भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

स्वादुरम्लविपाकोऽच्यो ब्रीहिः पित्तकरो गुरुः ॥ १० ॥

बहुमूत्रपुरीपोष्मा, त्रिदोषस्त्वेव पाटलः।

अन्य ब्रीहिधान्य-वर्णन—ये रस में मधुर, विपाक में अम्ल, पित्तकारक, पाचन में गुरु तथा उष्ण होते हैं। इनका अधिक भाग मल-मूत्र के रूप में परिणत हो जाता है अर्थात् ये पौष्टिक नहीं होते। इनमें 'पाटल' नामक ब्रीहि त्रिदोषकारक होता है ॥ १० ॥

बक्तव्य—शालि-षष्टिक ब्रीहिधान्यों का संक्षिप्त परिचय—१. शालिधान्य—इनकी फसल उगाने से पकने तक इन्हें जल से भरे खेतों की जहरत होती है, फिर भी ये शरद् ऋतु के बाद में पकते हैं। ये अधिक सफेद होते हैं। २. षष्टिक धान्य—ये प्रायः साठ दिन में पककर तैयार हो जाते हैं। ३. ब्रीहिधान्य—चरक के टीकाकार शौचक्रपाणि के अनुसार ये शरत् काल में पकने वाले आशुधान्य हैं।

कङ्गुकोद्रवनीवारश्यामाकादि हिमं लघु॥ ११ ॥

तुणधान्यं पवनकृल्लेखनं कफपित्तहृतं।

तुणधान्यों का वर्णन—कंगु (कंगुनी या कौणी), कोद्रव (जंगली कोदों), नीवार (तीनी—मुनि अन्न), श्यामाक (साँवा) आदि ये तुण (निःसार) धान्य हैं। ये सभी शीतल, हल्के, वातकारक, लेखन (खुरच कर मल या मैल को निकालने वाले), कफ तथा पित्त नाशक होते हैं ॥ ११ ॥

वक्तव्य—ये तुणधान्य बिना जोते-बोये स्वयं उग जाते हैं और कहीं-कहीं बोये भी जाते हैं। हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार अनेक व्रत ऐसे भी हैं, जिनमें 'हलकृष्ट न भुञ्जीत' अर्थात् हल जोतकर जो अन्न पैदा होते हैं, उन्हें व्रत के दिन खाने का निषेध रहता है, तब ये अन्न खाये जाते हैं। यही स्थिति बनवामों मुनियों की भी होती है, अतएव इन्हें मुनिअन्न भी कहते हैं। सुश्रुत ने इन अन्नो का परिगणन 'कुधान्यवर्ग' में किया है। देखें—सु.सू. ४६।२१। वास्तव में ये 'कुत्सितं धान्यं कुधान्यम्' हैं।

भग्प्रसन्धानकृतत्र प्रियङ्गुर्वृहणी गुरुः ॥ १२ ॥

प्रियंगुधान्य का वर्णन—तुणधान्यों में प्रियंगु (कंगुनी) भग् (टूटे हुए शरीरावयव अर्थात् अस्थि) को जोड़ता है। यह शरीर को मोटा बनाता है और पाचन में गुरु है अर्थात् देर में पचता है ॥ १२ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत में प्रियंगु का वर्णन इस प्रकार है—प्रियंगु काला-लाल-पीला-सफेद वर्णभेद से चार प्रकार का होता है। ये उत्तरोत्तर रूक्ष तथा कफनाशक होते हैं। देखें—सु.सू. ४६।२४। इस दृष्टि से वामभटोक्त लक्षणों से ये लक्षण विपरीत प्रतीत होते हैं।

कोरदूषः परं ग्राही स्पशं शीतो विषापहः।

कोदोधान्य का वर्णन—कोदोधान्य अत्यन्त ग्राही (मल को बाँधने वाला) होता है। यह स्पशं में शीतल होता है और विषजनित विकारों को नष्ट करता है।

वक्तव्य—दाह की स्थिति में इसे पीसकर माथा में, पैरों में, उदर में, पेडुओं में लेप लगाया जाता है। यह स्पशं में शीत होने के कारण दाहनाशक है। अष्टांगसंग्रह में कोरदूष = कोदों के बाद तुणधान्यों में एक 'उद्वालक' तथा 'मधूलिका' का भी ग्रहण किया है। इसे 'बड़ा कोदों' कहते हैं। यह उष्णवीर्य होता है। मधूलिका—यह शीतवीर्य, स्निग्ध तथा वृष्य होती है।

श्री अरुणदत्त का कथन है कि 'श्यामाकादि' में प्रयुक्त आदि शब्द से तोषश्यामाक, हस्तिश्यामाक, शिविर, प्रशान्तिका, मधूलिका, गवेधु, काण्डलोहित आदि का ग्रहण कर लेना चाहिए। देखें—ऊपर ११वें श्लोक की व्याख्या।

रूक्षः शीतो गुरुः स्वादुः सरो विड्वातकृचवः ॥ १३ ॥

वृष्यः स्वेयंकरो मूत्रमेदःपित्तकफान् जयेत्। पीनसभ्यासकासोरुस्तम्भकण्ठत्वगामयान् ॥ १४ ॥