अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
होते हैं। मसूर—लेप, उबटन आदि के रूप में प्रयुक्त मसूर मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाते हैं। ये मल को बाँधते हैं। राजमाष ( लौबिया ) गुरु होता है। यह मलकारक, रुक्ष तथा वातकारक होता है।
बरोडत्र मुद्रोऽल्पचलः, कलायस्त्वतिवातलः ॥ १८ ॥
राजमाषोऽनिलकरो रुक्षो बहुशुक्रदुर्गुरुः।
मूँग, मटर, राजमाष—मूँग, अरहर, मसूर नामक दालों में मूँग थोड़ है, यह थोड़ा वातकारक होता है। कलाय ( मटर ) अत्यधिक वातकारक होता है। राजमाष ( लौबिया ) वातकारक, रुक्ष तथा गुरु ( पचने में ढेर लगाने वाला ) होता है। इसका अधिकांश भाग मल ( पुरीष ) बन जाता है ॥ १८ ॥
उष्णाः कुलत्याः पाकेऽम्लाः शुक्राश्मश्वासपीनसान् ॥ १९ ॥
कासाशः कफवातांश्च ज्वलति पिताम्रदाः परम्।
कुलथी का वर्णन—यह उष्ण, पाक में अम्ल, शुक्राश्मरी, श्वास, पीनस, कास, अर्श ( बवासीर ), कफविकार तथा वातविकारों को नष्ट करती है; पित्त और रक्त को बढ़ाती है ॥ १९ ॥
निष्पावो वातपिताम्रस्तन्यमूत्रकरो गुरुः ॥ २० ॥
सरो विदाही दूक्शुक्रकफशोफविषापहः।
सेम का वर्णन—निष्पाव ( सेम ) वात-पित्तकारक, स्तन्य ( दूध ) तथा मूत्र को बढ़ाता है। यह गुरुपाकी होता है, सर, विदाही ( पाचनकाल में द्राहकारक होता है ), नेत्रविकार, शुक्रदोष, कफविकार शोथ एवं विषविकारों को नष्ट करता है ॥ २० ॥
बक्तव्य—निष्पाव—निस् + पू + धज्। इसका अर्थ होता है—फटकना या अनाज को साफ करना। इस अर्थ की इस प्रसंग में कोई उपयोगिता नहीं है। आयुर्वेदीय दृष्टिकोण से यह एक शिम्बीधान्य है। निष्पाव ( Phaseolus radiatus or a sort of pulse ), सफेद सेम, राजशिम्बीबीज, भट्वांस ( यह काला तथा सफेद रंग का होता है ), कुष्णात्रेय ने—'निष्पावा मधुरा रुक्षाः सकधाया विदाहिनः' कहकर इनकी अनेक जातियाँ होती हैं, कहा है, अतएव बहुवचन का प्रयोग किया है।
माषः स्निग्धो बलश्लेष्ममलपित्तकरः सरः ॥ २१ ॥
गुरुष्णोऽनिलह्वा स्वादुः शुक्रवृद्धिविरेककृत्।
माष का वर्णन—माष ( उड़द ) स्निग्ध, बलवर्धक, कफकारक, मलवर्धक, पित्तकारक, सर, पाचन में गुरु, उष्ण, वातनाशक, स्वाद में मधुर, शुक्रवर्धक एवं विरेचक है ॥ २१ ॥
बक्तव्य—माष ( उड़द )—पाकविधि—उड़दों को खोलते हुए पानी में डालकर पकाया जाता है, जब उसके दाने फूटने लगते हैं, तो उसमें तेल डालकर ढक दिया जाता है। इस स्थिति में वे फिर मन्द आँच पर पकाये जाते हैं। इसमें नमक, मिर्च-मसाले इच्छानुसार डालकर हाँग का छौंक भी लगाया जाता है। इस प्रकार पकायी गयी उड़द की दाल के गुणों का ही उक्त श्लोक में वर्णन है। पंजाब प्रान्त में इसी प्रकार उड़द की दाल बनायी जाती है। यह सूखी सब्जी की भाँति रोटियों तथा चावलों के साथ खायी जाती है। माष के अनेक वृष्य-प्रयोगों का वर्णन आयुर्वेद में प्राप्त होता है। माष का दाल के रूप में प्रयोग पश्चिम में अधिक होता है।
फलानि माषबद्धिद्यात्काकाण्डोलात्मगुप्तयोः ॥ २२ ॥
काकाण्डोला तथा केर्वाच—काकाण्डोला ( शूकर सेम ) तथा केर्वाच के बीज भी माष ( उड़द ) के समान गुण-धर्मवाले होते हैं ॥ २२ ॥