (जई) अधम होता है।
वक्तव्य —'माषाः शमीधान्यानाम् अपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा भवन्ति'। (च.सू. २५।३९) शमीधान्यों में माष अपथ्यतम होते हैं। यहाँ शूकधान्यों में यवक को जो पुनः अपथ्य कहा है, इससे ऐसा लगता है कि शास्त्रकार का यह वचन 'द्विबद्धं सुबद्धं भवति' वाली सूक्ति है अर्थात् दो बार बौधी हुई गाँठ जल्दी कुटती नहीं। इसके पहले शूकधान्यवर्ग में 'पूर्वं पूर्वं च निन्दिताः' पदार्थ द्वारा यवक के गुणों की निन्दा की जा चुकी है, अस्तु। 'माषाः श्लेष्मपित्तजननानां श्रेष्ठाः'। (च.सू. २५।४०) इस वचन से अब आप किसी द्रव्य को महत्ता उत्तम, मध्यम, अधम नहीं कह सकते, उसके लिए पूर्वोपर की संगति अपेक्षित होती है। यही स्थिति 'यवक' की भी है।
वक्तव्य —चरक, सुश्रुत, वाग्भट आदि ने जिन द्रव्यों के जो नाम दिये हैं, देशभेद के कारण वे नाम बदल भी जाते हैं। इसलिए शूक, शमी, कुधान्य आदि को वहाँ-वहाँ के किसानों से, पशु-पक्षियों के नामों को व्याधों या शिकारियों से, कन्द-मूल-फलों के नामों को वनवासियों से, पकाये व्यञ्जनों के नामों को रसोइयों से, औषधद्रव्यों के नामों को औषधसंग्रह करके बाजारों में बेचने वालों (अतारों) से पूर्व और प्रयोग करके उन-उन के गुण-धर्मों से मिलाकर प्रयोग में लाये।