अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ]
सूत्रस्थानम्
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जो का वर्णन—जो हृक्ष, शीतल, पचने में गुरु ( भारी ), स्वाद में मधुर, सर ( मल को सरकाने वाला ), इसे खाने से मल ( पुरीष ) अधिक मात्रा में बनता है, यह वातदोष को बढ़ाता है। यह वीर्यवर्धक है। शरीर में स्थिरता को उत्पन्न करता है; मूत्रदोष, मेददोष, पित्त तथा कफविकारों को जीतता है। यह कौनस, श्वास, कास, ऊरुस्तम्भ, गले तथा त्वचा के रोगों को नष्ट करता है ॥ १३-१४ ॥
न्यूनो यवादनुयवः—
अनुयव का वर्णन—अनुयव ( छोटा जो ) के उक्त प्रसिद्ध जो से दाने भी छोटे होते हैं और यह उक्त जो से गुणों में भी कम होता है।
—रुक्षोष्णो वंशजो यवः ।
वंशज जो का वर्णन—बीस से उत्पन्न लगभग जो की आकृति वाले होने के कारण इन्हें बीस के जो कहते हैं। ये खाने में रुक्ष तथा उष्णवीर्य होते हैं।
वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह में वेणुयों का वर्णन इस प्रकार मिलता है—‘बीस के जो उष्ण, सर, कषाय रस-प्रधान, वात तथा पित्त कारक होते हैं’। देखें—अ.सं.सू. ७।२१।
वृष्यः शीतो गुरुः स्निग्धो जीवनो वातपिराहा ॥ १५ ॥
सन्धानकारी मधुरो गोधूमः स्थैर्यकृत्सरः ।
गोधूम का वर्णन—गेहूँ के गुण-धर्म—यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतवीर्य, पाचन में गुरु, स्निग्ध, जीवनीय शक्ति प्रदान करने वाला, वात तथा पित्त का नाशक, टूटी हुई अस्थि को जोड़ने वाला, स्वाद में मधुर, स्थिरता को देने वाला तथा सर होता है ॥ १५ ॥
पथ्या नन्दीमुखी शीता कषायमधुरा लघुः ॥ १६ ॥
इति शूकधान्यवर्गः ।
नन्दीमुखी का वर्णन—नन्दीमुखी ( मुँडा गेहूँ ) पथ्य ( हितकर ), शीतवीर्य, कषैला, मधुर तथा पाचन में लघु ( हलका ) होता है ॥ १६ ॥
वक्तव्य—‘नन्दीमुखी’ यह नाम छोटे शूक वाले मुँडा गेहूँ का है, अतः व्याकरण की दृष्टि से इसका नाम ‘नन्दीमुख’ होना चाहिए ‘गौरमुख’ की भाँति। देखें—‘नखमुखात् संज्ञायाम्’ ( ४।१।५८ )—डोष न स्यात्।
अथ शिम्बीधान्यवर्गः
मुद्गाढकीमसूरादि शिम्बीधान्यं विबन्धकृत् । कषायं स्वादु सङ्ग्राहि कटुपाकं हिर्म लघु ॥ १७ ॥
मेदःश्लेष्माव्रपितेयु हितं लेपोपसेकयोः ।
शिम्बीधान्य-परिचय—मूंग, अरहर, मसूर आदि शिम्बीधान्य कहे जाते हैं। ये शिम्बीधान्य स्वाद में कषैले तथा मधुर होते हैं। मल को बांधते हैं, इनका कटु विपाक होता है। ये शीतवीर्य तथा लघुपाकी होते हैं। इनका प्रयोग मेदविकार, कफविकार, रक्तविकार तथा पित्तविकारों में लेप तथा उपसेक अर्थात् दाल, कढ़ी आदि के रूप में भी किया जाता है ॥ १७ ॥
वक्तव्य—इसके आगे कुछ संस्करणों में ‘चना’ नामक शिम्बीधान्य का इस प्रकार वर्णन मिलता है—‘अमुकपित्तहरो रूक्षो वातलक्षचवणकः स्मृतः’। इसका अर्थ है—चना। यह रक्तपित्तनाशक, रूक्ष तथा वातकारक होता है। अष्टांगसंग्रह ७।२६-२७ में इनके बारे में कुछ विशेष कहा गया है—दालों में मूंग की दाल श्रेष्ठ होती है, छोटे मूंग वातकारक होते हैं, हरे मूंग सबमें उत्तम होते हैं। मोठ—ये कुमिकारक