भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123

ब्रह्मविज्ञानीयाध्यायः ६ ]

सूत्रस्थानम्

८७

शूकजेषु वरस्तन रक्तसृष्णात्रिदोषहा ।

रक्तशालि का वर्णन—ऊपर कहे गये सब शूकधान्य हैं, इनमें रक्तशालि उत्तम होता है। यह प्यास को कम करता है और त्रिदोषनाशक (शामक) होता है।

महास्तमनु कलमस्त चाप्यनु ततः परे ॥५॥

क्रमशः गुणहीनता—रक्तशालि की तुलना में महाशालि, उससे कलमशालि, उससे भी तूर्णकशालि हीन गुणवाले होते हैं ॥५॥

वरक्य—वाग्भट के टीकाकार श्री अरुणदत्त कहते हैं—‘रक्तशालेः पश्चात् महान् शालिर्वः’। और ब्रह्मादि कहते हैं—‘तमनु रक्तशालेहीनो महान्’। उक्त दोनों टीकाकारों का स्पष्ट मतभेद है। इस मतभेद के समाधान के लिए हम महर्षि सृश्रुत की शरण में जाते हैं—‘तेषां लोहितकः श्रेष्ठः’...‘तस्मादल्पान्तरगुणाः क्रमशः शालयोऽवराः’ ॥ (सू. सृ. ४६।६-७) अर्थ स्पष्ट है।

यवका हायनाः पांसुबाष्पनैषधकादयः। स्वादूष्णा गुरवः स्निग्धाः पाकेऽम्लाः श्लेष्मपित्तलाः ॥ सृष्टमृत्रपुरीषाश्च पूर्व पूर्व च निन्दिताः।

यवक आदि शालिधान्य—यवक (जई), हायनक, पांसु, बाष्प, नैषधक आदि अन्य अनेक प्रकार के शालिधान्य होते हैं। इनके गुण—ये स्वाद में मधुर, उष्ण, गुरु, स्निग्ध, पाक में अम्ल, कफकारक तथा पित्तकारक होते हैं। इनके सेवन से मल-मूत्र की प्रवृत्ति सरलता से हो जाती है। ये क्रमशः अपने पूर्व निन्दित होते हैं, इस क्रम से सबसे अधिक निन्दित यवक होता है ॥६॥

वरक्य—वरक ने सूत्रस्थान के २९वें अध्याय में ‘अहिततमानुपदेश्यामः—यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमलेन प्रकृष्टतमा भवन्ति’। (३९) कहा है और ‘लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे क्रममा भवन्ति’। (वर्ह ३८) वरक के इस वचन से इनकी गुणहीनता तथा गुणवत्ता का स्पष्ट संकेत मिल जाता है।

स्निग्धो ग्राही लघुः स्वादुस्त्रिदोषज्जः स्थिरो हिमः ॥७॥ षष्ठिको ब्रीहिषु श्रेष्ठो गौरश्चासितगौरतः।

ब्रीहिधान्य का वर्णन—ब्रीहिधान्यों में षष्ठिक (साठीधान्य) स्निग्ध, ग्राही (मल को बाँधने वाला), लघु (शीघ्र पचने वाला), स्वादु (मधुर), वात आदि तीनों दोषों का शामक, स्थिर (शरीर को स्थिर रखने वाला), हिम (शीतल) गुणवाला होता है। ब्रीहिधान्यों से साठीधान्य उत्तम होता है। यह दो प्रकार का होता है—१. गौर (सफेद रंग वाला) तथा २. हलका काला। इनमें गौर साठी उत्तम होता है ॥७॥

वरक्य—षष्ठिक धान्य ग्रीष्म ऋतु में पकता है। षष्ठिक (सफेद सांठी), कंगु, मुकुन्दक, पीतक, काकलक, असन, पुष्पक, महाषष्ठिक, चूर्णक, कुरबक, केदार आदि ये साठी धान्य की जातियाँ हैं। देखें—सू. सृ. ४६।८ से ११ तक।

ततः क्रमान्महाब्रीहिकृष्णब्रीहिजतुमुखलाः ॥८॥ कुक्कुट्टाण्डकलावास्थपारावतकशूकराः। वरकोहालकोज्ज्वालचीनशारददर्दुराः ॥९॥ गन्धनाः कुरुविन्दाश्च गुणरल्पान्तराः स्मृताः।

सामान्य गुणवाले षष्ठिक—उक्त षष्ठिक धान्यों से ये सामान्य (कुछ कम) गुण वाले होते हैं—महाब्रीहि, कृष्णब्रीहि, जतुमुख, कुक्कुट्टाण्ड, कपाल, पारावतक, शूकर, वरक, उद्दालक, उज्ज्वाल (ज्वार, मक्का, जुहरी), चीन (कौणी), शारद, दर्दुर, गन्धन तथा कुरुविन्द ॥८-९॥

अष्टाङ्गहृदयम् · पृष्ठ 123, कुल 387 में से · BharatKosha