अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः
अथातोऽत्रस्वरूपविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम द्रवद्रव्यों का वर्णन करने के बाद यहाँ से अन्नद्रव्यों के स्वरूप के विज्ञान के लिए प्रस्तुत अध्याय की व्याख्या करेंगे। इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।
निरुक्ति—‘अन्नम्’—‘अद्यते’ इति ऋः । ‘अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात्’ । इति मेदिनी। अन्न का अर्थ है— भ्रात या खाया हुआ पदार्थ, इसका अर्थ यदि हम ‘भ्रात’ करते हैं तो विषय-निर्देश में संकीर्णता आ जाती है, क्योंकि ‘भुक्त’ शब्द का क्षेत्र विस्तृत है, वहाँ यहाँ अपेक्षित है, अस्तु । ‘अन्नस्वरूप’—आहार के उपयोग में आने वाले रोटी, चावल, दाल, सब्जी आदि। स्वरूप—उन-उन के नाम, रस, गुण, वीर्य, विपাক, प्रभाव, लक्षण आदि। यह अन्न (खाये जाने वाला पदार्थ) स्थावर तथा जांगम भेद से दो प्रकार का होता है। यथा—गेहूँ, चावल आदि स्थावर और मांस आदि जांगम (जंगम प्राणियों से प्राप्त होने वाला) ।
स्थावर धान्य भी रबी और खरीफ भेद से दो प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से पुनः दो प्रकार का होता है। यथा—१. शूकधान्य—शूक का अर्थ है नुकीले अग्रभाग वाले धान्य। जैसे—गेहूँ, जौ, धान आदि। २. शिम्बी या शमी धान्य—छीमी में उत्पन्न होने वाला दो दल युक्त अन्न। जैसे—चना, उड़द, कुलथी, सेम आदि।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. २७, सु.सू. ४६ तथा अ.सं.सू.७ तथा १२ में देखें।
अथ शूकधान्यवर्गः
रक्तो महान् सकलमस्तूर्णकः शकुनाहृतः । सारामुखो दीर्घशूको रोद्रशूकः सुगन्धिकः ॥ १ ॥ पुण्ड्रः पाण्ड्रः पुण्डरीकः प्रमोदो गौरसारिबौ । काञ्चनो महिषः शूको दूषकः कुसुमाण्डकः ॥ लाङ्गला लोहवालाख्याः कर्दमाः शीतभीरुकाः । पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ स्वादुपाकरसाः स्निग्धाः वृष्या बद्धाल्यवर्चसः । कषायानुरसाः पथ्या लघवो मूलला हिमाः ॥
शूकधान्यों का वर्णन—रक्तशालि, महाशालि, कलमशालि, तूर्णकशालि, शकुनाहृतशालि, सारामुख, दीर्घशूक, रोद्रशूक (लोह के फूल के सदृश शूक वाला), सुगन्धिक (बासमती), पुण्ड्रशालि, पाण्डुशालि, पुण्डरीकशालि, प्रमोद, गौर, शारिब, काञ्चन, महिष, शूकशालि, दूषकशालि, कुसुमाण्डकशालि, लांगलशालि, लोहबाल नामक शालि, कर्दमशालि, शीतभीरुकशालि, पतंग तथा तपनीय शालि; इनके अतिरिक्त और भी जो अनेक शालियों की जातियाँ होती हैं, वे सब शालि उत्तम कोटि के होते हैं। वे सभी रस एवं विपक में मधुर, स्निग्ध, वीर्यवर्धक होते हैं। इनको खाने से वँधा हुआ थोड़ा-सा मल बनता है। वे सब कुछ कषाय रसवाले होते हैं। ये सभी के लिए पथ्य, लघु (हल्के), मूत्रकारक तथा हिम (शीतवीर्य) होते हैं ॥ १-४ ॥
बक्तव्य—शकुनाहृत नामक शालिधान्य के सम्बन्ध में कहा गया है कि इसे शकुनि (गरुड) पक्षी द्रौपान्तर से ले आया था, अतएव इसे शकुनाहृत या गरुडशालि भी कहते हैं। आजकल तो व्यापारीवर्ग भी बासमती को ‘गरुडब्राण्ड’ कहने लगे हैं। किसी संस्करण में ‘पुण्ड्र’...‘शीतभीरुका’ ये पंक्तियाँ नहीं मिलतीं। यह पाठ सम्पूर्ण अष्टांगसंग्रह ७ से लिया गया है।